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भाजपा अब खोखा नहीं तो क्या?

मैंने जनसंघ, भाजपा को बढ़ते-बनते देखा है। लोकसभा की दो सीट (1984) व 7.7 प्रतिशत वोटों से 282 सीटें (2014) तथा 31.3 प्रतिशत वोट प्राप्ति का विकास भी देखा। 1984 से 2014 के इन तीस वर्षों में भाजपा-संघ की तब पूंजी थी चाल, चेहरा और चरित्र। और इसी के क्रम में 2014 में नरेंद्र मोदी ने एकछत्र सत्ता पाई। वह सब अब उस खोखे में कनवर्ट है, जिसका न कोई धर्म है, न ईमान और न चरित्र। इन बारह वर्षों में अमित शाह से मौजूदा नितिन नवीन की अध्यक्षता की भाजपा भारत की राजनीति का वह खोखा बन चुकी है, जो गुजराती-मारवाड़ी धनपशुओं की कॉर्पोरेट शेल (खोखा) कंपनियों की धंधेबाजी का मात्र एक मॉडल है।

खोखा मॉडल मतलब दिखावे के लिए, ऊपरी तौर पर एक वैध, कानूनी और जीवंत ढांचे की झांकी है, लेकिन असल में एक मालिक के स्वामित्व, निर्णय-शक्ति, उसकी निज संपत्ति व निज भूख का वह भभका होता है, अनैतिक धंधा होता है। जैसे अरबपतियों के कॉर्पोरेशन की खोखा कंपनियां कागज़ों पर निदेशक, वार्षिक बैठकें और शेयरधारकों की मौजूदगी दिखाती हैं, लेकिन किसी के पास रियल फैसलों का अधिकार नहीं होता, वैसे ही नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने पूरी भाजपा, उसकी हर स्तर की सत्ता, संगठनात्मक मोर्चों को खोखा कंपनियों में बदल दिया है। पूरे ताने-बाने में नरेंद्र मोदी के अलावा किसी भी चेहरे का अर्थ नहीं है।

तभी इस सप्ताह मैंने नितिन नवीन की अध्यक्षता के पदाधिकारियों की लिस्ट देखी तो तत्क्षण मुझे 1980 दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में भाजपा गठन के चेहरे याद हो आए। तब चेहरे अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी, उपाध्यक्ष आडवाणी, राम जेठमलानी, विजयराजे, के. एस. हेगड़े, सिकंदर बख्त थे। महामंत्री थे नानाजी देशमुख (शुरुआती बैठकों में मार्गदर्शक), यदुनाथ जोशी, लालजी टंडन, सुरजीत सिंह बरनाला। वही शांतिभूषण कोषाध्यक्ष। कार्यकारिणी में थे मुरली मनोहर जोशी, भैरोसिंह शेखावत, शांताकुमार, सुषमा स्वराज, प्रमोद महाजन, जे. जे. कृष्णमूर्ति, आरिफ बेग, जगन्नाथराव जोशी, सुंदरसिंह भंडारी।

वाजपेयी के बाद आडवाणी तीन बार, मुरली मनोहर जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे एक-एक बार अध्यक्ष बने। फिर वाजपेयी-आडवाणी की सरकार बनी, तब सत्ता ने अपनी सहूलियत से अध्यक्ष बनवाए थे। बावजूद इसके संघ से सलाह करके ही तब जनसंघ-संघ में खंपे के जनाकृष्ण, बंगारू लक्ष्मण, वेंकैया नायडु के चेहरे थे। फिर राजनाथ सिंह व नितिन गडकरी अध्यक्ष बने। इनके उपाध्यक्ष, महामंत्री, कार्यकारिणी सदस्य एक से बढ़कर एक, हैसियत वाले चेहरे थे। तीस-चालीस साल जमीनी राजनीति में खपने वाले। न तब कोई मुखौटा संस्था व चेहरे थे और न सत्तावान नेताओं ने होल्डिंग कंपनी, याकि आरएसएस को कभी औकात दिखाई। सभी जमीनी याकि मास लीडर थे। शेखावत, शांताकुमार, प्रमोद महाजन, कल्याण सिंह, सुषमा स्वराज आदि सभी अपनी-अपनी पूंजी लिए हुए थे। मजाल जो मजदूर संघ (दत्तोपंत ठेंगड़ी), स्वदेशी जागरण मंच या किसान संघ प्रधानमंत्री वाजपेयी के आगे बोलती बंद रखें या सरकार की तुताड़ी बजाएं।

तब संघ प्रमुखों और पदाधिकारियों का भी वजूद व धर्म-ईमान था। निश्चित ही 1980 में देवरस, राजेंद्र सिंह और सुदर्शन का बोलना तब मतलब रखता था। इनके समय में मौजूदा मोहन भागवत की तरह नरेंद्र मोदी या अमित शाह के आगे संघ पदाधिकारियों का भीगी बिल्ली वाला व्यवहार नहीं था। तब राममंदिर आंदोलन मामले में संघ के एक मोरोपंत पिंगले सालों कर्ताधर्ता रहे। पर वे आज के संघ प्रचारक चंपत राय (मंदिर की चंदा चोरी), कृष्णगोपाल (विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों), इंद्रेश कुमार, सुरेश सोनी आदि जैसे नहीं थे। जाहिर है प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता की अपनी भूख के साथ संघ को भी पावर के नशे में झुमा दिया है। पूरे कुएं में भांग घुली हुई है। तभी चाल-चेहरे-चरित्र में पतन का वह पैंदा है, जिसके चलते दुनिया में भारत अब उभरता हुआ नहीं, बल्कि कॉकरोचों, गधेड़ों, दिमागी नक्सलियों जैसी बातों वाला देश है।

सोचें, भाजपा की नई टीम के चेहरों पर। नितिन नवीन की अध्यक्षता के मातहत अब राम माधव और वसुंधरा राजे बतौर उपाध्यक्ष हैं। यह इनका मान है या अपमान? बारह वर्षों से राम माधव दुनियाभर में फैले प्रवासी भारतीयों की भीड़ मोदी के लिए जुटवाई। मतलब जयशंकर से अधिक राम माधव उपयोगी रहे। उस हिसाब से मोदी को एक नौकरशाह जयशंकर की जगह राम माधव को विदेश मंत्री रखना था। लेकिन माधव क्योंकि राजनीतिक चेहरा हैं, वे बौने नहीं हैं तो नाकाबिल। दूसरी तरह देखें नितिन नवीन हाल में स्वयं की विधानसभा सीट पर भाजपा को नहीं जितवा पाए थे लेकिन वे वसुंधरा राजे के बॉस हैं।

यदि वसुंधरा राजे को संगठन के प्रमुख पद, राष्ट्रीय महामंत्री पद दिया जाता, तब भी उनके नाम से पद की धमक बनती। पर इस पद पर स्मृति ईरानी को बैठाया और हवाबाजी यह कि उनके और उन जैसे नए चेहरों से भाजपा युवाओं का दिल जीतेगी।

सो नितिन नवीन और भाजपा की नई टीम का एक ही मतलब है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह का एक वह खोखा, जो काम करता दिखेगा, लेकिन एक-एक बात पर मोदी-शाह के आदेशों से। ऐसी भाजपा वाजपेयी, आडवाणी से राजनाथ सिंह तक नहीं थी। तब कार्यकारिणी की बैठक हो या संसदीय बोर्ड की बैठक, सभी में पदाधिकारी अपनी-अपनी बात रखते थे, बहस करते थे। संघ से पूछते थे। सभी की निज हैसियत, आवाज थी। चेहरा, चाल, चरित्र था। तब न खोखा था और न उस पर नाचते-गाते अनाम, बौने लोग। इसलिए तब और अब का फर्क यह भी है कि प्रधानमंत्री वाजपेयी और गृहमंत्री आडवाणी जब सरकार चला रहे थे, तब उनका, उनकी सरकार का पक्ष-विपक्ष, देश-दुनिया में मान था, आदर था। उन्हें किसी ने गाली नहीं दी। न पुरानी पीढ़ी ने दी, न युवा लड़के-लड़कियों ने दी। न वे सोशल मीडिया या मीडिया में मजाक बने। जैसा कि इस समय, मोदी-शाह के राज में हर दिन का ट्रेंड होता है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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