राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

भाजपा, सबसे अलग? विचार ही खत्म

भारतीय जनता पार्टी अपने को पार्टी विद डिफरेंस कहती थी। पहले उसकी वेबसाइट खोलने पर यह लाइन लिखी होती थी। अब इस लाइन को भी हटा दिया गया है। अब वेबसाइट खोलने पर पहले पेज पर लिखा होता है, वेलकम टू द वर्ल्ड्स लार्जेस्ट पोलिटिकल पार्टी। याद करें 1980 में भाजपा को क्या बनाया गया था। छह अप्रैल 1980 को पार्टी की स्थापना के दिन तब के बॉम्बे में पहले अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था, ‘हम संघ के संस्कारों से निकले स्वंयसेवक हैं और हमारी पार्टी कोई दुकान नहीं है, जिसमें कोई भी बेधड़क चला आए। जो व्यक्ति संघ की शाखाओं से निकला हो और दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद को अपना मूल मंत्र मानता हो, वही हमारी पार्टी में रह सकता है। भाजपा पार्टी नहीं एक विचार है इसलिए इसके दरवाजे सबके लिए नहीं खुल सकते। आज हमने जिस भारतीय जनता पार्टी को जन्म दिया है, इस पार्टी के सभी नेता अपने चाल, चेहरे और चरित्र से पहचाने जाएंगे’।

अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण का यह अंश क्या अर्थ लिए हुए है? साफ है 1980 में जो भाजपा बनी थी वह जिस विचार, संकल्प पर बनी थी, उसका आज की, 2026 की भाजपा का कोई लेना देना नहीं है। वाजपेयी और दीनदयाल उपाध्याय की चर्चा जरूर होती है लेकिन उनके विचारों का सम्मान नहीं होता है। अगर भाजपा पदाधिकारियों की नई टीम को ही देखें तो दिखाई देगा कि कितने ही लोग, जिनका संघ या भाजपा की विचारधारा से कोई संबंध नहीं है और एक समय भाजपा व संघ के विरोधी रहे हैं वे बड़े बड़े पदों पर हैं। उपाध्यक्षों में कम से कम तीन नेता ऐसे हैं, जो पहले भाजपा विरोधी पार्टियों में रहे हैं। बैजयंत जय पांडा, डी पुरंदेश्वरी और मनप्रीत सिंह बादल दूसरी पार्टियों से आए हैं। सचिवों में संदीप पाठक, अनिल एंटनी और रोहन गुप्ता दूसरी पार्टियों से आए हैं।

ऐसा नहीं है कि दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनने की होड़ में भाजपा सिर्फ बाहरी नेताओं को संगठन में भर रही है। वह ऐसे नेताओं को भी अपनी सरकार और संगठन का हिस्सा बना रही है, जिनके ऊपर खुद भाजपा के नेताओं ने गंभीर आरोप लगाए थे। जिन नेताओं के ऊपर भाजपा ने भ्रष्टाचार और देशद्रोह तक के आरोप लगाए थे उनको भी पार्टी में लेने या उनसे भी गठजोड़ करने में मोदी-शाह की भाजपा ने संकोच नहीं किया। भाजपा के नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद और महबूबा मुफ्ती पर आतंकवादियों से मिले होने के आरोप लगाते थे। लेकिन दोनों को समर्थन देकर भाजपा ने मुख्यमंत्री बनाया। ऐसे ही हिमंत बिस्वा सरमा से लेकर शुभेंदु अधिकारी तक कई नेताओं के ऊपर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए और उन्हे फिर अपनी पार्टी में लाकर मुख्यमंत्री बनाया। अजित पवार को जेल भेजने की कसमें भाजपा के शीर्ष नेता खाते थे और उनको अपने गठबंधन में लाकर उप मुख्यमंत्री बनाया गया। ऐसी अनगिनत मिसाले हैं।

असल में भाजपा ने अपना चाल, चेहरा और चरित्र पूरी तरह से बदल दिया है। उसने विचार की जगह सत्ता को राजनीति का साध्य बना दिया। इसमें तमाम किस्म के समझौते किए। लेकिन ऐसा नहीं है कि उससे भाजपा का संगठन मजबूत हो गया। भाजपा सरकार में जरूर है लेकिन संगठन की ताकत खोखली हो चुकी है। सांगठनिक क्षमता लगभग समाप्त है और संगठन को मजबूती देने के लिए जिस नैतिक बल व आचरण की जरुरत होती है वह पूरी तरह से खत्म है। सरकार जरूर है लेकिन वहां राजयोग में से योग, राजधर्म में से धर्म निकल गया है और बचा सिर्फ राज है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

Leave a comment