यह अनोखी स्थिति है। देश भर में चुनाव आयोग एसआईआर की प्रक्रिया चला रहा है, जिसमें फॉर्म सात भर कर लोग थोक में लोगों के नाम कटवा रहे हैं। इसकी शिकायतें देश के हर राज्य से मिल रही हैं। कर्नाटक सरकार ने तो फॉर्म सात का इस्तेमाल करके लाखों लोगों के नाम कटवाने के मामले की जांच के लिए एक कमेटी बनाई है। राजधानी दिल्ली में भी इस तरह के केसेज सामने आए हैं। भारतीय जनता पार्टी के बूथ लेबल एजेंट यानी बीएलए ने फॉर्म सात भर कर 28 लोगों के नाम काटने का आवेदन दे दिया। जांच में पता चला कि सभी 28 नाम मुसलमानों के हैं। इसकी शिकायत हुई तो मामले की जांच करने का फैसला किया गया। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताया कि कई जगह फॉर्म सात के जरिए नाम कटवाए गए हें। एक जगह नंदलाल नाम के एक व्यक्ति के फर्जी दस्तखत करके कई लोगों के नाम कटवाए गए। सीतापुर में ऐसी घटना होने के आरोप लगे। अखिलेश ने इसके अलावा गाजियाबाद, गाजीपुर, लखनऊ, औरैया, कन्नौज जैसे कई क्षेत्रों में नाम काटने की शिकायत की है। उन्होंने दावा किया है कि फॉर्म सात का दुरुपयोग करके पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकों के नाम काटे जा रहे हैं। कई जगह चुनाव आयोग ने शिकायतों का संज्ञान लिया है और जांच की जा रही है। ध्यान रहे दिल्ली और उत्तर प्रदेश का मामला कोई अपवाद का मामला नहीं है।
एसआईआर की पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा शिकायत फॉर्म सात के जरिए लोगों के नाम कटवाने को लेकर ही है। पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद में ऐसी कई घटनाएं हुई थीं। चुनाव आयोग की ओर से नियुक्त बूथ लेवल अधिकारी यानी बीएलओ ने कई जगह ऐसी घटनाएं पकड़ीं। सबसे पहले राहुल गांधी ने मतदाता सूची की गड़बड़ी का जो मुद्दा उठाया था वह इसी से जुड़ा था। उन्होंने कर्नाटक की महादेवपुरा और आलंद सीट को लेकर कई सबूत सामने रखे थे। राहुल गांधी ने बताया था कि एक ही फोन नंबर का इस्तेमाल करके कैसे सैकड़ों नाम काटने के आवेदन किए गए हैं। उनका दावा है कि केंद्रीकृत तरीके से यह काम हो रहा है। उनका आरोप है कि चुनाव आयोग इस मामले में भारतीय जनता पार्टी के हिसाब से काम कर रहा है। राहुल और अन्य विपक्षी पार्टियों का दावा है कि चुनाव आयोग ने सारी सूची भाजपा को उपलब्ध कराई है और भाजपा के लोग चुनिंदा समूहों के लोगों के नाम कटवा रहे हैं। पता नहीं इन आरोपों में कितनी सचाई है लेकिन यह हकीकत है कि फॉर्म सात के दुरुपयोग की खबरें देश के हर हिस्से से आ रही हैं।
कर्नाटक में फॉर्म सात के जरिए 2.29 लाख से ज्यादा नाम काटने की अपील की गई है। जयनगर विधानसभा में 58 सौ से कुछ ज्यादा नाम फॉर्म सात के जरिए कटवाने की कोशिश हुई। आलंद में भी हजारों फर्जी आपत्ति दर्ज कराने के मामले सामने आए हैं। अगर उत्तर प्रदेश की बात करें तो पीलीभीत, संत कबीर नगर में हजारों लोगों के नाम पर आपत्ति दर्ज कराने का मामला सामने आया। फॉर्म सात के जरिए इनके नाम कटवाने के आवेदन किए गए। यह नियम अपने आप में ठीक नहीं है कि किसी मतदाता का नाम कटवाने के लिए कोई दूसरा व्यक्ति आवेदन करे। लेकिन उससे भी ज्यादा खराब यह व्यवस्था थी कि कोई भी व्यक्ति कितनी भी आपत्ति दर्ज कर सकता था। तभी एक एक व्यक्ति सैकड़ों लोगों के नाम काटने का आवेदन करने लगा। जब चारों तरफ से शिकायतें मिलने लगीं तब जाकर नाम काटने के आवेदनों की संख्या सीमित की गई।
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