झूठे नारों का गुब्बारा फटना था। बहुत ज्यादा हवा भर दी। कांग्रेस पीओके नहीं ले पाई हम ले लेंगे। सेना को खुली छूट नहीं देते थे हम देंगे। अंग्रेजी बोलना शर्म की बात होगी। हिंदी को दक्षिण की भी भाषा बना देगें। यहां महाराष्ट्र जिसका एक हिस्सा विदर्भ पूरा हिंदी भाषी है वहां से भी हिंदी हटा ली। आम जनता नहीं, भाजपा के कट्टर समर्थकों में भी बैचेनी है। खुद पार्टी में और संघ में भी। हंड्रेड परसेन्ट अगर कोई अभी भी मोदी का समर्थन कर रहा है तो वह गोदी मीडिया है। सिर्फ उसके सहारे मोदी बाजी पलटने की कोशिश कर रहे हैं।
क्या समझ आया कि मोदी सरकार डबल सरकार के बावजूद हिंदी के लिए भी डटे नहीं रह सकी! महाराष्ट्र में डबल इंजन की सरकार ने हिंदी को पढ़ाए जाने का फैसला वापस ले लिया। हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान का ही तो नारा था भाजपा का। सबसे बड़ा, सबसे मुख्य। हिंदी पर झुक गए। हिंदुस्ताऩ पर अभी आपने देखा ही की ट्रंप हमारे नाम पर फैसले कर रहे है। अमेरिका के राष्ट्रपति ने कहा था शाम पांच बजे सीजफायर हो जाएगा। और हमने कर दिया। हिंदुस्तान का नाम लेते थे अपने विशेष उच्चारण के साथ यह बताने के लिए कि यह केवल हिंदुओं का स्थान है। हिंदुस्तान में यह बहस आ जाती है कि सिंधु घाटी में प्रवेश करते समय तुर्क और ईरानियों ने इसे अपने उच्चारण में सिंधू के बदले हिंदू कहा था। वे स का उच्चारण ह करते थे। बहुत सारी कहानियां हैं। यह भी कहा जाता है कि यहां रहने वालों को फारसी और अरबी में हिंदू कहा जाता था। इसलिए हिंदुस्तान नाम पड़ा।
यह जो नारा हमने उपर लिखा है इसमें मूल रूप से हिंदुस्तान शब्द ही था। कुछ साहित्यकार जो उर्दू के और भारत की मिलीजुली संस्कृति के खिलाफ थे यह उनका दिया हुआ नारा है। जो भाजपा संघ के जन्म से भी पहले का है। इसी को भाजपा संघ ने हिंदुस्तान को हिंदुस्थान में परिवर्तित करके अपना मूल नारा बनाया। जो लोग भाजपा की सरकारों द्वारा रोज नाम परिवर्तन करने पर आश्चर्य करते हैं उनकी हैरत थोड़ी कम होगी जब उन्हें यह मालूम पड़ेगा कि उनकी यह राजनीति शुरू से है।
अभी लेटेस्ट यह देख लिया होगा कि विदेश में प्रधानमंत्री मोदी के पहुचने पर वहां रह रही एक महिला कहती है कि पहले हमसे कहते थे भारत से आए हो और सम्मान नहीं मिलता था। अब कहते हैं मोदी के देश से आए हो और सम्मान से देखते हैं। हो सकता है देश का नाम मोदी का देश रख दिया जाए।
तो हिंदुस्तान से आगे मोदी का देश तक का सफर हो सकता है। लेकिन वह तब जब मोदी आज जिस तरह हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान पर घिरे हुए हैं उससे निकल पाएं। प्रधानमंत्री मोदी के लिए 11 साल के कार्यकाल में मौजूदा समय सबसे प्रतिकूल है। और विपक्ष के लिए सबसे अनुकूल। लेकिन विपक्ष क्या कर पाता है इससे ही फैसला होगा कि मोदी बच कर निकल पाते हैं या यह सीजफायर, सेना का यह आरोप कि उसके हाथ बांध दिए जिसकी वजह से उसे अपने जेट (युद्धक विमान) खोने पड़े और हिंदी पर भी लुढ़कना हुआ। यह सब उनके लिए वाटरलू बन सकता है।
यह समय भ्रष्टाचार, जीएटी, बेरोजगारी और बहुत सारे दूसरे मुद्दों को उठाने का नहीं है। इन्हे विपक्ष उठाता रहा है। राहुल गांधी ने चौकीदार ही चोर है से लेकर गब्बर सिंह टैक्स तक सब कहा। मगर मोदी पर ये हमले बेअसर रहे। कांग्रेस इस समय भी यही सवाल उठा रही है। इन्हें मोदी देखते ही नहीं हैं। उनकी सेहत पर इन सवालों का कोई असर नहीं पड़ता है।
लेकिन जैसा हमने शुरू किया हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान वह इनका मर्म है। और आज विपक्ष को वही मर्मभेदी बाण चलाने की जरूरत है। भाजपा का हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान या स्थान का सारा नेरटिव ( इमेज, माहौल) मोदी ने फेलकर दिया है। भाजपा पूरी तरह एक्सपोज हो गई है। हिंदी का हमने बताया। सबसे ज्यादा राजनीति इसी पर करते हैं। मगर महाराष्ट्र में भाजपा की डबल इंजन सरकार ने कक्षा एक से पांच तक हिंदी पढ़ाने के अपने फैसले को वापस ले लिया। अब इन क्लासों में शिक्षा का माध्यम मराठी या अंग्रेजी होगा। वहीं अंग्रेजी जिस के लिए अभी कुछ दिन पहले भाजपा और केन्द्र सरकार के नंबर दो नेता अमित शाह ने कहा था कि इसे बोलने वालों को शर्म आएगी। अब वही पढ़ाई का माध्यम है। क्योंकि मराठी वाले तो मराठी माध्यम से पढ़ ही रहे हैं। केवल हिंदी वालों को अब मराठी या अंग्रेजी माध्यम में जाना होगा।
यह लोग केवल बोलते हैं। उस पर अमल क्या होता है यह अब दिखने लगा है। 15 लाख आएंगे हर खाते में, दो करोड़ रोजगार देंगे हर साल और बाकी घोषणाओं का कचूमर पहले ही निकल चुका है। मगर अभी भी टिके हैं तो वह इन्हीं तीन आधारों पर। हिंदी छोड़ दी। हिंदुस्तान का सम्मान दांव पर लगा दिया। अभी जो ट्रंप 20 बार कह चुके है कि बिजनेस के लिए सीजफायर किया वह सामने दिखने वाला है। डील तैयार हो गई है। केवल भारत को दस्तखत करना है। या ज्यादा सही यह कहना होगा कि केवल स्वीकार करना है। पूरी तरह भारत की कृषि व्यवस्था की विरोधी, यहां के लघु, मध्यम उद्योगों को खत्म करने वाली पूरी तरह अमेरिका के पक्ष में झुकी हुई व्यापार संधि।
अब सवाल हिंदू का। उसे क्या दिया? पूरे नारे में सजीव तो वही है। हिंदी और हिंदुस्तान की प्रगति से मिलना तो उसी को चाहिए। केवल एक झूठा गर्व। और वह भी उसे कुछ देकर नहीं केवल यह बताकर कि मुस्लिम को इतना टाइट कर दिया है। नमाज, अजान, कब्रिस्तान, वक्फ उसके हर मामले में सवाल उठाकर उसे पीछे धकेल दिया है। 11 साल से एक छोटा सा हिस्सा मानता रहा कि मुस्लिम दबा दिया गया है। और मोदी का राष्ट्रवाद चमक रहा है।
लेकिन पहले पहलगाम के आतंकवादी हमले और उसके दोषियों का आज तक पता भी नहीं कर पाने, फिर सीजफायर और अब सेना द्वारा यह बताए जाने के हमें अपनी गलती से नुकसान नहीं राजनीतिक नेतृत्व की गलती से नुकसान उठाना पड़ा मोदी की चमक धुंधली पड़ गई। फिर हिंदी के मामले में भी भाजपा की पलटी ने उसका यह अहसास और बड़ा दिया कि राष्ट्रवाद की तरह भाषा की बात भी खाली हमें बरगलाने के लिए थी। मोदी को सिवा अपनी राजनीति के किसी और मामले में चाहे वह देश, भाषा हिंदी कुछ भी हो किसी से कोई जुड़ाव नहीं है। और अगर हिंदी और हिंदुस्तान से नहीं है तो फिर हम हिंदू से भी नहीं।
यहां हिंदू का मतलब उनके नारे के संदर्भ में ही है। बाकी हिंदुओं का बड़ा वर्ग शुरू से मोदी के जुमलों को समझता रहा है। इसलिए उन्हें इन्दिरा और राजीव गांधी की तरह साढ़े तीन सौ और चार सौ से उपर सीटें कभी नहीं दीं। झूठे नारों का गुब्बारा फटना था। बहुत ज्यादा हवा भर दी। कांग्रेस पीओके नहीं ले पाई हम ले लेंगे। सेना को खुली छूट नहीं देते थे हम देंगे। अंग्रेजी बोलना शर्म की बात होगी। हिंदी को दक्षिण की भी भाषा बना देगें। यहां महाराष्ट्र जिसका एक हिस्सा विदर्भ पूरा हिंदी भाषी है वहां से भी हिंदी हटा ली। आम जनता नहीं, भाजपा के कट्टर समर्थकों में भी बैचेनी है। खुद पार्टी में और संघ में भी। हंड्रेड परसेन्ट अगर कोई अभी भी मोदी का समर्थन कर रहा है तो वह गोदी मीडिया है। सिर्फ उसके सहारे मोदी बाजी पलटने की कोशिश कर रहे हैं।
विपक्ष के लिए इससे अनुकूल अवसर दूसरा नहीं हो सकता। बाकी सारे मुद्दे इस समय चलने वाले नहीं हैं। केवल भारत पाक संघर्ष में मोदी के ब्लंडर ही सबसे बड़ा मुद्दा है। विपक्ष और खासतौर से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस अगर केवल एक इसी मुद्दे पर खुद को केन्द्रीत कर ले तो मोदी के पास जवाब देने को कुछ नहीं होगा। मोदी देश का सम्मान बचा नहीं पाए। इन्दिरा होतीं तो बात कुछ और होती यह चर्चा आज हर जगह है। इसी पर मोदी की मात हो सकती है। और अगर विपक्ष ने यहां उन्हें निकल जाने दिया तो फिर मोदी नई जान पा जाएंगे। भाजपा और संघ की सुगबुगाहट भी खत्म हो जाएगी। क्रिकेट की तरह राजनीति में भी एक मौका मिलता है और अगर वह कैच नहीं पकड़ पाए लाइफ दे दी तो फिर जमा हुआ बैट्समैन और मुश्किलें खड़ी कर देगा।