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असली भारत का कैसे पता चलेगा?

भारत के एक स्टैंड अप कॉमेडियन हैं वीर दास। वीर दास ने अमेरिका के जॉन एफ कैनेडी सेंटर में एक शो किया था, जिसकी थीम उन्होंने रखी थी ‘आई कम फ्रॉम टू इंडियाज’। इस शो में उन्होंने भारत के विरोधाभासों के बारे में बताया था। विरोधाभास कई स्तर पर था। सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक हर तरह के विरोधाभास पर उनकी टिप्पणी थी। जैसे वीर दास ने कहा कि हिंदू दिन में देवियों की पूजा करते हैं और रात में महिलाओं के ऊपर अत्याचार होते हैं। इस तरह की अनेक बातें थीं, जिनको लेकर भारत में खूब विवाद हुआ। वीर दास के खिलाफ प्रदर्शन हुए। उनको देश विरोधी और हिंदू विरोधी बताया गया। उन पर पाबंदी लगाने की बात हुई।

यह सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने दो भारत की तस्वीर दिखाई थी।

सवाल है कि क्या देश के अंदर दो या कई पहचान, कई नाम नहीं हैं? भारत की विविधता की चर्चा होती है। लेकिन वह विविधता भौगोलिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, भाषायी स्तर पर है तो उसे गौरवशाली बता कर प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन सामाजिक या आर्थिक विषमताओं की जैसे ही कोई चर्चा करता है वैसे ही वह निशाने पर आ जाता। धार्मिक मामलों में भी विरोधाभासों की बात करें तो लोगों को बुरा लग जाता है। तभी सवाल है कि कैसे असली भारत की तस्वीर सामने आएगी? दूसरे भारत की ही तस्वीरें हर जगह दिखाई जाती हैं और उसी आधार पर दावा किया जाता है कि भारत तरक्की कर रहा है और आगे बढ़ रहा है, जबकि असल में ऐसा नहीं है।

मिसाल के तौर पर भारत में किसी से कहा जाएगा कि आर्थिक हालत बहुत खराब है, देश की अर्थव्यवस्था रसातल में जा रही है या आम आदमी बहुत परेशान है। तो तुरंत एक दूसरी तस्वीर पेश कर दी जाती है। यह तस्वीर दूसरे भारत की है। कहा जाता है कि अगर आर्थिक स्थिति इतनी खराब है तो लाखों की संख्या में आईफोन कैसे बिक रहे हैं? इन सवालों से लाजवाब करने की कोशिश होगी कि मॉल भरे हुए हैं, थिएटर भरे हुए हैं, महंगे फोन खरीदने के लिए लोग लाइन लगा कर खड़े हैं, महंगी गाड़ियों के लिए एडवांस बुकिंग हो रही है और कई महीनों की वेटिंग है फिर गरीबी कहां है? इस सवाल का क्या जवाब हो सकता है कि सिवाए इसके कि दो भारत हैं। एक भारत 90 या 95 फीसदी लोगों का है, जिनका जीवन संघर्षों से भरा है। जो पांच किलो अनाज से लेकर खैरात की दूसरी योजनाओं के इंतजार में रहते हैं। यह वो आबादी है, जो किसी तरह से जीवनयापन कर रही है। इसके मुकाबले जो पहला भारत है वह पांच से 10 फीसदी लोगों का है। अगर 10 फीसदी भी मानें तो यह संख्या 14 करोड़ के आसपास होती है। इस आबादी में काम कर रहे या रिटायर हो गए सरकारी अधिकारी व कर्मचारी हैं, जिनको नियमित वेतन और पेंशन मिल रहा है। संगठित क्षेत्र में काम करने वाले निजी पेशेवर हैं और मध्यम व बड़े कारोबारी हैं।

यह आबादी अपने आप में इतनी बड़ी है कि महंगे फोन और महंगी गाड़ियों का बाजार इनके लिए छोटा पड़ जाएगा।

यह आबादी ब्रिटेन की पूरी आबादी के ढाई गुने के बराबर है। अमेरिका की कुल आबादी के आधे से थोड़ी ही कम है। यह आबादी अगर अलग कर दी जाए तो एक खूब संपन्न और विकसित देश दिखेगा। लेकिन बाकी 90 फीसदी लोगों का क्या? क्या 10 फीसदी लोग महंगे फोन और महंगी गाड़ियां खरीदने के लिए लाइन लगा रहे हैं इसलिए मान लिया जाए कि 90 फीसदी लोगों की समस्याओं का कोई मतलब नहीं है! क्या यही दो भारत की वास्तविकता नहीं है?

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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