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भारत केवल आश्रित है!

विश्व आज गांव में गुंथा हुआ है! उस नाते हर देश एक-दूसरे पर निर्भर है, लेकिन खाड़ी युद्ध ने अहसास कराया है कि भारत हर चीज में दूसरों पर ही आश्रित है। वह जितना चीन पर आश्रित है उतना रूस पर है, उतना ही अमेरिका, यूरोप पर है तो पिद्दी सी खाड़ी के पिद्दी देशों पर भी बुरी तरह निर्भर है! शायद ही किसी को अनुमान रहा हो कि खाड़ी के देशों के पेट्रोल-डीजल-गैस के अलावा इनके बाय-प्रोडक्ट भारत की कई औद्योगिक गतिविधियों की अनिवार्यता हैं। प्लास्टिक और उसके सामान के लिए खाड़ी से सप्लाई, तो कपड़ा उद्योग के धागे यानी यार्न का उत्पादन भी खाड़ी पर निर्भर। औद्योगिक उत्पादन के लिए भी खाड़ी से अलग-अलग तरह की गैस सप्लाई आवश्यक।

एक रिपोर्ट से मालूम हुआ कि दवा उद्योग (एपीआई-फार्मा) और दवाइयों के दाम बढ़ रहे हैं। इसलिए क्योंकि इसके लिए खाड़ी से तमाम तरह के रसायन, कच्चा माल चीन जाता है। फिर चीन से भारत का दवा उद्योग कच्चा माल (एपीआई) मंगाता है। उससे दवाएं बना भारतीय कंपनियां देश-विदेश, अफ्रीका आदि देशों को दवा बेचती हैं। पूरा कारोबार खाड़ी से प्रभावित है तो सभी तरफ दवाइयों के दाम बढ़ रहे हैं!

सोचें, खाड़ी पर भारत ईंधन, कच्चे माल आदि में निर्भर है तो भारत का करेंसी भंडार खाड़ी में रह रहे भारतीयों, मजदूरों की मेहनत से आए डॉलर (कोई सौ बिलियन डॉलर प्रतिवर्ष, दुनिया में सर्वाधिक वैश्विक रिकॉर्ड) से जमा होता है। जंग के बाद खाड़ी में काम-धंधे ठप्प हैं। भारत का रुपया वैश्विक करेंसियों के आगे लुढ़क रहा है तो प्रवासी भारतीय भी अपनी इमरजेंसी के लिए पैसा बचाकर बैठे होंगे, या भारत लौट आएंगे। इसका असर करेंसी भंडार पर होगा। यों भी रुपया फिलहाल दुनिया की सर्वाधिक कमजोर करेंसियों में एक है। लड़ाई के बाद भारत सौ रुपए प्रति डॉलर की रेट की ओर भाग रहा था। समझ आई तो रिजर्व बैंक ने रुपए के भविष्य की सट्टेबाजी में संस्थाओं को पाबंद किया। कुछ दिन असर हुआ, लेकिन अब फिर सौ रुपए की तरफ बढ़ता लगता है। अगली मई तक न जाने क्या हो!

खाड़ी से जहाजों-टैंकरों की आवाजाही जब तक बंद रहेगी, तब तक कच्चा तेल सौ डॉलर प्रति बैरल से ऊपर ही रहेगा। इस सप्ताह 127 डॉलर प्रति बैरल तक रेट गई। मोटामोटी लगता है कच्चा तेल 110 डॉलर प्रति बैरल औसत पर रहेगा!

इसी अनुपात में भारत के करेंसी भंडार पर दबाव रहेगा, रुपया कमजोर होगा। भारत में हर वह चीज महंगी होगी जो ईंधन-ऊर्जा से संबंधित है। हर वह सामान भी महंगा जो चीन, आसियान देशों से आता है। यह संभव नहीं है कि भारत अचानक चीन से उसकी करेंसी युआन में लेन-देन करने लगे। इससे न केवल भारत की नाक कटेगी, बल्कि चीन से खरीदारी जितनी है, उतना युआन भारत के पास हो ही नहीं सकता, क्योंकि भारत जितना बेचता है, उससे कई गुना अधिक चीन से खरीदता है।

लब्बोलुआब कि भारत की महंगी तेल खरीद, एनआरआई से कम डॉलर आने की सूरत में रुपया कमजोर होते जाना है। बावजूद इस सबके भला मोदी को इन बातों पर ध्यान देने की क्या जरूरत। उनकी चिंता व फोकस आगे केवल और केवल उत्तर प्रदेश चुनाव है, या फिर कुछ शेयर बाजार में तेजी बनाए रखने पर है, ताकि अंबानी-अडानी का विकसित भारत खिला रहे। बाकी लोगों को क्या? वे दाल-रोटी खाते आए हैं, राशन-खैरात खाते रहेंगे, प्रभुजी के गुण भी गाते रहेंगे!

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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