संदेह नहीं कि अमेरिका-इजराइल और ईरान अपने अपने उद्देश्यों को साधने में लगे है, जिसपर वैश्विक शांति, स्थिरता, नैतिकता, लोकतंत्र और मानवता का दिखावा रूपी मुलम्मा चढ़ाया जा रहा है। भारत के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता यही है कि वह राष्ट्रहितों, ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों की सुरक्षा को ऊपर रखे। यही व्यवहारिक और जिम्मेदार कूटनीति है।
पश्चिमी एशिया भीषण युद्ध की आग में धधक रहा है। एक ओर इजराइल-अमेरिका का गठबंधन है, तो दूसरी ओर ईरान, जिसे प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से रूस और चीन की रणनीतिक सहानुभूति प्राप्त है। सभी पक्षों से भारत के कूटनीतिक-व्यापारिक संबंध हैं। ऐसे में भारत को क्या करना चाहिए और किसका पक्ष लेना चाहिए— इस प्रकार के प्रश्न देश के एक राजनीति वर्ग द्वारा उठाए जा रहे हैं। इस संदर्भ में कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी का एक अंग्रेजी समाचारपत्र में आलेख प्रकाशित हुआ। इसमें उन्होंने ईरान के सर्वोच्च नेता अली हुसैनी खामेनेई की “लक्षित हत्या” पर मोदी सरकार की तथाकथित “चुप्पी” को “परेशान करने वाला”, “कर्तव्यहीनता” और “न्याय का त्याग” करने वाला बताया। क्या वाकई ऐसा है? क्या यह सच नहीं कि इस पूरे घटनाक्रम में मोदी सरकार केवल राष्ट्रहित और अपने लोगों (प्रवासी भारतीय सहित) की सुरक्षा (ऊर्जा सुरक्षा समेत) को प्राथमिकता दे रही है?
खाड़ी देशों में जारी तनाव को लेकर दो बातें स्पष्ट है। पहली— इसमें नैतिकता की बात करना बेमानी है। दूसरा— युद्ध में दोनों ही पक्ष कोई संत नहीं है। भारतीय परंपरा में महाभारत का युद्ध केवल वीरता का ही नहीं, बल्कि युद्ध नियमों के टूटने का भी उदाहरण है। कौरवों ने चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु पर कई योद्धाओं ने मिलकर हमला किया, जो युद्ध-नीति के विरुद्ध था। वहीं पांडवों ने भी भीष्म पितामाह के सामने शिखंडी को खड़ा करके उनका वध किया और द्रोणाचार्य को रोकने के लिए “अश्वत्थामा हतः” का सहारा लिया। इसी तरह भीम ने दुर्योधन की जांघ पर, तो अर्जुन ने कर्ण के असहाय होने पर प्रहार किया।
ऐसे ही अमेरिका नीत गठबंधन और ईरान भी कोई दूध के धुले नहीं है। ईरान की मौजूदा सत्ता लंबे समय से देश के अंदर दमन और बाहर अस्थिरता फैलाने के आरोपों से घिरी है। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद बनी इस्लामी व्यवस्था ने अपने कट्टरपंथी विचारों को शेष विश्व पर थोपने की नीति अपनाई। उसकी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (आईआरजीसी) की कुद्स फोर्स ने पश्चिम एशिया में कई जिहादी संगठनों को सहारा दिया। लेबनान में हिज्बुल्लाह और फिलिस्तीन में हमास जैसे जिहादी संगठन वर्षों से ईरान के टुकड़ों पर पल रहे हैं। वर्तमान ईरान का ध्येय समस्त विश्व का इस्लामीकरण है। इसलिए जब उसकी इस्लामी सत्ता के खिलाफ देश में महिला अधिकार केंद्रित प्रदर्शन हुए, तो उसे उसने कठोरता से रौंद दिया। स्वयं खामेनेई ने इस वर्ष हजारों प्रदर्शनकारियों को मौत के घाट उतारने की पुष्टि की थी।
दूसरी ओर, अमेरिका का इतिहास भी पूरी तरह नैतिकता से युक्त नहीं है। 1955 में उसने अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर वियतनाम में युद्ध शुरू किया, जो 20 वर्षों तक चला और लाखों लोगों की जान जाने के बाद भी विजयी नहीं हो पाया। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में बड़े पैमाने पर हिंसा और अत्याचार हो रहे थे, फिर भी अमेरिका ने पश्चिमी पाकिस्तान (वर्तमान पाकिस्तान) का समर्थन करके भारत के खिलाफ अपना विमानवाहक पोत बंगाल की खाड़ी में तैनात कर दिया। बावजूद इसके पाकिस्तान को भारत के हाथों शर्मनाक हार मिली। 1979–89 के बीच सोवियत संघ के खिलाफ अफगानिस्तान में अमेरिका ने पाकिस्तान और सऊदी अरब के समर्थन से इस्लाम के नाम पर मुजाहिदीनों (ओसामा बिन लादेन सहित) को खड़ा किया। बाद में यही समूह तालिबान बना, जिसके खिलाफ भी अमेरिका ने न्यूयॉर्क के भीषण 9/11 आतंकी हमले (2001) के बाद अफगानिस्तान में युद्ध शुरू किया। लेकिन 20 वर्ष बाद उसी तालिबान से समझौता करके वापस चलता बना। यानि अमेरिका ने अपने रणनीतिक हितों को नैतिकता से ऊपर रखा— वेनेएजुला प्रकरण इसका ताजा उदाहरण है। अगर वाकई अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को कट्टरपंथी इस्लामी सत्ता से मुक्त करना चाहते हैं, तो वे पाकिस्तान की कट्टरपंथी सेना के साथ इतनी नजदीकी क्यों बढ़ा रहे है?
आज जब दुनिया के कई हिस्सों में तनाव और टकराव ग्रस्त हैं, तब भारत में इस विषय पर राजनीतिक बहस नाटकीय रूप लेता दिखाई देता है। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व मध्यपूर्व एशिया की स्थिति पर मोदी सरकार की कथित “चुप्पी” पर लच्छेदार शब्दों के साथ आलोचना कर रहा है। लेकिन तथ्य कुछ और ही कहानी बताते हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर युद्ध से पहले और बाद भी अपने ईरानी समकक्ष से संपर्क बनाए हुए है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, जॉर्डन और बहरीन जैसे इस्लामी देशों के नेताओं से भी बातचीत की हैं। भारत ने इस युद्ध में संयम बरतने, तनाव कम करने और आम नागरिकों की सुरक्षा पर बल दिया है। खाड़ी देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय बसते हैं। ऐसे में जल्दबाजी में कोई कठोर बयान देना “आग में घी डालने” जैसा हो सकता था। इसलिए भारत संतुलित और सोच-समझकर कदम उठा रहा है।
विडंबना यह भी है कि जिस खामेनई के लिए आज कांग्रेस सहित एक राजनीतिक-वैचारिक कुनबे का कलेजा फटा जा रहा हैं, वे कई बार कश्मीर सहित कई विषयों पर भारत-विरोधी रूख अपना चुके थे। यह भी दिलचस्प है कि जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग गठबंधन (2004-14) सरकार सत्ता में थी, तब भारत ने तीन बार अमेरिकी-यूरोपीय दबाव में ईरान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा अभिकरण (आईएईए) में मतदान किया था।
दरअसल, पिछले दशक में भारत की विदेश नीति में बड़ा बदलाव आया है। प्रधानमंत्री मोदी यहूदी राष्ट्र इजराइल की दो बार (2017 और 2026) ऐतिहासिक यात्रा कर चुके है और इसी दौरान खाड़ी में इस्लामी देशों के साथ भी उनके रिश्ते उच्चतम स्तर पर है। संदेश स्पष्ट है— भारत अब किसी एक खेमे का मोहरा नहीं है, बल्कि अपने हितों को सर्वोपरि रख रहा है।
कोई संदेह नहीं कि अमेरिका-इजराइल और ईरान अपने अपने उद्देश्यों को साधने में लगे है, जिसपर वैश्विक शांति, स्थिरता, नैतिकता, लोकतंत्र और मानवता का दिखावा रूपी मुलम्मा चढ़ाया जा रहा है। भारत के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता यही है कि वह राष्ट्रहितों, ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों की सुरक्षा को ऊपर रखे। यही व्यवहारिक और जिम्मेदार कूटनीति है।


