नरेंद्र मोदी को समय विशेष ने भारत का प्रधानमंत्री बनाया था। अब समय ही जुलाई 2026 में बता रहा है कि उनकी एक्सपायरी के साथ संघ परिवार और हिंदू राजनीति का भी तिया-पांचा नत्थी है! कैसे? बुनियादी बात यह है कि मोदी राज ने हिंदुओं के चाल, चेहरे और चरित्र का वह खुलासा देश (अर्थात भारत की मिलेनियल, जेन-ज़ेड और अल्फा पीढ़ी) तथा दुनिया (अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन से लेकर आसियान और पड़ोसी देशों तक) के सामने ला दिया है। इसका लब्बोलुआब है कि उसकी ‘चाल’ देश को पराश्रित और बिकाऊ बाजार बनाने की है, उसका ‘चेहरा’ मनुष्य को कॉकरोच मानने वाला है और उसका ‘चरित्र’ नैतिकताविहीन भय, भूख और भक्ति पर टिका है। तभी हिंदुओं की मौजूदा युवा पीढ़ी और अगली पीढ़ी के बीच कथित चाल, चेहरा और चरित्र मजाक, मखौल और घृणा का विषय है।
जरा मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर से जुलाई 2026 तक की घटनाओं पर गौर करें। क्या एक भी ऐसी घटना हुई, जिससे प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार की जैविक वाहवाही हुई? सरकार ने शक्ति और जीत का जैसा जो नैरेटिव बनाया, उस पर देश-दुनिया की प्रतिक्रिया क्या थी? मोदी-शाह भले इस गलतफहमी में रहे हों कि भक्त झूम रहे हैं। 2024 के आम चुनाव में अप्रत्याशित झटके के बाद उन्होंने हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल, असम जीत लिए। भक्तों ने नगाड़ा भी बजाया। पर जितना बजाया, उससे अधिक साख बिगड़ी। हिंदू राजनीति का चाल, चेहरा और चरित्र लुढ़का। सोचें, ऑपरेशन सिंदूर के बाद विश्व राजनीति में भारत का जलवा बना या पाकिस्तान का? वैसे ही भारत में मोदी, भाजपा और संघ की हर जीत, चुनाव आयोग, संसदीय कार्यवाही, सुप्रीम कोर्ट आदि हर संस्था की साख का भट्ठा बैठाने वाली थी। क्या है चुनाव आयोग की अब साख? भारत के चीफ जस्टिस ने 15 मई 2026 को एक ही तो शब्द बोला था। पर भारत में कॉकरोचों का ज्वालामुखी फूट पड़ा।
यह ज्वालामुखी न शांत होना है और न खत्म। पहली बात, 35 वर्ष से नीचे की उम्र के नौजवानों की संख्या कुल आबादी में आज कोई 65 प्रतिशत है। इसमें भी 15 से 29 वर्ष की पीढ़ी (जनरेशन-ज़ेड) कोई 37 करोड़ है। इसी में फिर आगे जुड़ने वाले 15 साल से कम उम्र के बच्चों की करोड़ों की वह संख्या है जो 2029 और 2034 के आम चुनावों में वोट देगी। ये स्कूली बच्चे भी कॉकरोच आंदोलन की हवा के मीम्स की अफीम का मजा लेते हुए है। क्या इन्हें नरेंद्र मोदी अपनी रील्स बनाकर नौकरियों की हवा बनाएगे? अच्छे दिन, पैसा बांटने, नौकरियों के प्रमाणपत्रों की झांकियों, राष्ट्रवाद और भक्तिवाद से नई और भावी पीढ़ी में जितने भ्रम बनाए थे, उनकी पूर्ति मोदी रील्स से कतई पूरी नहीं होगी?
सो, मोदी-शाह और संघ ने जो कांटे बोए, जितनी तरह के झूठ बोले, उन्हीं से घर-घर ठगी का रोना है। मोदी का चेहरा अकेला सरकार, संघ परिवार की पूंजी था। मोदी ने स्वयं “घर-घर मोदी, हर-हर मोदी” बनाया था। वही चेहरा चेहरा अब नौजवानों का मीम है, गुस्से और गालियों का केंद्र है। मजाक, मखौल और गालियों की खान बना हैं। दूसरा कोई भी चेहरा भाजपा और संघ और स्वंय मोदी के पास नहीं है, जिसे आगे कर जिसकी सच्चाई, जिसके प्रति विश्वास से युवाओं के गले बात उतारी जा सके। न ही सरकार की किसी संस्था की धमक है और न मान। कॉकरोच भीड़ की निगाह में मोदी सरकार की हर संस्था, लोकतंत्र का खंभा अब भरोसा लायक नहीं है।
सोचें, कॉकरोच, सोनम वांगचुक और अभिजीत दीपके पर। कल तक अनाम और जीरो। अचानक नौजवानों के दिल-दिमाग पर छाए, इनके बहाने ज्वालामुखी फूटा। पर बेचारे वांगचुक ने भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के हाथ से जूस पीया नहीं कि नौजवानों ने उनसे नाता तोड़ डाला। भाजपाई चेहरे जैसे अछूत हों! फिर संसद बैठी, तो लोकसभा में राहुल गांधी के भाषण के दौरान स्पीकर पद पर बैठे ओम बिरला का चेहरा देखा तो कॉकरोच के साथ घर-घर सोचा यह कैसा स्पीकर है।
सो, मां भारती के नाम पर संघ परिवार और भाजपाई हिंदू संस्कृति का हवाला देते हुए बुजुर्गों के सम्मान, प्रधानमंत्री की गरिमा के नाम पर नरेंद्र मोदी के मखौल को कितना ही असंस्कारी घोषित करें, लेकिन यह नया असंस्कारी भारत मोदी, संघ परिवार की ही बदौलत है। मां भारती के नाम पर झूठ बोलकर धोखा देने, राजनीति को अनैतिकताओं का कोठा बनाने, नेताओं को खरीदने-बेचने, डराने-धमकाने, किसी को पप्पू बताने, किसी को देशद्रोही, खालिस्तानी या टुकड़े-टुकड़े गैंग घोषित कर देने की नंगई ने ही युवाओं, बच्चों को “जैसे को तैसी” भाषा दी है। कल तक सोशल मीडिया, टीवी चैनल मोदी की ताकत है। वही सोशल मीडिया अब उनका पानीपत मैदान है। हिंदुओं की त्रासदी और मोदी व हिंदू राजनीति की एक्सपायरी है।
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