झारखंड के मुकाबले उत्तर प्रदेश की तस्वीर अलग है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के पास दो उम्मीदवार जिताने के लिए पर्याप्त संख्या है। अखिलेश यादव की पार्टी के पहले उम्मीदवार उनके चाचा रामगोपाल यादव हैं। अगर धनराज नाथवानी पार्टी के दूसरे उम्मीदवार होते हैं तो उनको कोई समस्या नहीं आएगी। राज्य में एक सीट जीतने के लिए 37 वोट की जरुरत है। य़ानी पहली दो सीटों के लिए सपा को 74 वोट चाहिए। इसके बाद उसके और कांग्रेस के पास 28 वोट बचते हैं। यानी अगर अखिलेश यादव तीसरा उम्मीदवार उतारते हैं तो उसके लिए नौ अतिरिक्त वोट का इंतजाम करना होगा। सवाल है कि क्या अखिलेश चाहते हैं कि नाथवानी तीसरे उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ें और अतिरिक्त वोट का इंतजाम करें? या अखिलेश किसी मुस्लिम को तीसरा उम्मीदवार बनाएंगे और खुद वोट का इंतजाम करेंगे? ऐसा होता है तो तीसरे उम्मीदवार का हारना तय होगा। ध्यान रहे 2024 में भी अखिलेश ने जया बच्चन और रामजी लाल सुमन के बाद राज्य के पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन को तीसरा उम्मीदवार बनाया था और वे हार गए थे।
अब राज्यसभा चुनाव को लेकर सपा के अलावा भाजपा और कांग्रेस की स्थिति देखें। भाजपा के पास अपने सहयोगियों सहित 294 वोट हैं। उसे आठ सीटें जीतने के लिए 296 वोट की जरुरत है। अगर भाजपा और सहयोगी एकजुट रहते हैं तो रघुराज प्रताप सिंह की पार्टी के दो वोटों के सहारे भाजपा के सभी आठ उम्मीदवार जीत जाएंगे। लेकिन अगर सपा ने धनराज नाथवानी को तीसरा उम्मीदवार बनाया तो क्या होगा? तब यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा आठवीं सीट जीतने के लिए कितना दम लगाती है। यह बड़ा सवाल है कि क्या भाजपा दम लगा कर नाथवानी को हरा देगी? इसकी संभावना शून्य है।
अगर अखिलेश यादव व मुस्लिम समीकरण के हिसाब से पहला और दूसरा उम्मीदवार रामगोपाल यादव और सलीम शेरवानी को बनाते हैं और नाथवानी को तीसरा उम्मीदवार बनाते हैं और भाजपा उनको जीतने देती है तो इसका अर्थ होगा कि भाजपा के कहने पर यह खेल रचा गया है। इससे सपा को एक सीट का फायदा तो होगा लेकिन विधानसभा चुनाव में बड़ा नुकसान हो सकता है। अगर सपा अपने पीडीए फॉर्मूले की चिंता किए बगैर नाथवानी को दूसरा उम्मीदवार बनाती है और तीसरी सीट पर सलीम शेरवानी या किसी अन्य को उतारती है और सीट नहीं जीत पाती है तब भी माना जाएगा कि नाथवानी की सीट का मैनेजमेंट बहुत ऊपर से हुआ है, जिसमें अंबानी समूह के अलावा भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी शामिल है। लेकिन अगर सपा नाथवानी को तीसरा उम्मीदवार बनाए बगैर तीनों सीटों पर जीतती है तो अलग कहानी दिखाई देगी।
कांग्रेस इस मामले में क्या करेगी यह भी बहुत अहम है। ऐसा नहीं हो सकता है कि कांग्रेस को परदे के पीछे के खेल की जानकारी नहीं हो। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने भी मुकेश अंबानी के यहां तार जोड़े हैं। तभी इंदौर में मुकेश अंबानी को ‘सिस्टम का हिस्सा’ बताने के एक हफ्ते के बाद ही राहुल गांधी ने दिल्ली की प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनको ‘डिस्ट्रॉयर ऑफ डेमोक्रेसी’ की सूची से बाहर कर दिया। सो, अगर कांग्रेस को परदे के पीछे के खेल का पता है और खेल भाजपा के समर्थन वाला है तब क्या राहुल सपा से नाता तोड़ेंगे? य़ह बड़ा सवाल है कि अगर अखिलेश यादव देश के सबसे बड़े कारोबारी और भाजपा के शीर्ष नेताओं के साथ एक कॉरपोरेट हस्ती को राज्यसभा भेजेने का फैसला किया है फिर भी राहुल अगर उनके साथ चुनाव लड़ते हैं तो क्रोनी कैपिटलिज्म से लड़ने के उनके एजेंडे का क्या होगा?
राहुल गांधी पता नहीं यह हिम्मत दिखाएंगे या नहीं लेकिन अगर वे यह हिम्मत दिखाते और एक्सपोज करते कि अखिलेश भी भाजपा और उसके क्रोनी पूंजीपतियों से मिले हुए हैं और थाली में परोस कर फिर से उत्तर प्रदेश की सत्ता उनको दे रहे हैं तो वे इसका राजनीतिक लाभ ले सकते हैं। हालांकि यह बहुत जोखिम भरा है कि वे सपा और भाजपा की मिलीभगत बता कर अकेले चुनाव लड़ें। ऐसे में मुस्लिम वोटों के साथ साथ भाजपा विरोधी वोट में भी बंटवारा होगा, जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा।
इसलिए यह देखना होगा कि मुकेश अंबानी की कंपनी के एक कर्मचारी को राज्यसभा भेजने वाली पार्टी के साथ राहुल गांधी तालमेल करते हैं या नहीं। ध्यान रहे कोई बहुत ही नादान व्यक्ति होगा जो अखिलेश यादव की ओर से दिए जा रहे तर्कों पर यकीन करेगा। सामान्य समझ का व्यक्ति भी इस बात को समझ रहा है कि यह फैसला कैसे हुआ होगा। अखिलेश कह रहे हैं कि नई पीढ़ी के युवा को भेज रहे हैं या सभी पार्टियों को उद्योग समूहों के साथ समन्वय की आवश्यकता होती है। ये दोनों बातें सहीं है फिर भी इस कसौटी पर मुकेश अंबानी की कंपनी के कॉरपोरेट अफेयर्स संभालने वाले, गुजरात के रहने वाले और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी रहे परिमल नाथवानी के बेटे का चुना जाना सिर्फ संयोग नहीं है।
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