राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

फॉर्म छह का दुरुपयोग सबसे बड़ा मसला

विपक्षी पार्टियां एक तरफ नाम काटे जाने की वजह से परेशान हैं तो दूसरी ओर फर्जी नाम जोड़े जाने की शिकायत भी कर रही हैं। नाम काटने का जहां तक मामला है तो उसमें विपक्ष की परेशानी दो तरह से है। एक परेशानी तो यह है कि चुनाव आयोग ‘एएसडीडी’ यानी ‘एब्सेट, शिफ्टेड, डेड एंड डुप्लीकेट’ श्रेणी में मतदाताओं के नाम खुद से काट रही है और दूसरे भाजपा के बूथ लेवल एजेंट या अन्य लोग फॉर्म सात भर कर विपक्षी पार्टियों के मतदाताओं के नाम कटवाने के उपाय कर रहे हैं। फॉर्म सात के दुरुपयोग के साथ साथ विपक्ष को फॉर्म छह के दुरुपयोग की चिंता भी सता रही है। फॉर्म छह में बदलाव करके उसके साथ तीन डिक्लेरेशन जोड़ने की वजह से युवा और पहली बार के मतदाताओं को एसआईआर के दौरान कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि फॉर्म छह में बदलाव नहीं किया जा सकता है।

बहरहाल, फॉर्म छह के दुरुपयोग का मामला पिछले साल कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कर्नाटक की महादेवपुरा सीट से उठाया था। राहुल गांधी ने अगस्त 2025 में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी, जिसमें महादेवपुरा चुनाव क्षेत्र में बड़े पैमाने पर फर्जी नाम जोड़े जाने का मुद्दा उठाया था। राहुल गांधी ने दावा किया था कि 33 हजार से ज्यादा अयोग्य लोगों के यानी फर्जी लोगों के नाम मतदाता सूची में जुड़वाए गए हैं। इतना ही नहीं राहुल ने इस असामान्य घटनाक्रम को चुनाव आयोग और भाजपा की मिलीभगत से जोड़ा था। उन्होंने कहा था कि केंद्रीकृत तरीके से और कॉल सेंटर के जरिए बहुत व्यवस्थित तरीके से फर्जी मतदाता हर जगह जोड़े जा रहे हैं।

फर्जी तरीके से नाम जोड़े जाने के आरोप यही समाप्त नहीं होते हैं। विपक्ष इस बात की ओर भी ध्यान दिला रहा है कि इन दिनों हर मतदान के बाद अचानक मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी हो जा रही है। पहले शाम छह बजे मतदान समाप्त होने के बाद चुनाव आयोग की ओर से जो आरंभिक आंकड़े दिए जाते थे उनमें दो से तीन फीसदी का अंतर आता था। लेकिन अब सात से आठ फीसदी का अंतर सामान्य हो गया है। कई राज्यों के चुनाव में तो मतदान समाप्त होने के 24 घंटे बाद तक मतदान के आंकड़े अपडेट होते रहे। महाराष्ट्र में अलग अलग चरणों में नवंबर 2024 में हुए विधानसभा चुनाव में मतदान समाप्त होने पर चुनाव आयोग की ओर से जारी वोटिंग का आंकड़ा 58.22 का था, जबकि अंतिम आंकड़ा 65.11 फीसदी का था। यानी करीब सात फीसदी का अंतर आ गया।

विपक्षी पार्टियों का कहना है कि फॉर्म छह का इस्तेमाल करके फर्जी तरीके से जो नाम जोड़े जाते हैं उनका इस्तेमाल मतदान के बाद मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए किया जाता है। महाराष्ट्र की एक मिसाल है। लगभग सभी राज्यों में मतदान समाप्त होने के समय जारी आंकड़े और अंतिम आंकड़ों में बड़ा अंतर आ रहा है। सोचें, पहले बैलेट पेपर से वोटिंग होती थी तब भी चुनाव आयोग शाम छह बजे आरंभिक आंकड़े जारी करता था और रात 11 बजे तक अंतिम आंकड़े आ जाते थे। लेकिन अब ईवीएम से वोटिंग होती है और 24 घंटे तक आंकड़े अपडेट होते रहते हैं। इन आरोपों की भी गहराई से जांच होनी चाहिए।

सो, चाहे तार्किक विसंगति का मामलो हा, फॉर्म छह के जरिए फर्जी नाम जोड़े जाने की शिकायतें हो या थोक में फॉर्म सात भर कर नाम कटवाने के आवेदन हों, इन दिनों चारों तरफ इन्हीं बातों की चर्चा है। फॉर्म आठ का मामला भी है, जो उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में दिखा। वहां बिना फॉर्म आठ भरे ही लोगों के नाम और दूसरी जानकारियों में कथित रूप से सुधार किया गया। सुधार के नाम लोगों के नाम और दूसरी जानकारियां गलत कर दी गईं। गोवा की शिकायत भी आई थी, जहां लोगों के नाम ‘एएसडीडी’ श्रेणी में काट दिए गए थे और उसके बाद उनसे कहा जा रहा था कि वे फॉर्म छह भर कर नाम जुड़वाएं। अनेक लोगों ने इस पर सवाल उठाया और कहा कि उनको फॉर्म आठ के जरिए सुधार कराने का मौका मिलना चाहिए। इन तीनों फॉर्म के अलावा सॉफ्टवेयर की गड़बड़ियां अलग हैं। कई जगह कथित रूप से सॉफ्टवेयर मतदाताओं के हिंदी नाम का अंग्रेजी में अनुवाद कर रहा है। इससे भी हास्यास्पद स्थिति बन रही है। यह शिकायत भी कई जगह से आई कि ईसीआईनेट और ईआरओनेट का एक्सेस सीमित किया गया। मुख्य चुनाव आयुक्त के मनमाने तरीके से काम करने और बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों को फैसले में नहीं शामिल करने की शिकायत का खुलासा तो इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में किया ही था। सो, कह सकते हैं कि किसी न किसी वजह से चुनाव आयोग और उसका कामकाज सवालों के घेरे में है और उससे पूरी चुनाव प्रक्रिया पर संदेह पैदा हुआ है।

Tags :

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

Leave a comment