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समस्याएं बुनियादी, समाधान दिखावटी

देश में कुछ करने के लिए इसलिए भी कुछ नहीं बचा है क्योंकि सारी समस्याओं को ऊपर ऊपर दूर करने के उपाय कर दिए गए हैं। उनके लिए योजनाएं घोषित कर दी गई हैं। यह समझने का प्रयास नहीं किया गया है कि भारत की समस्याएं बुनियादी हैं और दिखावटी उपायों से उनका समाधान नहीं हो सकता है। दिखावटी उपाय सिर्फ वोट लेने के लिए होते हैं। दुनिया की सारी सरकारें कुछ काम दिखावटी करती हैं, जिसका मकसद वोट की राजनीति साधना होता है। लेकिन भारत में तो ऐसा लग रहा है जैसे सारे ही काम सिर्फ वोट लेने के मकसद से हो रहे हैं। पहले  कई प्रधानमंत्रियों ने बुनियादी समस्याओं को दूर करने के लिए बुनियादी उपाय भी किए और इतिहास उनको दयालुता के साथ याद करता है। लेकिन अभी तो कोई बुनियादी या ढांचागत उपाय ही नहीं हैं।

शिक्षा हो या स्वास्थ्य, बिजली हो या सड़क और पानी, रोजगार हो या अर्थव्यवस्था सब जगह कामचलाऊ व्यवस्था है। सब कुछ आंकड़ों में मैनेज किया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर ऊर्जा यानी बिजली या दूसरे ईंधन की बात करें तो भारत ने क्या हासिल किया है? एक ईरान में जंग शुरू हो गई और होर्मुज की खाड़ी बंद हुई तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ गई और देश की अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठने लगा। फिर भी दावा यह किया गया कि सारी दुनिया संकट में है लेकिन भारत में चूंकि मोदीजी हैं इसलिए उन्होंने संकट को संभाल रखा है। पिछले ढाई महीने से सिर्फ संकट संभालने का माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है। मोदी जब प्रधानमंत्री बने थे तब उन्होंने कहा था कि भारत ईंधन का उत्पादन बढाएगा और आयात पर निर्भरता कम करेगा। हकीकत यह है कि जब वे आए थे तब भारत अपनी जरुरत का 80 फीसदी तेल आयात करता था और करीब 20 फीसदी उत्पादित करता था। आज भारत करीब 90 फीसदी तेल आयात करता है। फिर भी दावा है कि संकट का प्रबंधन हो गया।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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