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  • हिंदू चिंता है या हिंदुओं को मरवाना?

    मोदी सरकार इन दिनों हेडलाइन मैनेजमेंट में बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या पर सुर्खियां बनवा रही है। क्यों? ताकि बंगाल में आने वाले विधानसभा चुनाव में हिंदू ममता को हराएं और मोदी-भाजपा को जिताएं। बंगाल और असम दोनों में हिंदू बनाम मुस्लिम भावना चुनाव जीतने का मोदी मंत्र है। सो, बांग्लादेश में हिंदू जितने मरे, वहां के चुनाव में कट्टरपंथियों का जितना भी जलवा बने उससे उतने ही बंगाल में भाजपा के हिंदू वोट बढ़ेंगे। फिर भले बांग्लादेश में हिंदुओं की विपदा बढ़ती जाए। डेढ़ करोड़ हिंदुओं (हां, बांग्लादेश की आबादी में है आठ प्रतिशत हिंदू) के मरने, भागने, मिटने...

  • मोदी सरकार, ब्रिक्स+ और श्रमिक नजरिया

    ब्रिक्स+ बदलाव का एक प्रतीक है। इसलिए इसके महत्त्व को कम-से-कम श्रमिक वर्ग को अवश्य समझना चाहिए। ... भारत सरकार इस मामले में जो भी रुख अपनाए, भारत के मेहनतकश तबकों को इसके महत्त्व को अवश्य समझना चाहिए। भारत सरकार ब्रिक्स+ के महत्त्व के मुताबिक इसके शिखर सम्मेलन को अहमियत दे, इसके लिए उन्हें दबाव बनाना चाहिए। इसकी वजह यह है कि ब्रिक्स+ मौजूदा विश्व व्यवस्था के साम्राज्यवादी ढांचे के लिए एक चुनौती बन कर उभरा है। नये साल में भू-राजनीति के लिहाज से भारत के लिए सबसे बड़ा मौका ब्रिक्स+ समूह के शिखर सम्मेलन की मेजबानी के रूप में...

  • आधी रात को बिल पास करने का चलन

    ऐसा लग रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को आधी रात तक या उसके बाद भी संसद चलाने का चस्का लग गया है। बहुत पहले आधी रात को संसद का सत्र बुला कर वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी कानून पास किया गया था। यह 2017 की बात है। उसके बाद इस साल यानी 2025 में सरकार ने कम से कम तीन दिन आधी रात के बाद तक चर्चा कराई और विधेयक पास किए। ताजा मामला महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना यानी मनरेगा की जगह विकसित भारत जी राम जी बिल का है। संसद में इसे सरकार...

  • सरकार ने जरूरी मुद्दे छोड़ दिए

    संसद के शीतकालीन सत्र में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रदूषण का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में बढ़ रहे वायु प्रदूषण पर चर्चा होनी चाहिए। सरकार ने इस पर चर्चा नहीं कराई। उलटे सत्र खत्म हुआ तो सरकार की ओर से कहा गया कि कांग्रेस चर्चा नहीं चाहती थी। सोचें, कांग्रेस तो वंदे मातरम् पर भी चर्चा नहीं चाहती थी लेकिन सरकार ने कराई। कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां मनरेगा की जगह विकसित भारत जी राम जी बिल का भी विरोध कर रही थीं लेकिन सरकार ने आधी रात तक चर्चा...

  • मोदी सरकार में फेरबदल की तैयारी

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल का पहला साल बहुत अच्छा नहीं बीता है। पहलगाम कांड और ऑपरेशन सिंदूर के सीजफायर से लेकर अमेरिका के साथ टैरिफ विवाद और व्यापार संधि में समझौता करने की चर्चाओं के बीच पहला साल बीता। हालांकि लोकसभा चुनाव में लगे झटके से पार्टी उबर गई है। एक के बाद एक कई राज्यों में चुनाव जीत कर भाजपा ने लोकसभा में हुए नुकसान को पीछे छोड़ दिया है। फिर भी यह पहली बार है, जब नरेंद्र मोदी गठबंधन की सरकार चला रहे हैं और सहयोगी पार्टियों का प्रत्यक्ष या परोक्ष दबाव झेल रहे हैं। बिहार...

  • सरकारों को हराना अब मुश्किल है!

    इस पर गंभीरता से अध्ययन करने की जरुरत है कि जो सरकार में है उसके हारने का अनुपात क्यों कम होता जा रहा है? यह भी देखने की जरुरत है कि क्या एंटी इन्कम्बैंसी यानी सत्ता विरोध, जो भारतीय राजनीति में हमेशा निर्णायक फैक्टर होता था उसकी प्रासंगिकता खत्म हो गई है? ये दो सवाल इसलिए हैं क्योंकि अब सरकारें चुनाव नहीं हार रही हैं। जो सत्ता में है वह किसी न किसी तरह से ऐसे उपाय कर रहा है, उसकी पार्टी चुनाव जीत जा रही है। इसके अपवाद भी हैं लेकिन सरकारों की सत्ता में वापसी पहले से ज्यादा...

  • सरकार से सवाल, मतलब साजिश!

    यह भारत का इतिहास है। केवल नरेंद्र मोदी ही जिम्मेदार नहीं हैं। आखिर इंदिरा गांधी के जमाने में दुष्यंत कुमार ने लिखा था, ‘मत कहो आकाश में कुहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है’। तब भी घने कोहरे की शिकायत को किसी की व्यक्तिगत आलोचना मान लिया जाता था। अब तो सच में ऐसी घटनाएं हो रही हैं कि  ज्यादा गर्मी पड़ने की शिकायत करें तो भक्त मंडली लड़ने आ जाती है कि क्या पहले गर्मी नहीं पड़ती थी! तो यह भारत का इतिहास है कि अगर नागरिक ने अपनी पीड़ा व्यक्त की, अपनी तकलीफें बताई तो उसे...

  • हवाई चप्पल की विमान, ट्रेन व सड़क हरियाली!

    प्रधानमंत्री मोदी ने सपना दिखाया था कि हवाई चप्पल वाला भी हवाई जहाज में उड़े। और हुआ क्या? वे खुद तो साढ़े आठ हजार करोड़ रुपए के हवाई जहाज में उड़ने लगे लेकिन दूसरी तरफ हकीकत है कि हवाई चप्पल वाला तो हवाई जहाज में नहीं बैठ सका पर जो हवाई जहाज में चलते थे वे भी हवाई चप्पल पर आ गए। एक के एक बाद एक बड़ी विमानन कंपनियां बंद हो गईं। जेट और गो एयर जैसी बड़ी कंपनियां बंद हुईं। उनके जहाज खड़े हो गए। दो कंपनियों का एकाधिकार अब पूरे विमानन उद्योग पर है। ये कंपनियां मनमाने...

  • भारत अब कूटनीति भी दिखाता है!

    कूटनीति गुपचुप मौन में होती है। पर इन दिनों भारत कूटनीति और सैन्य ऑपरेशन (आरपेशन सिंदूर) दोनों का एक सा प्रदर्शन कर रहा है। भारत अपनी कूटनीति को साउथ ब्लॉक के गलियारों की मौन रणनीति के मौन परिणामों से नहीं, बल्कि ड्रॉइंग रूम, फ़ोन की स्क्रीन और खाने की मेज़ों तथा फोटोशूट से दिखलाता है। विदेश नीति तभी विशिष्ट कूटनीतिज्ञों का कौशल और कला थी। लेकिन पिछले ग्यारह वर्षों में यह बदला है। इसका श्रेय निर्विवाद रूप से नरेंद्र मोदी को जाता है। जिस दिन वे विदेश की ज़मीन पर शोमैन के आत्मविश्वास के साथ उतरे — जयकारों का हाथ...

  • मसीहाई घोषणा के बाद

    जीएसटी की 28 और 12 प्रतिशत की दरें खत्म करने से 46,000 करोड़ रुपये से अधिक की राजस्व क्षति होगी। इस नुकसान को कौन वहन करेगा? क्या इसे राज्यों को भी साझा करना होगा? अथवा, केंद्र उन्हें मुआवजा देगा? अब साफ है कि बिना प्रक्रियाओं को पूरा किए प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के ढांचे में परिवर्तन की घोषणा कर दी। घोषणा के पहले इस बारे में आम सहमति बनाने के किसी प्रयास का संकेत भी नहीं है। अब चूंकि नरेंद्र मोदी दिवाली का ये उपहार देने का एलान कर चुके हैं, तो उसे साकार...

  • मंत्रिमंडल विस्तार भी नहीं होगा

    भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के चुनाव की तरह केंद्रीय मंत्रिमंडल का विस्तार भी टला हुआ है। कहा जा रहा था कि बिहार चुनाव से पहले मंत्रिमंडल में एक विस्तार होगा, जिसमें बिहार से कुछ नए चेहरों को शामिल किया जा सकता है। लेकिन अब इसकी संभावना कम दिख रही है क्योंकि बिहार के चेहरे सरकार में शामिल करके मैसेज बनवाने का समय भी काफी कम रह गया है। अगर उप राष्ट्रपति के चुनाव यानी नौ सितंबर के बाद मंत्रिमंडल का विस्तार होता है तो उसको प्रतीकात्मक ही माना जाएगा और उसका बहुत राजनीतिक लाभ नहीं मिल पाएगा। गौरतलब है...

  • मंत्रियों का मामला भी ऐंवे ही है!

    भारत सरकार के मंत्रियों की क्या हैसियत हो गई है? राष्ट्रीय अध्यक्ष की हैसियत के नेता नरेंद्र मोदी के लिए माला पकड़ कर खड़े होते हैं। उस माला में घुसने की इजाजत उनको नहीं होती है। यह धारणा बनी है कि ले देकर एक अमित शाह हैं, जिनकी कोई हैसियत है लेकिन संसद के मानसून सत्र में यह भी दिखा कि पक्ष और विपक्ष में उनकी हैसियत पर ही चिंदियां गिरती दिखी।  वे गिरफ्तारी और 30 दिन की हिरासत पर मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री को कुर्सी से हटाने वाला विधेयक पेश कर रहे थे तो उसे उन्होने अगली पंक्ति में...

  • पर आत्मनिर्भर भारत का ‘कल’ कभी नहीं आएगा!

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन में हर साल भारत को एक नए सवेरे का वादा मिला है!  हर वर्ष का हिसाब यदि लगाए तो प्रति वर्ष नई थीम पर एक नारा, एक प्रण और शुरू एक काउंटडाउन। मतलब कल हमेशा नए नाम से, नई पैकेजिंग में लौट आता है!  मानो पूरा देश एक स्थायी वेटिंग रूम में नए वादों की स्थाई इंतजारी की नियति लिए हुए हो। और ऐसा इस स्वतंत्रता दिवस पर भी हुआ। पुराना नारा नए मौसम के लिए चमका दिया गया—पुरानी शराब, नई बोतल। और सोमवार तक उसके पैकेज को सरकार ने बाकायदा और महत्वाकांक्षी, और तात्कालिक...

  • पार्टी और सरकार में एक साथ फेरबदल

    एक चर्चा यह भी है कि भारतीय जनता पार्टी के संगठन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में एक साथ फेरबदल होगी। लेकिन यहां मुश्किल यह है कि अचानक पार्टी में बदलाव की चर्चा थम गई है। पिछले महीने एक के बाद एक आधा दर्जन से ज्यादा राज्यों में प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति हुई। महाराष्ट्र से लेकर तेलंगाना, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति हो गई। ध्यान रहे 14 प्रदेशों में संगठन का चुनाव होने के बाद सारी प्रक्रिया ठहर गई थी। कई महीनों तक सब कुछ रूका रहा। अचानक प्रदेशों में संगठन चुनाव हुए...

  • मनी ट्रांसफर के ज़रिए!

    यह सुनिश्चित करने की जरूरत होगी कि सरकार जो पैसा दे, उससे सचमुच उसके लक्ष्य हासिल हों। वरना, ताजा घोषित योजनाएं रोजगार और अनुसंधान की सूरत सुधारने के बजाय निजी क्षेत्र को मनी ट्रांसफर का माध्यम भर बन कर रह जाएंगी। केंद्र ने दो वर्षों के अंदर साढ़े तीन करोड़ स्थायी नौकरियां दिलवाने और अनुसंधान, विकास एवं आविष्कार (आरएंडडी) को बढ़ावा देने के लिए एक-एक लाख करोड़ रुपये की दो योजनाओं का एलान किया है। दोनों का सार यह है कि सरकार अपने खजाने से ये बड़ी रकम प्राइवेट सेक्टर को ट्रांसफर करेगी और उनसे अपेक्षा रखी जाएगी कि वे...

  • फट गया है “ हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान” की नारेबाजी का गुब्बारा!“

    झूठे नारों का गुब्बारा फटना था। बहुत ज्यादा हवा भर दी। कांग्रेस पीओके नहीं ले पाई हम ले लेंगे। सेना को खुली छूट नहीं देते थे हम देंगे। अंग्रेजी बोलना शर्म की बात होगी। हिंदी को दक्षिण की भी भाषा बना देगें। यहां महाराष्ट्र जिसका एक हिस्सा विदर्भ पूरा हिंदी भाषी है वहां से भी हिंदी हटा ली। आम जनता नहीं, भाजपा के कट्टर समर्थकों में भी बैचेनी है। खुद पार्टी में और संघ में भी। हंड्रेड परसेन्ट अगर कोई अभी भी मोदी का समर्थन कर रहा है तो वह गोदी मीडिया है। सिर्फ उसके सहारे मोदी बाजी पलटने की...

  • अब प्रोपेगेंडा पर्व की रैकिंग

    लोकतंत्र की सेहत बताने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भारत की रैंकिंग लगातार कम करती जा रही हैं। दुनिया की जानी मानी संस्था वी-डेम की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत 179 देशों की सूची में सौवें स्थान पर है। इस संस्था ने भारत को ‘निर्वाचित निरंकुशता’ की श्रेणी में रखा है। इसी को अघोषित इमरजेंसी कहा जा रहा है। सवाल है कि क्या ‘निर्वाचित निरंकुशता’ के बावजूद भारत में काम वैसे हो रहे हैं, जैसे घोषित इमरजेंसी के कथित अनुशासन पर्व में था? सारे आंकड़े इशारा कर रहे हैं कि काम की बजाय सरकार शत-प्रतिशत प्रोपेगेंडा केंद्रीत है। ‘न...

  • सरकार के 11 साल की वाहवाही कहां?

    नरेंद्र मोदी की तीसरी सरकार ने नौ जून के एक साल पूरे किए। इससे पहले 26 मई को उनको प्रधानमंत्री बने 11 साल हुए थे। लेकिन तीसरी सरकार के एक साल और उनके प्रधानमंत्री बनने के 11 साल का जश्न एक ही साथ शुरू हुआ। इससे ठीक पहले सरकार ऑपरेशन सिंदूर और उस पर कूटनीतिक माहौल बनाने के लिए दुनिया भर में भेजे गए डेलिगेशन का नैरेटिव बन रहा था। हालांकि भाजपा को ज्यादा मौका मिल नहीं सका। नौ जून से उत्सव शुरू हुआ था और 12 जून को अहमदाबाद में भीषण विमान हादसा हो गया। सो, सरकार को ज्यादा...

  • मोदी सरकार की सालगिरह पर बदलाव

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीसरी सरकार की पहली सालगिरह आने वाली है। चूंकि इस समय पहलगाम हमले की वजह से देश में गुस्से और शोक का माहौल है इसलिए सरकार की सालगिरह की तैयारियों की चर्चा नहीं है। लेकिन सरकार सालगिरह मनाएगी और उससे पहले बड़ी सैन्य कार्रवाई भी हो सकती है, जिससे देश के लोगों को जोश लौटे। इस बीच चर्चा है कि सरकार के एक साल पूरे होने के मौके पर ही सरकार और संगठन में बदलाव होगा। जानकार सूत्रों का कहना है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव अगले महीने तक टल गया है। पहले कहा जा रहा...

  • एक साथ कितने काम होंगे!

    सरकार ने कई बड़ी घोषणाएं और कई बड़े वादे कर दिए हैं। सब पर एक साथ अमल शुरू होने वाला है। अगर ऐसा होता है तो देश कई बरसों तक राजनीतिक और सामाजिक घटनाक्रमों में उलझा रहेगा। कहा जा रहा है कि सरकार अगले साल जनगणना कराएगी, जिसमें जातियों की गिनती होगी। इसके लिए संविधान संशोधन का बिल इस साल मानसून सत्र में पेश किया जाएगा। उसके बाद राज्यों और जिलों की भौगोलिक सीमा में बदलाव को रोकने का निर्देश जारी होगा और फिर जनगणना की अधिसूचना जारी होगी। इस बार जनगणना में जातियों की गिनती होगी। ध्यान रहे पूरा...

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