सात अक्टूबर को मोदी के शीर्ष सरकारी पद पर रहते हुए 25 साल के मौके को खास बनाने के लिए बहुत कुछ हैं। उससे पहले उनका जन्मदिन भी है। वे 17 सितंबर को 76 साल के होंगे। पिछले साल जब अमृत वर्ष हुआ था तब इस बात की बहुत चर्चा हुई थी कि अब वे 75 साल के हो गए तो क्या पार्टी के अघोषित नियम के मुताबिक उनको रिटायर हो जाना चाहिए? उसी समय संघ प्रमुख मोहन भागवत भी 75 साल के हुए थे। फिर दोनों ने तय किया कि 75 साल का नियम दूसरे लोगों के लिए है, जो उन पर लागू नहीं होगा और दोनों अपने पद पर बने रहे।
पिछले साल जुलाई में मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में लगातार 4,078 दिन पद पर रह कर इंदिरा गांधी का 4,077 दिन लगातार पीएम रहने का रिकॉर्ड तोड़ा था। इस साल 10 जून को एक नए रिकॉर्ड की खूब चर्चा हुई। भाजपा ने एक नई श्रेणी बनाई और कहा कि मोदी अब सबसे ज्यादा दिन पद पर रहने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री हो गए हैं। भाजपा का कहना है कि नेहरू 1947 में प्रधानमंत्री बने तो निर्वाचित नहीं थे। निर्वाचित प्रधानमंत्री वे 1952 में बने थे और लगातार 4,398 दिन पद पर रहे थे। 10 जून 2026 को मोदी के प्रधानमंत्री पद पर 4.399 दिन पूरे हुए और उन्होंने नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया। मोदी की इन दोनों उपलब्धियों में लगातार और निर्वाचित शब्द महत्वपूर्ण है क्योंकि सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री रहने के मामले में वे अब भी इंदिरा गांधी से तीन साल और नेहरू से पांच साल पीछे हैं। जब भाजपा और केंद्र सरकार इस बात का उत्सव मना रहे थे कि मोदी लगातार सबसे ज्यादा दिन निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने वाले नेता बन गए हैं और नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया है तब हिंदी के एक लेखक ने तंज करते हुए लिखा था कि मोदी जब 79 साल के होंगे तब वे धरती पर महात्मा गांधी से ज्यादा सांस लेने का रिकॉर्ड तोड़ देंगे।
बहरहाल, उनके नाम से अनगिनत रिकॉर्ड दर्ज हो गए हैं। वे लगातार सबसे ज्यादा दिन प्रधानमंत्री रहने वाले निर्वाचित नेता हैं, मुख्यमंत्री रहते पीएम पद के दावेदार घोषित होने और पीएम बनने वाले पहले नेता हैं, दोनों पद मिला कर 25 साल रहने वाले पहले नेता हैं, संसद की सीढ़ियों पर माथा टेकने वाले पहले नेता हैं, संविधान को माथे से लगा कर सेंट्रल हॉल में भाषण देने वाले पहले नेता हैं, नए संसद भवन में बतौर प्रधानमंत्री बोलने वाले पहले नेता हैं। आदि, आदि। सोचें, उन्होंने क्या क्या रिकॉर्ड नहीं बनवाए। नेहरू ने आजादी की आधी रात को भाषण दिया था तो मोदी ने भी आधी रात को संसद का सत्र बुला कर जीएसटी कानून लागू कराया था। ‘एक देश, एक कानून’ का ढिंढोरा पीटा गया है, जबकि वास्तविकता यह है कि देश अब भी कई तरह के टैक्स से जूझ रहा है। गुजरात का मुख्यमंत्री रहते जीएसटी का विरोध करने वाले मोदी ने जिस धूमधाम से जीएसटी लागू किया वह हैरान करने वाला था। नोटबंदी के तुरंत बाद लागू किए गए जीएसटी ने देश के छोटे व मझोले उद्यम के इकोसिस्टम को तबाह कर दिया। फिर भी नोटबंदी भी उपलब्धि है और जीएसटी भी उपलब्धि है। लोग कहेंगे कि अब मोदीजी नोटबंदी पर नहीं बोलते हैं। उनको बोलने की जरुरत नहीं है। अभी एक भव्य बजट की फिल्म बनवा कर दिखाया गया है कि नोटबंदी का देश को कितना फायदा मिला।
एक देश, एक टैक्स की तरह प्रधानमंत्री को एक देश, एक कुछ भी करने का जुनून है। तभी एक देश, एक परीक्षा के लिए एनटीए का गठन किया गया। देश के इतिहास में इतना नाकारा कोई संगठन आज तक नहीं बना है। आए दिन पेपर लीक, परीक्षा में गड़बड़ी, धांधली आदि की खबरें आती हैं। अभ्यर्थियों की संख्या के लिहाज से सबसे बड़ी परीक्षा मेडिकल में दाखिले की नीट यूजी परीक्षा होती है। पिछली तीन परीक्षाओं में से दो में पेपर लीक हो गए और परीक्षा केंद्रों पर धांधली हुई। इसके बाद भी शिक्षा मंत्री का इस्तीफा कराने के लिए छात्रों को 35 दिन दिल्ली में धरना देना पड़ा। स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता लगातार गिरती जा रही है। भाई साहेब लोगों के आगे पीछे घूमने वाले फिसड्डी लोगों को नियुक्त किया जा रहा है। सारे रिसर्च सेंटर भी ऐसे ही चल रहे हैं। खुद नीति आयोग ने कहा है कि देश के 15 से 29 साल के युवाओं में से 8.7 करोड़ युवा ऐसे हैं, जो न पढ़ रहे हैं, न किसी कौशल का प्रशिक्षण ले रहे हैं और न कोई काम कर रहे हैं। सोचें, लगभग नौ करोड़ लोग ऐसे हैं, जो कुछ नहीं कर रहे हैं। यह शिक्षा और कौशल विकास योजना की उपलब्धि है! अब एक देश, एक चुनाव की तैयारी चल रही है।
अगर प्रचार के लिए उपलब्धियों की बात करें तो उसकी सूची इतनी लंबी है कि कई पन्ने कम पड़ जाएंगे। एक बड़ी उपलब्धि आधार है, जिसका मुख्यमंत्री रहते मोदी ने विरोध किया था। प्रधानमंत्री बने तो आधार को हर चीज के लिए अनिवार्य किया गया। अब पता चला है कि आधार किसी काम का नहीं है। सोचें, एक समय पूरा देश अपने बैंक खाते आधार से जोड़ रहा था, वोटर आईडी आधार से जोड़ रहा था, पैन कार्ड को आधार से जोड़ रहा था और बाद में पता चला कि इनमें से किसी दस्तावेज का कोई खास मतलब नहीं है। देश का नागरिक अदालत में 16 दस्तावेज पेश करके भी अपने को नागरिक नहीं प्रमाणित कर पा रहा है।
लाल किले से पहले भाषण में प्रधानमंत्री ने सफाई और शौचालय की बात की। बहुत अच्छी बात थी। लेकिन अब कोई बात नहीं करता है। भारत दुनिया के सबसे गंदे शहरों वाला देश है। दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों की बात होती है तो नौ भारत के होते हैं। लाल किले से पहले भाषण में जैम यानी जन धन खाता, आधार और मोबाइल की बात की और उसके जरिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की योजना चली। क्या उससे देश के लोगों का सशक्तीकरण हुआ? आधार, मोबाइल और जन धन खाता सिर्फ सरकारों की ओर से मिलने वाली मुफ्त की रेवड़ी के ट्रांसफर का माध्यम बना। खाता खुलने से न लोगों का बिजनेस चलने लगा और न नौकरी मिली। लेकिन इसका प्रचार होता है कि डीबीटी के जरिए कितने लाख करोड़ रुपए की बचत हो गई। एक तरफ डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल से लाखों करोड़ रुपए बचाने की बात होती है और दूसरी ओर यूपीआई के इस्तेमाल पर शुल्क लगाने की बात कही जाती है। ऐसे ही विरोधाभासों में सरकार काम कर रही है।
उपलब्धियों के प्रचार में गिनाया जाता है कि सरकार ने फसल बीमा योजना लागू किया है, जिस पर कितने लाख करोड़ खर्च हुए हैं। हकीकत यह है कि लाखों की संख्या में किसान अब फसल बीमा योजना से बाहर निकल रहे हैं क्योंकि इससे उनको कोई फायदा नहीं हो रहा है। पूरे देश में 73 लाख किसान इस योजना से बाहर हो गए हैं, जिनमें से 37 लाख अकेले महाराष्ट्र के हैं। आयुष्मान भारत योजना से मुफ्त इलाज की बात हो रही है लेकिन वास्तविकता यह है कि आम लोगों की बजाय निजी अस्पताल और बीमा कंपनियां इसका लाभ ले रही हैं। ये दोनों बीमा योजनाएं विफलता का स्मारक हैं। यह वैसा ही है, जैसे लोगों ने नदी पर पुल बनाने को कहा तो सरकार ने उन्हैं नदी पार करने के लिए नाव पकड़ा दी और कहा कि नाव वाले का किराया सरकार देगी। लोगों को अच्छे अस्पताल चाहिए, अच्छे डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ चाहिए। उन्हें सस्ती व गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा चाहिए तो सरकार बीमा योजना पकड़ा रही है। किसानों को फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य या एक निश्चित आय़ चाहिए तो सरकार बीमा योजना दे रही है। वैसे 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा था मोदी का। उलटे किसानों की खेती की लागत कई गुना बढ़ गई।
उपलब्धियों के प्रचार में बताया जाता है कि पहले 74 हवाईअड्डे थे और अब 166 हो गए हैं। यह नही बताया जाता है कि उनमें से कितने बंद हो गए और कितने नाम के लिए चल रहे हैं। यह भी नहीं बताया जाता है कि पहले से चल रह मुनाफा कमाने वाले कितने हवाईअड्डे निजी कंपनियों और खास कर अडानी की कंपनी को दे दिए गए। प्रचार में बताया जाता है कि पहले 11 किलोमीटर हाईवे रोज बनते थे और आज उससे तीन गुना यानी 33 किलोमीटर सड़क बन रही है। लेकिन यह नहीं बताया जाता है कि किलोमीटर मापने का पैमाना बदल दिया गया है। यह भी नहीं बताया जाता है कि कितने हाईवे नीलाम कर दिए गए और लोगों से कितने लाख करोड़ रुपए टोल टैक्स के नाम पर वसूले जा रहे हैं। गाड़ी खरीदने पर जीएसटी से लेकर रजिस्ट्रेशन, रोड टैक्स, ईंधन पर टैक्स और सेस से लेकर टोल टैक्स तक एक गाड़ी वाला पांच जगह टैक्स देता है।
प्रचार के लिए बताया जाता है कि भारत विश्वगुरू हो गया है और दुनिया अब भारत की बात गंभीरता से सुनती है। वास्तविकता यह है कि दुनिया छोड़िए भारत अपने पड़ोस में ही बेगाना हो गया है। एक भी देश भारत का दोस्त नहीं रहा। पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार और मालदीव सीधे चीन के दोस्त बन गए हैं और उसके हिसाब से अपनी सामरिक व विदेश नीति तय कर रहे हैं। बांग्लादेश, नेपाल और मालदीव तीनों के प्रधानमंत्रियों ने परंपरा तोड़ कर पहला दौरा चीन का किया। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से दोस्ती के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने क्या कुछ नहीं किया लेकिन टैरिफ से लेकर अवैध प्रवासियों को देश से निकालने और वीजा रोकने तक ट्रंप की नीतियों से सबसे ज्यादा नुकसान भारत उठा रहा है।
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