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हिंदू राष्ट्र क्यों वांगचुक जैसे ‘कॉकरोच’ की सुने?

बेचारे सोनम वांगचुक! सांस मोदी के हिंदू राष्ट्र में ले रहे हैं बावजूद इसके माने बैठे हैं कि ‘जनमत को जागरूक करना और सत्ता में बैठे लोगों को समझाना, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं’। बारह वर्षों के अनुभवों में वांगचुक इतना भी नहीं समझ पाए कि मौजूदा हिंदू राष्ट्र के सिक्के के दो पहलू नहीं हैं। उसे इधर पलटिए या उधर, दोनों तरफ एक ही चेहरा है- नरेंद्र मोदी का। वही भक्तों के कलियुगी भगवान है। तभी हिंदू मानस में भगवान से जवाब-तलब नहीं होता, केवल पूजा, दर्शन और भक्ति होती है। तो कौन सा जनमत, कैसी जागरूकता और कैसी जवाबदेही?

इस सत्य का सबूत हजार साला गुलामी भी है। राम मंदिर टूटा, आक्रमण हुए, अपमान और पराधीनता का लंबा दौर बीता, लेकिन बहुसंख्यक हिंदू समाज ने कभी अपने आराध्य से यह प्रश्न नहीं किया कि ‘आपके रहते यह सब क्यों हुआ’? न ही उसके भीतर. दिमाग में यह आत्ममंथन बना कि हम हर संकट का समाधान स्वयं बनने के बजाय किसी भगवान, किसी अवतार, किसी उद्धारकर्ता की प्रतीक्षा में क्यों बैठे रहते हैं?

इक्कीसवीं सदी के कथित हिंदू राष्ट्र का भी यही सत्य है। हिंदू अब नागरिक नहीं भीड़ और भक्त में कनवर्ट है। इसलिए क्योंकि नागरिक सवाल पूछता है, जवाबदेही मांगता है। वह सत्ता को अपने प्रति उत्तरदायी मानता है। जबकि भक्त प्रश्न नहीं करता; वह आस्था में जीता है और मोदी के हर निर्णय को भगवान की लीला माने रहता है।

इसलिए सोचें, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ सालों के चाल, चेहरे, चरित्र ने हिंदुओं को कैसा ‘अवतार’ दिया? सदियों से किसी उद्धारकर्ता की प्रतीक्षा करते समाज के सामने अंततः नरेंद्र मोदी ऐसे स्थापित हुए कि वे या तो भगवान हैं, या मोदी ही भारत और भारत ही मोदी है। मोदी के हिंदू राष्ट्र में उन्ही की, अकेली की एक केंद्रित सत्ता है, जिसके सामने राष्ट्रपति, मंत्रिमंडल, संसद और भाजपा जैसी राजनीतिक पार्टी सभी गौण है। मोहन भागवत हों या अमित शाह, राजनाथ सिंह हों या नितिन गडकरी; चुनाव आयोग हो, न्यायपालिका हो, मीडिया हो या नौकरशाही- सत्ता का पूरा तंत्र मोदी के रचित तीर्थ (दिल्ली में बने नए प्रधानमंत्री महल, नई दफ्तरी इमारतों, कथित तीर्थ) की परिक्रमा करता होता है। कृपा, वैधता, प्रतिष्ठा और राजनीतिक भविष्य सभी का मालिक एक अकेले नरेंद्र मोदी। वैसे कलियुगी हिंदू इसी लायक है भी। आखिर हम मानते भी है कि जैसी प्रजा वैसा राजा। तब भला आज की दैवीय व्यवस्था में लोकतंत्र, जनमत, जागरूकता और जवाबदेही जैसे शब्दों का मूल्य कौड़ी भर भी होगा? कतई नहीं। नागरिक की जगह अब भक्त है और संस्थाओं की जगह व्यक्ति पूजा है तो सत्ता से प्रश्न पूछना या जवाबेदही की उम्मीद करना बेवकूफी वाली बातें हैं। ध्यान है पर्यावरणविद् और पूर्व आईआईटी प्रोफेसर जीडी अग्रवाल का नाम। बेचारे ने संन्यास लेकर स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद का नाम धारा और गंगा को अविरल-निर्मल रखने की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे। 111 दिनों तक जीवन दांव पर लगाने के बाद 11 अक्टूबर 2018 को ऋषिकेश के एम्स में दम तोड़ा। याद करें उनके निधन पर मोदी और उनकी सत्ता, संघ, भाजपा, साधु-संत, गंगा भक्तों. जनमत में किसी के भी आंसू नहीं निकले!

इसलिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20-21 दिनों से अनशन कर रहे सोनम वांगचुक का हिंदू राष्ट्र में जीरो अर्थ है। वे हिंदू अभिभावकों के बच्चों, देश की नई पीढ़ी के भविष्य के ठगी करने वाली नीट परीक्षा जैसी व्यवस्थाओं के खिलाफ कितना ही आंदोलन कर ले उनके लिए हिंदुओं की भीड़ नहीं जुटनी है। जो जुटी है या जुट रही है वह पहले से ही कॉकरोच का तमगा पाए हुए है। उन्हें चप्पल मार कर दबाया जाता है। कर्नाटक के एक अभिनेता प्रकाश राज ने जंतर मंतर जा कर बोला कि यह लड़ाई युवा छात्रों और देश के भविष्य की है व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने के लिए है। पर युवा छात्रों की भीड़ भी जब जंतर-मंतर नहीं पहुंची तो किसके लिए कौन सी लड़ाई?

जाहिर है भगवान और भक्तों के नए भारत में लड़ाई संभव नहीं है। पिछले बारह वर्षों में बार-बार उभरे पैटर्न पर गौर करें। क्या हुआ है? न देखो, न सुनो, न जवाब दो और बस दर्शन, प्रवचन और चौबीसों घंटे झूठ बोलो। चुनाव जीतने की लीला को झूठ-फरेब से पकाते जाओ। लोकतंत्र, मर्यादा, असहमति की तमाम बाते भाड़ में। गंगा बचाने का अनशन हो या छात्रों, किसानों के साथ खिलवाड़ में आंदोलन हो पहले तो अनदेखी करो। बात ज्यादा बढ़े तो उसे बदनाम करो। फिर उसे किसी राजनीतिक साजिश, विदेशी एजेंडा, खालिस्तानी, अर्बन नक्सल, टुकड़े-टुकड़े गैंग या विपक्ष, कॉकरोचों के खाते में डाल दो। ऐसा किसान आंदोलन के समय हुआ तो अब परीक्षाओं में धांधली के वाकिये में भी है। किसान, पहलवान, मणिपुर की पीड़ित महिलाएं, प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी छात्र और वांगचुक के मौजूदा मसले सब हिंदू राष्ट्र में वैसे ही हैंडल होते हुए है जैसे हिंदुओं की गुलामी के हजार सालों में हुआ। तब अंग्रेज हाकिमों का राजकाज तथा व्यवहार गुलाम प्रजा की रियलिटी में बना हुआ था। इक्कीसवीं सदी के हिंदू राष्ट्र में राजकाज भगवा और भक्त के उन रिश्तों में है, जिसमें सत्ता से प्रश्न राष्ट्रद्रोह है, हिंदूद्रोह है। इसलिए वांगचुक को या तो अनशन खत्म करना होगा या मरना होग। वैसे ही जैसे एक गंगा भक्त जीडी अग्रवाल ने 2018 में दम तोड़ा था।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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