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स्वतंत्र खेल लेखन। साथ ही राजनीति, समाज, समसामयिक विषयों पर भी नियमित लेखन। नयाइंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर।
  • शतक शहंशाह हैं यशस्वी!

    विराट और रोहित अभी खेल ही रहे हैं लेकिन अब यशस्वी जयसवाल ने अपनी बल्लेबाजी से क्रिकेट देखने-समझने, प्रेम करने वालों के मन में रोमांच भर दिया है। मैं देख कर हैरान होता हूं की क्रिकेट के तीनों प्रारुपों में, इतनी छोटी उम्र में कोई बल्लेबाजी में कैसे इतना संभला, परिपक्व, और मंझा हुआ हो सकता है? मेरा क्रिकेट देखना और उससे प्रेम करना शुरू हुआ तो सुनील गावस्कर की बल्लेबाजी के नाम और किस्सों व उनके खेल को देखते रोमांचित होता था, दिल बाग-बाग हो जाता था। हालांकि उनके समय में भी अन्य महान बल्लेबाजों के किस्से भी सुनने...

  • राममंदिर और रामराज्य

    रामराज्य से मेरा तात्पर्य हिंदू राज से नहीं है। रामराज्य से मेरा तात्पर्य दिव्य राज, द किंगडम ऑफ गॉड से है। मेरे लिए राम और रहीम एक ही देवता हैं। मैं किसी अन्य ईश्वर को नहीं, बल्कि एक सत्य और नीतिपरायणता के ईश्वर को स्वीकार करता हूं। चाहे मेरी कल्पना के राम इस धरती पर कभी रहे हों या नहीं, रामराज्य का प्राचीन आदर्श निस्संदेह सच्चे लोकतंत्र में से एक है। देश में उत्सव चल रहा है। गणतंत्र के उत्सव से पहले एक सांस्कृतिक उत्सव आयोजित हो रहा है। अयोध्या के राममंदिर में रामलला की मूर्ति के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का...

  • आहार ही क्यों न औषधि भी हो?

    खादर वली ने खोज करते हुए जाना कि गेहूं व चावल में शक्कर बनाने की क्षमता अति तेज है और शारीरिक कसरत कम हो जाने से शरीर का खून संचार से पहले ही गाढ़ा हो जाता है। जब वही जरूरत से ज्यादा गाढ़ा खून अपनी रगों से होता हुआ शरीर के विभिन्न भागों में जाता है तो वहां शक्कर के अंश छोड़ता, जमा करता जाता है। वही जमाव समय के साथ खर्चीलेजीवन को अस्तव्यस्त करने वाली भयंकर बीमारी बन जाते है। अपन न तो डॉक्टर हैं, न ही कोई वैज्ञानिक। भुक्तभोगी जरुर हैं। बस जीवन की तीन संस्थाएं सृष्टि, समाज...

  • रोहित का रिचर्डस् होना

    रोहित ने अफरीदी की तेज, सीधी आती गेंद पर कदम आगे बढ़ाया और कलाई के दम से मिड-विकेट के ऊपर से जोरदार चौका, बिलकुल विव रिचर्ड्स के अंदाज में जड़ दिया। फिर उसी ऐंठ और अकड़ में पाक गेंदबाजों को सारे मैदान पर घूमती रस्सी नपवा दी। छह छक्के और छह चौके जड़ते हुए 30 ओवर में ही पाक के छक्के-छुड़ा दिए। समय बदलता है। जीवन और उसका खेल भी बदलता है। नए सितारे, नया आसमान नापते हैं। नए लोग नया आनंद लेते हैं तो पुरानी स्मृति भी नए आयामों में दिखती है। जिनने भी महान विव रिचर्ड्स का प्रभामंडल...

  • असीम संभावनाओं का विश्वकप

    तेरहवां एकदिवसीय क्रिकेट विश्व कप का उत्सव देश में अगले डेढ़ महीने चलने वाला है। दस देश विश्व विजेता बनने के लिए भारत के मैदानों पर एक-दूसरे से खेलने वाले हैं। विश्व कप में अच्छा खेलने का दबाव सभी पर भारी पड़ता है।....बल्लेबाजों का बोलबाला रहने ही वाला है। लेकिन जिसकी गेंदबाजी में दमखम और कलाकारी होगी उसको हराना मुश्किल ही रहेगा। तनाव और दबाव भरे खेल में कोई भी टीम अपना बुरा दिन होने पर पचक कर हार भी सकती है। कुछ टीमें पूरे पचास ओवर खेलने में भी असमर्थ रहेंगी। 13वां एकदिवसीय क्रिकेट विश्वकप “क्रिकेट एक भारतीय खेल...

  • बांके-बिहारी के लिए भी बने कॉरिडोर

    अनास्था और अव्यवस्था के दर्शन होते हैं। श्रद्धालुओं के हाल इतने बुरे होते हैं कि आस्था और श्रद्धा डगमगा जा सकती हैं। काशी, अयोध्या और उज्जैन की तरह वृंदावन में भी व्यवस्थित गलियारा क्यों नहीं बनाया जा सकता? क्या इसलिए कि वृंदावन में अलगाव और सत्ता के खेल की गुंजाईश नहीं है? मान लिया वृंदावन कृष्ण जन्मस्थली नहीं है। लेकिन मान्यता है कि वृंदावन कृष्ण की स्नेहस्थली, लीलास्थली और समाज के लिए उनकी सेवा-स्थली रही। पंथ-जमात की भीड़ में भी निभाना तो स्वधर्म ही पड़ता है। पंथ में या जमात में जन्म लेने भर से धर्म या स्वधर्म तय नहीं...

  • नफ़रत व अलगाव से मुक्त हो भारत

    आज पंथ-जमात की भीड़ को अहिंसा का पाठ कौन पढ़ाएगा? गांधीजी ने जनता को अहिंसक रहते हुए भारत छोड़ो आंदोलन के प्रति जागरूक किया था। जगह जगह हिंसा रोकने के लिए क्या आज कोई नेता हाथ उठा नेतृत्व देने में समर्थ है? आज तो जैसे को तैसा जताने का राष्ट्रवाद पनप रहा है। इसीलिए आज के समय में ही विदेश जा बसने वाले भारतीयों की संख्या अब तक की सबसे ज्यादा है।            प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर महात्मा गांधी का नाम ले कर आव्हान किया। उन्होने अगस्त सन् 1942 के मुंबई अधिवेशन में महात्मा गांधी द्वारा ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ नारे...

  • सत्ता मद और अहिंसा का संकल्प

    क्या गजब हो रहा है। एक तरफ गीता प्रेस, गोरखपुर को समाज में योगदान के लिए गांधी शांति पुरस्कार दिया जाता है, तो दूसरी तरफ गांधी विचार के प्रसार-प्रचार में लगी संस्था सर्व सेवा संघ को जमीन से ही बेदखल किया जा रहा है। ...आखिर क्यों सरकारें अहिंसक जनता को हिंसा से सबक सीखाने का व्यवहार करती हैं? सवाल कई हैं और जवाब देने वाला कोई नहीं। जिस भीड़तंत्र ने दिल्ली दंगों से लेकर बंगाल, राजस्थान, मणिपुर और कर्नाटक तक में हिंसा की चेतावनी दी हो उससे भविष्य में सभी के लिए बचना मुश्किल रहेगा। सत्ता सिर पर चढ़ कर...

  • गांधी क्या सर्वसेवा संघ को भंग नहीं कर देते?

    गांधी विचार को लेकर केन्द्र सरकार की मंशा जगजाहिर है। लेकिन गांधी विचार हर कीमत पर राज करने और भूमि हड़पने की सत्ता से परे है। गांधी के जाने के बाद उनके नाम पर ली, दी या ग्रहण की गयी भूमि या जमीन पर गांधी अपना कोई दावा नहीं करते। न ही ऐसी जमीन से गांधी का कोई वास्ता रहा।..सर्व सेवा संघ ने जो अपना हाल किया, उसे देखते हुए गांधी होते तो कभी का इसको भी भंग कर देते।...सर्व सेवा संघ के परिसर में बने गांधी विद्या संस्थान पर ताला लगे डेढ़ दशक हो रहे थे। बंद पड़े परिसर...

  • मनभावक खेल तो धोनी का, सीखों!

    सुनील गावस्कर ने तो एक आईपीएल मैच में सभी को दंग कर दिया। तिहत्तर साल के गावस्कर पीछे से दौड़ कर आए और अपनी शर्ट पर धोनी के हस्ताक्षर मांगे बैठे। बाद में भावुकता में उनने बताया कि वे अपने अंतिम समय में 2011 के क्रिकेट विश्वकप जीत के आखिरी पल को सहेज कर रखना चाहते हैं। छक्का मार कर, बल्ला लहराकर जिताने की धोनी की याद सदा साथ रखना चाहते हैं। क्या लोकतंत्र में लोकप्रियता का कोई पैमाना होता है? क्यों किसी एक को ही लोग बेइंतहां चाहने लगते है? इसका कारण क्या उस व्यक्ति-नेता का साफ चाल-चलन होता...

  • मतदाताओं ने पूरे देश को मैसेज दिया!

    लोकतंत्र में लोक ही अपने वोटसे नीति का तंत्र चलाता है। जनता बेशक अलग-अलग राज्य, अलग-अलग पंथ-जमात या अलग-अलग मान-मर्यादा से जुड़ी हो मगर सम्मान, सौहार्द और सद्भाव ही सभी का नैसर्गिक व्यवहार है। जनसेवकों को यह अच्छे से जान लेना चाहिए की जनतंत्र में जनता ही जनार्दन है। सत्ताएं बेशक जो समझें मगर लोकतंत्र तो लोक के मत से ही चलता-बनता है। और लोक का मत अपने समय पर ही बनता-बिगड़ता है। दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र भारत में चुनाव चलते ही रहते हैं। इसलिए जनसेवकों को लगातार जनता के सामने हाथ जोड़कर वोट मांगने जाना ही पड़ता है।...

  • दंभ, तथ्य और सत्य का खेला

    आज राज की नीति हो, लोकप्रियता का क्रिकेट हो या मशक्कत भरी कुश्ती हो, सभी खेल सत्ता के दंभ में दबे दिखते है। खेलों की लोकप्रियता सत्ता को भी प्रिय और उसका मोहरा हो जाती है। जनसेवक जब खेल की सेवा करने का दावा करते हैं तो उनका आशय सिर्फ खेल की सत्ता से सत्ता का खेल खेलना भर होता है। वहीं जब खिलाड़ी खेल की सेवा करने उतरते है तो उनका आशय अपनी लोकप्रियता और धन से सत्ता की सेवा में लगने का रह जाता हैं। आखिर ये सब बेवजह का दंभ क्यों दर्शाते हैं? सत्ता का दंभ अक्सर...

  • अंजन सकल पसारा रे, राम निरंजन न्यारा रे

    क्या आज मतिभ्रम का समय है? ईश्वरवादी तो आज भीड़तंत्र में भरे पड़े हैं और अनीश्वरवादी अध्यात्म पढ़ा रहे हैं। नई पीढ़ी को कुमार गंधर्व के स्वर-संगीत से तुलसी, कबीर और गांधी के विचारों को आज समझना आसान रहेगा। आज जो अंजन का पसारा है वह सत्ता आकांक्षा का ही काजल है। निरंतर तो केवल राम निरंजन ही है। लोक इतिहास निरंजन है तो सत्ता इतिहास अंजन। कुमार गंधर्व के अद्भुत स्वर-संगीत से अपने-अपने राम को खोजिए। देश के कुछ हिस्सों में नवमीं पर हुई हिंसा में राम और रामभक्तों को कैसे देखा जाए? राम जन्म के उत्सव पर हिंसा...

  • टेस्ट क्रिकेट: पिच पर खेलना या पिच से खेलना?

    “क्रिकेट एक भारतीय खेल था जिसकी खोज गलती से अंग्रेजों ने की।“ भारत में क्रिकेट के जुनून को देखते हुए चर्चित समाजशास्त्री आशीष नंदी का यह मानना रहा है। इतिहासकारों ने जो भी लिखा हो, अपन आशीष नंदी से इस पर बहस नहीं करेंगे। अपन मानते हैं केवल भारत ही नहीं बल्कि जिसको भी जीवन से प्रेम है उसको क्रिकेट खेल से भी प्रेम जरूर रहा होगा। भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता, किसी भी अन्य लोकप्रियता पर भारी पड़ती है। आप जानते ही हैं आस्ट्रेलिया का भारत दौरा चल रहा है। विश्व टेस्ट विजेता होने की होड़ लगी है। पिच...

  • अरे, आस्ट्रेलिया का ऐसे ढहना!

    पता नहीं क्यों आस्ट्रेलिया के बल्लेबाजों को लगा की कोटला पिच पर सिर्फ आड़े शॉट मार कर ही रन बनाए जा सकते हैं। ऐसा लगा कि पूरी आस्ट्रेलिया टीम सिर्फ झाड़ू मारने को ही कोटला पर बल्लेबाजी करना मान रही थी। कई बार हार की तरह ही जीत भी हैरान करती है। कोटला पिच पर जिस उम्मीद के साथ आस्ट्रेलिया ने दूसरे दिन का खेल खत्म किया था, उन्हें और भारत को भी यह उम्मीद नहीं थी कि तीसरे दिन भोजन से पहले ही वे पतझड़ के पत्तों की तरह ढह जाएंगे। एक तरह से आस्ट्रेलिया का आत्मसमर्पण था। अपन...

  • आमदनी-खर्च का ब्यौरा भी आम भाषा में नहीं!

    आम जनता के लिए उसके आमदनी-खर्च का ब्यौरा क्यों आम भाषा में नहीं हो सकता है? क्या हमारे-आपके रोज़मर्रा का आमदनी-खर्च इसी भाषा में होता है? अर्थ के ज्ञानी कह सकते हैं कि दुनिया का बड़ा व्यापार क्योंकि इसी भाषा में चलता है इसलिए ग्लोबल होती दुनिया में हिंदुस्तान को भी वैश्विक होना होगा। आर्थिक भाषा और अर्थ की बोली का मतभेद बना ही रहने वाले है। लेकिन फिर वैश्विक होते इंडिया में हिंदुस्तान की आम जनता का क्या होगा? वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले दिनों अमृत काल को ध्यान में रखते हुए आम जनता के लिए बजट पेश...

  • धीरे-धीरे गाड़ी हांको मेरे राम गाड़ी वाला……

    उत्तराखंड के जोशीमठ में अचानक ही भू-धंसाव नहीं हो रहा है। पर्यावरण प्रेमी अनुपम मिश्र ने ऐसे ही विकास को अच्छे विचार और अच्छे कामों का अकाल कहा था। अकाल से पहले अच्छे विचार और अच्छे कामों का अकाल आता है। उत्तराखंड में विचार के इसी अकाल का विनाश चलाया गया। जो आज भी चलाया जा रहा है। कुछ लोगों के स्वार्थी विचारों के ही कारण विकास के विनाश का खेल चल रहा है। यदि हम धरती पर यह मान कर जीते हैं कि हमारे जीने से धरती पर फर्क पड़ता है, तो चिंता की कोईबात नहीं है। लेकिन अगर...

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