ट्रंप और उनके अधिकारियों को इस बात का श्रेय देना होगा कि वे अपने मकसद को लेकर अक्सर कोई लाग-लपेट नहीं दिखाते। वे वही बोलते हैं, जो उनका मकसद है। … सार यह कि अमेरिक चाहता है कि दुनिया के तमाम देश अपने प्राकृतिक संसाधनों तक अमेरिकी कंपनियों की पहुंच निर्बाध बनने दें, अपने बाजार अमेरिकी उत्पादों के लिए खोल दें, और अपनी पूंजी अमेरिका में लगाएं।
डॉनल्ड ट्रंप के काल में अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय व्यवहार के कायदे पूरी तरह बदल दिए हैं। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि उसने नियम-कायदों की विश्व व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। वैसे तो कानून और सार्वजनिक मर्यादाओं के प्रति उसके मन में अपमान का जो भाव है, वह अमेरिका के घरेलू मामलों में भी कोई कम जाहिर नहीं हुआ है, लेकिन ये पहलू इस लेख का विषय नहीं है। इस लेख के संदर्भ में प्रासंगिक पहलू सिर्फ युद्ध में शामिल होने संबंधी अमेरिका के आंतरिक कायदे हैं, जिन्हें ट्रंप प्रशासन ने ठेंगा दिखा रखा है। इस तरह उसने अमेरिका में ‘अवरोध एवं संतुलन’ की कारगर संवैधानिक व्यवस्था होने की धारणा की धज्जियां उड़ा दी हैं।
वेनेजुएला और ईरान के खिलाफ युद्धों में अपने देश को शामिल करने के लिए ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी संविधान के अनुरूप कांग्रेस (संसद) की मंजूरी नहीं ली। वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई संक्षिप्त रही, इसलिए उस प्रकरण में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस पहलू पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई। लेकिन ईरान के खिलाफ जारी युद्ध में इस पर रोशनी पड़ी है। इससे यह समझना आसान हो जाता है कि आज के दौर में अमेरिकी शासक वर्ग अपने हितों को सुरक्षित करने के लिए उच्छृंखलता की किस हद तक चला गया है। क्यूबा पर संभावित अमेरिकी हमला इस रुझान की एक बार फिर पुष्टि करेगा।
अपने देश में अगर अमेरिकी शासक वर्ग के लिए लोकतंत्र की मर्यादाएं मायने नहीं रखतीं, तो जाहिर है, अंतरराष्ट्रीय व्यवहार में संप्रभुता जैसे सिद्धांत एवं अंतरराष्ट्रीय कानून की स्थापित व्यवस्थाओं को मानने की शायद ही उससे उम्मीद की जा सकती है। इसीलिए ट्रंप प्रशासन ने वेनेजुएला या ईरान- कहीं हमला करने के लिए वैधानिक तर्क पेश करने की जरूरत नहीं समझी है। वेनेजुएला के मामले में सीधे तौर पर वहां के कच्चे तेल पर कब्जा करने को अपना मकसद बताया। ईरान पर हमले से क्या मकसद हासिल करना है, इस पर ट्रंप और उनके अधिकारी अलग-अलग बातें करते रहे हैं- खुद ट्रंप ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने से लेकर वहां तख्ता पलट तक की बात कर चुके हैं।
मगर परमाणु हथियार का मुद्दा तो असल में कहीं रहा ही नहीं है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख रफायल मारियानो ग्रॉसी सार्वजनिक रूप से दो-टूक कह चुके हैं कि ईरान कहीं भी परमाणु बम बनाने के करीब नहीं था। ओमान की मध्यस्थता में जिनेवा में हुई वार्ता के दौरान आगे यूरेनियम संवर्धन ना करने पर ईरान राजी हो गया था। अपने पास मौजूद संवर्धित यूरेनियम को भी वह ईंधन बनाने में खर्च करने पर सहमत हो गया। ये बात ओमान के विदेश मंत्री ने अमेरिका जाकर एक टीवी इंटरव्यू में बताई। मगर उस इंटरव्यू के प्रसारण के कुछ ही घंटों के बाद अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर अवैध हमला बोल दिया।
तो जाहिर है, मकसद कुछ और था। अमेरिका के व्यवहार से साफ है कि यह मकसद उन देशों की सरकारों को हटाना या उन्हें अमेरिकी मंशा के मुताबिक झुकाना है, जो अपनी संप्रभुता को जताते हैं या जिन्होंने अपने विकास की संप्रभु परियोजना अपनाई हुई है। ऐसे तमाम देश आज अमेरिका के निशाने पर हैं। इस क्रम में ट्रंप अपने इस दो-टूक बयान को व्यवहार में उतार रहे हैं कि उनकी ताकत पर “उनकी अपनी नैतिकता या उनके अपने मन” के अलावा कोई अवरोध नहीं है।
तो ताकत का इस्तेमाल कर ट्रंप प्रशासन दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध से पहले की स्थिति में ले जाने के प्रयास में है, जब ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ के सिद्धांत से दुनिया चलती थी। जब ताकत के जोर से पश्चिमी देशों ने दुनिया के बहुत बड़े हिस्से को अपना उपनिवेश बना रखा था।
तो कहा जा सकता है कि जिस वक्त में हम हैं, वह दूसरे विश्व युद्ध के बाद एक बिल्कुल नई परिस्थिति है। यह स्थिति अचानक आई, ऐसा नहीं कहा जा सकता। सोवियत संघ के विघटन के बाद जब एक-ध्रुवीय दुनिया बनने का भाव अमेरिका में भरा, तब वहां ये राय भी बनी कि अब उसकी ताकत पर कोई नियंत्रण नहीं है। 21वीं सदी की शुरुआत होते-होते तत्कालीन जॉर्ज बुश जूनियर प्रशासन ने ‘एकतरफा कार्रवाई’ और ‘एहतियातन हमले’ की नीति का एलान कर दिया था। मतलब यह कि अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र और उसकी व्यवस्थाओं से खुद को अलग कर लिया।
बहरहाल, तब भी संयुक्त राष्ट्र से इतर ‘नियम आधारित विश्व व्यवस्था’ जैसी बातें अगर अमेरिका की जुबान पर थीं, तो कारण उसका यह भरोसा था कि ये नियम वॉशिंगटन में ही लिखे जाते हैं और उनका अमल अमेरिकी ताकत के जरिए ही कराया जाता है। इसलिए इन नियमों का पालन अमेरिकी शासक वर्ग के हित में है।
मगर एक तरफ अमेरिका की उत्पादक शक्ति चूकने एवं अर्थव्यवस्था का संकट बढ़ने तथा दूसरी तरफ चीन के अभूतपूर्व उदय से जल्द ही उस भरोसे में सेंध लगनी शुरू हो गई। कोरोना काल आते-आते अमेरिकी रणनीतिकार खुलेआम कहने लगे थे कि नियम आधारित विश्व व्यवस्था उनके लिए नुकसान का सौदा बन गई है। तो उन्होंने मुक्त व्यापार की वकालत छोड़ दी। इसके बदले वहां के शासकों ने अपने देश में औद्योगिक नीति पर अमल, सब्सिडी देने और आयात-निर्यात में अवरोध खड़े करने की राह पकड़ ली। जो बाइडेन के कार्यकाल में जिस तरह अमेरिका ने गज़ा में इजराइली मानव संहार का समर्थन किया, उससे भी यही जाहिर हुआ कि अब किसी नियम या मर्यादा का पालन करने के लिए अमेरिकी शासक वर्ग तैयार नहीं है। ट्रंप उस सोच को पराकाष्ठा पर ले गए हैँ।
ट्रंप काल के युद्ध उसी नजरिए का परिणाम हैं। युद्धों पर विचार करते हुए बरबस प्रशा (आज के जर्मनी का पूर्व रूप) के सैन्य रणनीतिकार कार्ल वॉन क्लॉजविट्ज की यह उक्ति याद आती है, जिसके मुताबिक “युद्ध राजनीति की ही निरंतरता अथवा उसका विस्तार है, जिसे अन्य साधनों से अंजाम दिया जाता है।” दूसरे शब्दों में इस कथन का अर्थ है कि जब राजनीति/कूटनीति से मकसद हासिल करना संभव नहीं रह जाता, तब राज्य युद्ध का सहारा लेते हैं।
कहा जाता है कि क्लॉजविट्ज के विश्लेषण को पढ़ते समय व्लादिमीर इलिच लेनिन इस वाक्यांश पर आकर ठहर गए थे। बाद में उन्होंने लिखा कि मार्क्सवाद के नजरिए से यह वाक्यांश हर युद्ध के अर्थ को समझने की सैद्धांतिक नींव है। द्वंद्वात्मक दृष्टिकोण (dialectical insight) हमें यह ढूंढने को बाध्य करता है कि कोई युद्ध आखिर किन नीतियों का विस्तार है। लेनिन ने ये टिप्पणी तब की, जिस समय पहला विश्व युद्ध चल रहा था। लेनिन ने प्रथम विश्व युद्ध को उपनिवेशों को हड़पने और उनके बाजारों पर कब्जा करने के लिए साम्राज्यवादी देशों का युद्ध बताया था।
Notes on Clausewitz’s Work नामक आलेख में लेनिन ने कहा: “लगभग आधी सदी तक यूरोप की सरकारें उपनिवेशों को लूटने, अन्य राष्ट्रों को दबाने, और मज़दूर वर्ग के आंदोलन को कुचलने की नीति पर चलती रहीं। प्रथम विश्व युद्ध इसी नीति की निरंतरता है।” इस कथन का अर्थ है कि युद्ध कोई सीमित घटना नहीं है। यह केवल शांति का विघटन नहीं है, जो शांति लौटने तक चलता रहता है। बल्कि यह वैश्विक स्तर पर तथा देशों के अंदर जारी वर्ग-संघर्ष का परिणाम है।
क्लॉजविट्ज ने कहा था कि विजेता हमेशा शांति का प्रेमी होता है, क्योंकि वह चाहता है कि दूसरे राज्य में उसका प्रवेश बिना प्रतिरोध के हो। लेकिन दूसरा राज्य अगर ये मंशा पूरी नहीं होने देता, तो फिर युद्ध अपरिहार्य हो जाता है। हालांकि क्लॉजविट्ज ने ये पंक्तियां नेपोलियन के युद्धों के सिलसिले में लिखी थीं, लेकिन ये आज डॉनल्ड ट्रंप के युद्धों पर पूरी तरह लागू होती हैं।
अब प्रश्न है कि अमेरिकी शासक वर्ग क्यों ट्रंप के पीछे पूरी तरह लामबंद हो गया है? इसकी वजह यह है कि आम तौर पर पश्चिम, और खास तौर पर अमेरिका की आर्थिक क्षमता वैश्विक वर्चस्व को बनाए रखने के लिहाज से अत्यधिक दबाव में है और वहां की राजनीतिक व्यवस्था आंतरिक विभाजन की शिकार है- यानी औद्योगिक रूप से पश्चिम/अमेरिका दुर्बल और वैचारिक रूप से गुमराह हो चुका है। विश्व के बहु-ध्रुवीय बनने की संभावना एक वास्तविकता के रूप में पश्चिम के सामने मौजूद है। पारंपरिक तरीकों से इन संभावनाओं को हकीकत बनने से रोका नहीं जा सकता। तो पश्चिमी शासक वर्ग इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि अब युद्ध ही रास्ता है। समृद्ध और खुशहाल समाज बनाने की पश्चिमी व्यवस्थाओं की क्षमताएं चुक गई हैं, मगर व्यापक विनाश की क्षमता उसके पास आज भी है। तो उसका इस्तेमाल कर अपने क्षयशील वर्चस्व को वापस पाने की मुहिम उसने छेड़ दी है।
बहु-ध्रुवीय विश्व के निर्माण के माध्यम वे देश ही हैं, जिन्होंने अपने विकास की संप्रभु परियोजनाएं अपना रखी हैं। चीन, वियतनाम, क्यूबा, वेनेजुएला, उत्तर कोरिया और ईरान ऐसे प्रयोगों के प्रमुख स्थल हैं। व्लादीमीर पुतिन के कार्यकाल में- खासकर 2007 के बाद रूस भी इसमें आ जुड़ा। अपनी आजादी के बाद काफी समय तक भारत भी एक ऐसे अपेक्षाकृत सफल प्रयोग की भूमि था। मगर 1991 से भारत ने अपनी दिशा बदल ली, जो घूमते-घूमते अब पूर्णतः विपरीत रुख अपना चुकी है।
बहरहाल, जो देश संप्रभु राह पर रहे हैं, वे आज अमेरिकी सैन्यवाद (militarism) के खास निशाने पर हैं। बाकी देशों को भी अमेरिकी शासक वर्ग के हितों के अनुरूप चलाने के लिए ट्रंप प्रशासन ने अन्य रणनीतियां अपना रखी हैँ, जिनमें व्यापार युद्ध या भू-राजनीतिक दबाव डालना शामिल हैं। इन सभी रणनीतियों का मकसद समान है।
ट्रंप और उनके अधिकारियों को इस बात का श्रेय देना होगा कि वे अपने मकसद को लेकर अक्सर कोई लाग-लपेट नहीं दिखाते। वे वही बोलते हैं, जो उनका मकसद है। मकलन, वेनेजुएला के तेल पर उनकी नजर थी और वहां से चीन के प्रभाव को वे खत्म करना चाहते थे, तो यही बात उन्होंने कही। इस उद्देश्य की राह में रुकावट राष्ट्रपति निकोलस मदुरो और उनकी पत्नी का सैन्य सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए उन्होंने अपहरण कर लिया। ईरान के बारे में भी ट्रंप ने कहा कि तेहरान में वे वैसे नेता को सत्ता में बैठाना चाहते हैं, जो अमेरिकी मर्जी से अपनी ऊर्जा एवं अन्य नीतियां बनाए।
सार यह कि अमेरिक चाहता है कि दुनिया के तमाम देश अपने प्राकृतिक संसाधनों तक अमेरिकी कंपनियों की पहुंच निर्बाध बनने दें, अपने बाजार अमेरिकी उत्पादों के लिए खोल दें, और अपनी पूंजी अमेरिका में लगाएं। भारत और कई अन्य देशों के संदर्भ में अमेरिका ने ये मकसद व्यापार समझौते के जरिए हासिल करने की कोशिश की है। मगर जिन्होंने “शांतिपूर्ण समर्पण” करने से इनकार दिया, वे उसके सैन्य आक्रमण के निशाने पर हैं।
अब प्रश्न यह है कि क्या अमेरिका इस मकसद में कामयाब होगा? ये जवाब ढूंढने के क्रम में ईरान से अमेरिकी युद्ध महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इस युद्ध के पहले दस दिन में जिस तथ्य ने दुनिया का ध्यान खींचा, वो पश्चिम एशिया क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य शक्ति की सीमा का बेनकाब होना है। इस दौरान ईरान ने अमेरिका के कम-से-कम 14 सैनिक अड्डों को निशाना बनाया। बहरीन स्थित उसके फीफ्थ फ्लीट अड्डे सहित अनेक सैन्य स्थलों को उसने भारी क्षति पहुंचाई। थाड (Terminal High Altitude Area Defence) सहित मिसाइल इंटरसेप्ट की अमेरिकी प्रणालियों की सीमाएं इस दौरान जग-जाहिर हुईं। खुद अमेरिका में जारी चर्चाओं से ऐसे हथियारों एवं उपकरणों की लंबे समय तक सप्लाई जारी रखने की उसकी सीमाएं सबके सामने आ गई हैं। आने वाले समय में ये सारी बातें विश्व सैन्य संतुलन को निर्धारित करेंगी।
यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि अमेरिकी वर्चस्व मुख्य रूप से उसकी आर्थिक शक्ति, तकनीक आविष्कार करने में उसके बेजोड़ होने, सैन्य क्षमता और सॉफ्ट पॉवर पर आधारित था। इनमें से आर्थिक शक्ति एवं सॉफ्ट पॉवर के स्तंभ ढह चुके हैं। नवीनतम तकनीक (क्वांटम कंप्यूटिंग, एआई, रोबोटिक्स, बायोटेक, ग्रीन एनर्जी) के क्षेत्र में उसे चीन से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। तो ले-देकर उसकी जिस ताकत का रुतबा बचा हुआ है, वो सैन्य क्षमता है। अगर इसकी सीमाएं ईरान जैसे मध्य स्तरीय शक्ति के सामने एक्सपोज होती हैं, तो उसका विश्व धारणा पर क्या असर पड़ेगा, इसे सहज ही समझा जा सकता है।
अतः कहा जा सकता है कि बहु-ध्रुवीयता की परिघटना को पलट कर फिर से वॉशिंगटन केंद्रित एक-ध्रुवीय विश्व निर्माण की अमेरिकी मंशा वस्तुगत परिस्थितियों के विपरीत है। इस मंशा को साधने के लिए वह नग्न तांडव पर उतरा हुआ है, मगर उससे इतिहास की दिशा वह नहीं बदल सकता। बल्कि इससे विश्व जनमत में अपने लिए वह अपने लिए ज्यादा वितृष्णा एवं नफरत बटोर रहा है, जिसकी भारी कीमत उसे चुकानी पड़ेगी।


