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नई पीढ़ी का अंदाज भी नया है

नीट यूजी पेपर लीक के खिलाफ जंतर मंतर का आंदोलन सचमुच नई पीढ़ी का आंदोलन थे। सिर्फ इस लिहाज से नहीं कि नई पीढ़ी के लोग इसमें शामिल हुए। वह एक पहलू है कि वयस्क होने से पहले की उम्र वाले किशोर और युवा इस आंदोलन का हिस्सा बने। इस लिहाज से भी यह नई पीढ़ी का आंदोलन था कि इसमें नए साधनों और नए माध्यमों का खुल कर इस्तेमाल हुआ। छात्र और युवा सोशल मीडिया के जरिए अपना नैरेटिव बना रहे हैं। उनकी रचनात्मकता देखना वाली है। वे पारंपरिक मीडिया या पुराने व स्थापित सोशल मीडिया हैंडल्स के भरोसे नहीं हैं। वे अपना कंटेंट तैयार कर रहे हैं और उसे प्रचारित कर रहे हैं।

तभी उनके ऊपर इस बात का असर नहीं पड़ा कि मीडिया या सोशल मीडिया इसको कैसे दिखाता है और सरकार किस तरह से इसकी साख बिगाड़ने का प्रयास करती है। वह प्रयास होता रहा लेकिन उस पर भारी युवाओं का अपना कंटेंट था। उन्होंने बहुत प्रभावी तरीके से सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया।

इसी तरह ऐप बेस्ड सेवाओं का इस्तेमाल जैसा इस आंदोलन में हुआ वैसा पहले कभी नहीं हुआ। वैसे भी नए समय का पहला बड़ा आंदोलन है। तभी कई दिन तक नई दिल्ली के आसपास के सारे मेट्रो स्टेशन बंद रहने पर भी छात्रों को परेशानी नहीं हुई। उन्होंने सबके रास्ते निकाले। ऐप बेस्ड कैब सेवाएं हों या ऐप बेस्ड फूड डिलीवरी की सेवा हो, जंतर मंतर पर सबका इस्तेमाल हुआ।

इसी तरह आंदोलनकारी अपने नारों और कंटेंट में भी बहुत अलग हैं। वे पुराने नारों से अपनी लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं। बहुत लोगों को बुरा लगा है और वे पुराने जमाने के नारे लिख कर बता रहे हैं कि पहले कितना सारगर्भित और साफ सुथरा नारा हुआ करता था। यह भी कहा जा रहा है कि युवाओं के नारे अश्लील हैं और इससे उनका आंदोलन प्रभावित हो रहा है। लेकिन इस तरह की बातों से युवाओं पर कोई असर नहीं पड़ा है। वे बिना किसी शर्मिंदगी या बिना किसी माफीनामे के अपनी बात कह रहे हैं। पहली बार सरकार और भाजपा के पूरे इकोसिस्टम को लगा कि छात्रों व युवाओं के जिस समूह के साथ प्रधानमंत्री परीक्षा पर चर्चा करते थे या जिनके लिए एग्जाम वारियर्स नाम से किताब लिखी है वे नाराज होते हैं तो क्या कर सकते हैं? अब तक सरकार ने उनका सद्भाव देखा था लेकिन अब उन्होंने नाराजगी दिखाई है। सद्भाव और समर्थन दिखाने का उनका तरीका भी वैसा था, जैसे विरोध दिखाने का है। पहले वे इस तरह की बातों का इस्तेमाल विपक्षी पार्टियों के लिए करते थे, तब सरकार और भाजपा के इकोसिस्टम को यह सब अच्छा लगता था। लेकिन अब उन्हीं की दवाई से उनका इलाज हो रहा है तो बुरा लग रहा है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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