अमेरिका के मिडटर्म चुनाव की एक खास बात यह थी कि चुनाव बिल्कुल भारत के अंदाज में लड़ा जा रहा था। चुनाव से पहले ट्रंप ने प्रवासियों के नाम काटने शुरू किए थे। मतदाता पहचान पत्र अनिवार्य करने की मांग कर रहे थे। एसआईआर कराने की बात हो रही थी। कई राज्यों में परिसीमन कराया, जैसा भारत में करने की तैयारी हो रही है। चुनाव जीतने पर हर अमेरिकी के खाते में पांच हजार डॉलर डालने का ऐलान किया गया, जैसा भारत में ‘मुफ्त की रेवड़ी’ बांट कर चुनाव जीतने का चलन चला है। इल़ॉन मस्क ने भी हर बच्चे को अपनी कंपनी स्पेसएक्स का एक एक शेयर देने का ऐलान किया था। भारत की तरह ही वहां भी गोरे अमेरिकी ईसाई बनाम अन्य का मुकाबला बनाया जा रहा था।
बाहरी लोगों को निकालने या उन्हें परेशान करने की नीति को इमिग्रेशन एंड कस्टम एन्फोर्समेंट यानी आईसीई के जरिए आक्रामक तरीके से लागू कराया गया। हम और वे का मुकाबला बनाया जा रहा था, जैसे भारत में 80 और 20 का चुनाव बनाने की कोशिश हो रही है। भारत की तरह ही वहां भी कहा जा रहा था कि विपक्ष के पास चेहरा कहां है? ट्रंप के मुकाबले डेमोक्रेटिक पार्टी का पास कोई नेता नहीं है, इसका खूब नैरेटिव बनाया गया। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह ही चुनाव प्रचार में ट्रंप ने हर जगह कहा कि लोग उनका चेहरा देख कर वोट दें। उन्होंने कहा कि हर जगह वे खुद लड़ रहे हैं। इसके बावजूद अमेरिका के लोगों ने रिपब्लिकन पार्टी को ऐसा हराया है, जैसा पिछले चार दशक में कोई पार्टी नहीं हारी है। लोगों ने जम कर गुस्सा निकाला। ट्रंप ने पारंपरिक रूप से रिपब्लिकन असर वाले जिन राज्यों में परिसीमन कराया था वहां भी उनकी पार्टी हारी और बुरी तरह से हारी।
लोगों ने इस बात की बिल्कुल चिंता नहीं दिखाई कि वे किसको जिताने के लिए वोट कर रहें। उन्होंने तय किया कि ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी को हराना है। इसके बाद उनके सामने कोई चेहरा नहीं था। सोचें, चुनाव से पहले डेमोक्रेटिक पार्टी की क्या स्थिति थी? पार्टी के पास राष्ट्रीय स्तर पर कोई चेहरा नहीं था। जो बाइडेन 2024 का चुनाव लड़ते समय ही बीमार और अशक्त हो गए थे। वे लोगों के नाम, चेहरे आदि भूलने लगे थे। तभी एक ही टर्म के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी को उम्मीदवार बदलना पड़ा था। उप राष्ट्रपति कमला हैरिस चुनाव लड़ीं। लेकिन हारने के बाद वे भी राजनीति से दूर हो गईं। इस तरह 2020 से 2024 तक जो दो चेहरे डेमोक्रेटिक पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे थे वो दोनों चेहरे इस चुनाव में प्रासंगिक नहीं थे।
भारत में भी बार बार कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी के मुकाबले विपक्ष के पास कौन चेहरा है? यह सवाल किया जाता है कि क्या मोदी को वोट नहीं दें तो राहुल गांधी, अखिलेश या तेजस्वी यादव को दे दें? बड़ी होशियारी से यह नैरेटिव बनाया जाता है और टीना फैक्टर यानी देयर इज नो ऑल्टरनेटिव का प्रचार किया जाता है। अमेरिका में भी कोई ऑल्टरनेटिव नहीं था। लेकिन हर राज्य में ऐन चुनाव के दौरान कई चमकदार चेहरे उभरे और डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रचार का नेतृत्व किया। लोगों ने किसी को जिताने की बजाय ट्रंप को हराने का फैसला किया इसलिए चेहरे गौण हो गए।
इसलिए यह सोचना ही गलत है कि भारत में चेहरा कौन है और मोदी को कौन चुनौती देगा। याद करें कैसे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की एक टिप्पणी के बाद कॉकरोच जनता पार्टी बनी। उसने कैसे केंद्र की सर्वशक्तिशाली सरकार को घुटने पर ला दिया। क्या सीजेपी या उसके संस्थापक अभिजीत दीपके का कोई मतलब है? इनका कोई मतलब नहीं है। पेपर लीक और परीक्षा की गड़बड़ियों के कारण देश के युवा और उनके अभिभावक नाराज थे। वे सीजेपी की अपील पर स्वाभाविक रूप से सड़क पर उतरे और आंदोलन किया। युवाओं को चेहरे से कोई मतलब नहीं था। आज भी राजधानी दिल्ली से लेकर देश के दूरदराज के इलाकों में भी अलग अलग मुद्दों पर आम जनता की नाराजगी अलग अलग लोगों के नेतृत्व में हो रहे आंदोलनों से प्रकट हो रही है।
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