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  • मध्यावधि चिंतन या चिंता?

    नरेंद्र मोदी की तीसरी सरकार मध्यावधि में पहुंच गई है। सरकार के ढाई साल पूरे होने वाले हैं। उससे पहले प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के साथ दो दिन की चिंतन बैठक की है। मंत्रिपरिषद के सदस्यों के साथ प्रधानमंत्री पहले भी समय समय पर बैठक करते रहे हैं, जिसमें मंत्रालयों के कामकाज की समीक्षा होती है और आगे की रूपरेखा पर चर्चा की जाती है। ऊपरी तौर पर इस बार भी यही बताया जा रहा है कि सरकार के कामकाज को लेकर चर्चा हुई और 2047 तक विकसित भारत बनाने के लक्ष्य को पूरा करने के उपायों और...

  • हाँक सके सो हाँक!

    1970 के दशक वाले सोवियत रूसी समाज की स्थिति जैसी हालत लगती है। जब वहाँ नेता नियमित झूठ से ही अपने देश को 'उत्साहित' यानी भ्रमित रखते थे। वहाँ किसी बात या स्थिति की आलोचना अथवा परीक्षण का कोई स्थान न था। फलतः समय के साथ नेतागण भी अपने ही प्रोपेगंडा के शिकार खुद बन चुके थे! इसीलिए जब झूठी नीतियों की विफलता से बनी चुनौती की स्थिति सामने आई, तब नेता डफर साबित हुए।‌ उस किंकर्तव्यविमूढ़ता का परिणाम सोवियत विघटन (1991) भी था। भारत का समाज, संस्कृति, नैतिकता, शिक्षा, तथा अंतरराष्ट्रीय स्थिति -- इन सब में जितनी ही हालत...

  • हवा बदल रही है?

    इस वर्ष दो घटनाओं ने हवा बदलने में निर्णायक काम किया। यह थे -- शिक्षा और मंदिर पर घमंडी लापरवाही। पहली थी: यूजीसी गाइडलाइन्स, जिस ने भाजपा को हिन्दू स्टार से एक बौना वी.पी. सिंह बना दिया। .... रही-सही कसर अयोध्या राम मंदिर में बेफिक्र और नियमित चोरी ने पूरी कर दी। दोनों घटनाओं ने दिखाया कि बेचारे आदर्शवादी हिन्दू को बरसों से केवल उल्लू बनाया गया। विवेकानन्द और शिवाजी केवल फोटो दिखाकर लुभाने, विज्ञापन बेचने के बहाने जैसे थे। कॉकरोच, वांगचुक, इस्तीफा, गाली, बाँकीपुर, आरक्षण-विरोधी आक्रोश, 'फ्रेंड्स' और रात में रील बनाना ... यह सब शायद चार वर्ष पहले...

  • कोई काम बचा ही नहीं!

    असल में यही वह एप्रोच है, जिसकी वजह से कहा जाता है कि सब काम हो गए। पिछले 12 साल में हर क्षेत्र की योजनाएं शुरू कर दी गईं, नारे गढ़ दिए गए, अभियान चला दिए गए और कह दिया गया कि काम पूरा हो गया। देश में स्वच्छता अभियान शुरू हुआ। महात्मा गांधी का चश्मा उसका लोगो बना। इस अभियान को सफल घोषित कर दिया गया लेकिन हकीकत यह है कि राजधानी दिल्ली में हर दिन सैकड़ों टन कचरा नहीं उठता है। 45 डिग्री सेल्सियस की गर्मी में भी दिल्ली की हवा प्रदूषित हुई और ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान...

  • समस्याएं बुनियादी, समाधान दिखावटी

    देश में कुछ करने के लिए इसलिए भी कुछ नहीं बचा है क्योंकि सारी समस्याओं को ऊपर ऊपर दूर करने के उपाय कर दिए गए हैं। उनके लिए योजनाएं घोषित कर दी गई हैं। यह समझने का प्रयास नहीं किया गया है कि भारत की समस्याएं बुनियादी हैं और दिखावटी उपायों से उनका समाधान नहीं हो सकता है। दिखावटी उपाय सिर्फ वोट लेने के लिए होते हैं। दुनिया की सारी सरकारें कुछ काम दिखावटी करती हैं, जिसका मकसद वोट की राजनीति साधना होता है। लेकिन भारत में तो ऐसा लग रहा है जैसे सारे ही काम सिर्फ वोट लेने के...

  • मोदी सरकार में भी फेरबदल होगी

    भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की टीम बनने के साथ साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टीम में भी फेरबदल की खबरें हैं। बताया जा रहा है कि अगले महीने सरकार के दो साल पूरे होंगे उससे ठीक पहले या तुरंत बाद बदलाव हो सकता है। ध्यान रहे नौ जून 2024 को सरकार गठन के बाद से प्रधानमंत्री मोदी ने कोई फेरबदल नहीं की है। माना जा रहा है कि अगले साल होने वाले सात राज्यों के विधानसभा चुनावों की तैयारियों को ध्यान में रखते हुए फेरबदल होगी। वैसे भी लोकसभा चुनाव के बाद जिस तरह का जनादेश मिला था...

  • संसद में हारी मोदी सरकार

    नई दिल्ली। नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन के लिए लाए गए संविधान के 131वें संशोधन विधेयक को लोकसभा ने खारिज कर दिया है। पहली बार ऐसा हुआ है कि नरेंद्र मोदी सरकार का लाया हुआ कोई बिल लोकसभा से पास नहीं हो सका। दो दिन की चर्चा के बाद शुक्रवार की शाम साढ़े सात बजे के करीब संविधान संशोधन विधेयक को वोटिंग के लिए रखा गया। बिल के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। चूंकि यह संविधान संशोधन बिल था इसलिए इसे पास कराने के लिए विशेष बहुमत की जरुरत थी। इस विधेयक को पास कराने...

  • हिंदू चिंता है या हिंदुओं को मरवाना?

    मोदी सरकार इन दिनों हेडलाइन मैनेजमेंट में बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या पर सुर्खियां बनवा रही है। क्यों? ताकि बंगाल में आने वाले विधानसभा चुनाव में हिंदू ममता को हराएं और मोदी-भाजपा को जिताएं। बंगाल और असम दोनों में हिंदू बनाम मुस्लिम भावना चुनाव जीतने का मोदी मंत्र है। सो, बांग्लादेश में हिंदू जितने मरे, वहां के चुनाव में कट्टरपंथियों का जितना भी जलवा बने उससे उतने ही बंगाल में भाजपा के हिंदू वोट बढ़ेंगे। फिर भले बांग्लादेश में हिंदुओं की विपदा बढ़ती जाए। डेढ़ करोड़ हिंदुओं (हां, बांग्लादेश की आबादी में है आठ प्रतिशत हिंदू) के मरने, भागने, मिटने...

  • मोदी सरकार, ब्रिक्स+ और श्रमिक नजरिया

    ब्रिक्स+ बदलाव का एक प्रतीक है। इसलिए इसके महत्त्व को कम-से-कम श्रमिक वर्ग को अवश्य समझना चाहिए। ... भारत सरकार इस मामले में जो भी रुख अपनाए, भारत के मेहनतकश तबकों को इसके महत्त्व को अवश्य समझना चाहिए। भारत सरकार ब्रिक्स+ के महत्त्व के मुताबिक इसके शिखर सम्मेलन को अहमियत दे, इसके लिए उन्हें दबाव बनाना चाहिए। इसकी वजह यह है कि ब्रिक्स+ मौजूदा विश्व व्यवस्था के साम्राज्यवादी ढांचे के लिए एक चुनौती बन कर उभरा है। नये साल में भू-राजनीति के लिहाज से भारत के लिए सबसे बड़ा मौका ब्रिक्स+ समूह के शिखर सम्मेलन की मेजबानी के रूप में...

  • आधी रात को बिल पास करने का चलन

    ऐसा लग रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को आधी रात तक या उसके बाद भी संसद चलाने का चस्का लग गया है। बहुत पहले आधी रात को संसद का सत्र बुला कर वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी कानून पास किया गया था। यह 2017 की बात है। उसके बाद इस साल यानी 2025 में सरकार ने कम से कम तीन दिन आधी रात के बाद तक चर्चा कराई और विधेयक पास किए। ताजा मामला महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना यानी मनरेगा की जगह विकसित भारत जी राम जी बिल का है। संसद में इसे सरकार...

  • सरकार ने जरूरी मुद्दे छोड़ दिए

    संसद के शीतकालीन सत्र में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रदूषण का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में बढ़ रहे वायु प्रदूषण पर चर्चा होनी चाहिए। सरकार ने इस पर चर्चा नहीं कराई। उलटे सत्र खत्म हुआ तो सरकार की ओर से कहा गया कि कांग्रेस चर्चा नहीं चाहती थी। सोचें, कांग्रेस तो वंदे मातरम् पर भी चर्चा नहीं चाहती थी लेकिन सरकार ने कराई। कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां मनरेगा की जगह विकसित भारत जी राम जी बिल का भी विरोध कर रही थीं लेकिन सरकार ने आधी रात तक चर्चा...

  • मोदी सरकार में फेरबदल की तैयारी

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल का पहला साल बहुत अच्छा नहीं बीता है। पहलगाम कांड और ऑपरेशन सिंदूर के सीजफायर से लेकर अमेरिका के साथ टैरिफ विवाद और व्यापार संधि में समझौता करने की चर्चाओं के बीच पहला साल बीता। हालांकि लोकसभा चुनाव में लगे झटके से पार्टी उबर गई है। एक के बाद एक कई राज्यों में चुनाव जीत कर भाजपा ने लोकसभा में हुए नुकसान को पीछे छोड़ दिया है। फिर भी यह पहली बार है, जब नरेंद्र मोदी गठबंधन की सरकार चला रहे हैं और सहयोगी पार्टियों का प्रत्यक्ष या परोक्ष दबाव झेल रहे हैं। बिहार...

  • सरकारों को हराना अब मुश्किल है!

    इस पर गंभीरता से अध्ययन करने की जरुरत है कि जो सरकार में है उसके हारने का अनुपात क्यों कम होता जा रहा है? यह भी देखने की जरुरत है कि क्या एंटी इन्कम्बैंसी यानी सत्ता विरोध, जो भारतीय राजनीति में हमेशा निर्णायक फैक्टर होता था उसकी प्रासंगिकता खत्म हो गई है? ये दो सवाल इसलिए हैं क्योंकि अब सरकारें चुनाव नहीं हार रही हैं। जो सत्ता में है वह किसी न किसी तरह से ऐसे उपाय कर रहा है, उसकी पार्टी चुनाव जीत जा रही है। इसके अपवाद भी हैं लेकिन सरकारों की सत्ता में वापसी पहले से ज्यादा...

  • सरकार से सवाल, मतलब साजिश!

    यह भारत का इतिहास है। केवल नरेंद्र मोदी ही जिम्मेदार नहीं हैं। आखिर इंदिरा गांधी के जमाने में दुष्यंत कुमार ने लिखा था, ‘मत कहो आकाश में कुहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है’। तब भी घने कोहरे की शिकायत को किसी की व्यक्तिगत आलोचना मान लिया जाता था। अब तो सच में ऐसी घटनाएं हो रही हैं कि  ज्यादा गर्मी पड़ने की शिकायत करें तो भक्त मंडली लड़ने आ जाती है कि क्या पहले गर्मी नहीं पड़ती थी! तो यह भारत का इतिहास है कि अगर नागरिक ने अपनी पीड़ा व्यक्त की, अपनी तकलीफें बताई तो उसे...

  • हवाई चप्पल की विमान, ट्रेन व सड़क हरियाली!

    प्रधानमंत्री मोदी ने सपना दिखाया था कि हवाई चप्पल वाला भी हवाई जहाज में उड़े। और हुआ क्या? वे खुद तो साढ़े आठ हजार करोड़ रुपए के हवाई जहाज में उड़ने लगे लेकिन दूसरी तरफ हकीकत है कि हवाई चप्पल वाला तो हवाई जहाज में नहीं बैठ सका पर जो हवाई जहाज में चलते थे वे भी हवाई चप्पल पर आ गए। एक के एक बाद एक बड़ी विमानन कंपनियां बंद हो गईं। जेट और गो एयर जैसी बड़ी कंपनियां बंद हुईं। उनके जहाज खड़े हो गए। दो कंपनियों का एकाधिकार अब पूरे विमानन उद्योग पर है। ये कंपनियां मनमाने...

  • भारत अब कूटनीति भी दिखाता है!

    कूटनीति गुपचुप मौन में होती है। पर इन दिनों भारत कूटनीति और सैन्य ऑपरेशन (आरपेशन सिंदूर) दोनों का एक सा प्रदर्शन कर रहा है। भारत अपनी कूटनीति को साउथ ब्लॉक के गलियारों की मौन रणनीति के मौन परिणामों से नहीं, बल्कि ड्रॉइंग रूम, फ़ोन की स्क्रीन और खाने की मेज़ों तथा फोटोशूट से दिखलाता है। विदेश नीति तभी विशिष्ट कूटनीतिज्ञों का कौशल और कला थी। लेकिन पिछले ग्यारह वर्षों में यह बदला है। इसका श्रेय निर्विवाद रूप से नरेंद्र मोदी को जाता है। जिस दिन वे विदेश की ज़मीन पर शोमैन के आत्मविश्वास के साथ उतरे — जयकारों का हाथ...

  • मसीहाई घोषणा के बाद

    जीएसटी की 28 और 12 प्रतिशत की दरें खत्म करने से 46,000 करोड़ रुपये से अधिक की राजस्व क्षति होगी। इस नुकसान को कौन वहन करेगा? क्या इसे राज्यों को भी साझा करना होगा? अथवा, केंद्र उन्हें मुआवजा देगा? अब साफ है कि बिना प्रक्रियाओं को पूरा किए प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के ढांचे में परिवर्तन की घोषणा कर दी। घोषणा के पहले इस बारे में आम सहमति बनाने के किसी प्रयास का संकेत भी नहीं है। अब चूंकि नरेंद्र मोदी दिवाली का ये उपहार देने का एलान कर चुके हैं, तो उसे साकार...

  • मंत्रिमंडल विस्तार भी नहीं होगा

    भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के चुनाव की तरह केंद्रीय मंत्रिमंडल का विस्तार भी टला हुआ है। कहा जा रहा था कि बिहार चुनाव से पहले मंत्रिमंडल में एक विस्तार होगा, जिसमें बिहार से कुछ नए चेहरों को शामिल किया जा सकता है। लेकिन अब इसकी संभावना कम दिख रही है क्योंकि बिहार के चेहरे सरकार में शामिल करके मैसेज बनवाने का समय भी काफी कम रह गया है। अगर उप राष्ट्रपति के चुनाव यानी नौ सितंबर के बाद मंत्रिमंडल का विस्तार होता है तो उसको प्रतीकात्मक ही माना जाएगा और उसका बहुत राजनीतिक लाभ नहीं मिल पाएगा। गौरतलब है...

  • मंत्रियों का मामला भी ऐंवे ही है!

    भारत सरकार के मंत्रियों की क्या हैसियत हो गई है? राष्ट्रीय अध्यक्ष की हैसियत के नेता नरेंद्र मोदी के लिए माला पकड़ कर खड़े होते हैं। उस माला में घुसने की इजाजत उनको नहीं होती है। यह धारणा बनी है कि ले देकर एक अमित शाह हैं, जिनकी कोई हैसियत है लेकिन संसद के मानसून सत्र में यह भी दिखा कि पक्ष और विपक्ष में उनकी हैसियत पर ही चिंदियां गिरती दिखी।  वे गिरफ्तारी और 30 दिन की हिरासत पर मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री को कुर्सी से हटाने वाला विधेयक पेश कर रहे थे तो उसे उन्होने अगली पंक्ति में...

  • पर आत्मनिर्भर भारत का ‘कल’ कभी नहीं आएगा!

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन में हर साल भारत को एक नए सवेरे का वादा मिला है!  हर वर्ष का हिसाब यदि लगाए तो प्रति वर्ष नई थीम पर एक नारा, एक प्रण और शुरू एक काउंटडाउन। मतलब कल हमेशा नए नाम से, नई पैकेजिंग में लौट आता है!  मानो पूरा देश एक स्थायी वेटिंग रूम में नए वादों की स्थाई इंतजारी की नियति लिए हुए हो। और ऐसा इस स्वतंत्रता दिवस पर भी हुआ। पुराना नारा नए मौसम के लिए चमका दिया गया—पुरानी शराब, नई बोतल। और सोमवार तक उसके पैकेज को सरकार ने बाकायदा और महत्वाकांक्षी, और तात्कालिक...

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