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मोदी-शाह कैसे मारेंगे कॉकरोचों को?

वैसे ही जैसे किसान आंदोलन, गुजरात के युवा पटेलों के आंदोलन या शाहीन बाग की भीड़ को खदेड़ा था। याद करें इन आंदोलनों के समय की टीवी चैनलों की इन रिपोर्टों को कि, आंदोलन की आड़ में अराजकता है। दिल्ली-यूपी बॉर्डर कानून व्यवस्था के लिए खतरा है। किसान देश भर में घूम रहे हैं। राजनीति कर रहे हैं। सिंधू बॉर्डर पर पानी की बोतलें, कप-प्लेटों के कूड़े का पहाड़ खड़ा है। टेंटों में एसी लग रहे हैं। मोदी के खिलाफ आंदोलनों की एक सी क्रोनोलॉजी है। देखो भीड़ के इन मुसलमान चेहरों को। अरे, सरदार भी दिख रहा है। अरे, दलित भी है। देखो, ये पुलिस पर पत्थर मार रहे हैं। पता है कनॉट पैलेस के व्यापारी कितने परेशान हैं? फिर पुलिस हाई कोर्ट से कहेगी कि माई लॉर्ड, आप ही समाधान निकालिए। तो हाई कोर्ट के जज ने या सीधे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस का यह न्यायिक आदेश होगा कि कॉकरोच समाज की गंदगी हैं, इन पर बुलडोजर चला कर यमुना में फेंको! और कोई विरोध करें तो प्रचार यह होगा कि देखो ये न्यायपालिका को भी नहीं मान रहे!

ऐसा ही कुछ होना है। कॉकरोचों को कुचल कर फिर छप्पन इंची छाती से नरेंद्र मोदी-अमित शाह, योगी का यूपी में गला फाड़ मुसलमानों के खिलाफ प्रचार होगा। कमल खिलेगा। नगाड़ा बजेगा। मोदी है तो मुमकिन है। और भारत कॉकरोच मुक्त।

हां, मोदी-शाह के शासन की क्रोनोलॉजी भी एक सी और स्थायी है। दूसरी बात, कॉकरोचों की उम्र लंबी नहीं होती। युवा किसान हो या सरदार पटेल के वंशज पटेल यूथ सब आखिर उस गुलाम इतिहास की विरासत से हैं, जिसमें पांच सौ घुडसवार खैबर पार से आते थे और हिंदुस्तानियों पर पांच सौ साल राज करते थे। इसे मोदी-शाह ने समझा है। तभी इन्होने भारत को, भारत को राजनीति को दुकान बना दिया है। या तो डराओ या खरीदो। इसलिए सोचे, पिछले बारह वर्षों के अनुभवों का क्या सार है? मोटामोटी यह कि मुसलमान जहां अपने ईमान, अपने पैगंबर का बंदा है, वह डरता नहीं है, चौकन्ना रहता है। वहीं हिंदू वे जीव हैं, जिनका धर्म-कर्म भक्ति में अंधे होकर जीवन जीना है। हिंदुओं की भक्ति और भक्ति का अंधापन ही तो था जो गुलामी मुसलमानों की हो या अंग्रेजों की, हर समय हिंदू झूठ में जिया। फिर अब तो अंधापन नरेंद्र मोदी को कल्कि अवतार मानने का भी है।

क्या मैं गलत हूं? सोचें, हिंदुओं के पिछले 12 वर्षों पर? मोदी के अलावा क्या कोई एक भी चेहरा बना या उभरा? जबकि याद करें मनमोहन सिंह राज को? तब भारत में भक्ति नहीं थी। भारत बिना कॉकरोचों और भक्तों के था। तभी 2014 से पहले का भारत कितनी-कैसी विविधता लिए हुए था? तब भाजपा में भी दर्जनों नेता लोगों में जाने जाते थे। तब अन्ना हजारे, रामदेव, विनोद राय, अरविंद केजरीवाल, मायावती आदि को भी जनता मानती थी। मनमोहन सिंह का कैबिनेट तब कॉकरोचों का नहीं था। मनुष्यों का था। तभी उन्होंने अपने कैबिनेट के प्रणब मुखर्जी जैसे दिग्गजों को रामदेव के लिए एयरपोर्ट भेजा। तब किसी चीफ जस्टिस ने भारत के नागरिकों को कॉकरोच नहीं कहा। चुनाव आयोग की हिम्मत नहीं थी जो बेशर्मी से वह पश्चिम बंगाल के वैध 27 लाख नागरिकों के दस्तावेज होते हुए भी उनका नरसंहार कर डाले। तब भारत का निवासी भारत का नागरिक था। उसका हर दस्तावेज नागरिकता का साक्ष्य था। मां भारती के बेटे-बेटियों को नागरिकता या मताधिकार के लिए बाबुओं के चक्कर नहीं काटने पड़ते थे।

इसलिए 13 प्रधानमंत्रियों के भारत और 14वें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समय के दस्तावेज का इतिहास दो टूक लिखा होगा। मनमोहन सिंह तक भारत मनुष्यों का देश था। वहीं नरेंद्र मोदी का समय भारत में कॉकरोच हैं। उस नाते उत्तर भारत की गोबर पट्टी के युवा कॉकरोचों को मारना उनके लिए चुटकियों का काम है। देखा नहीं मोदी और शाह ने किस बेशर्मी से दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को यह अधिकार दिया है कि वे जब चाहे, जितने चाहे कॉकरोचों को पकड़े और उन्हें उनकी सही जगह जेल के अंधेरे में डालें।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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