नीट यूजी पेपर लीक के खिलाफ जंतर मंतर पर हुए आंदोलन में सरकार और भाजपा को हर मोर्चे पर मात मिली। पिछले 12 साल में तैयार किया गया उसका कोई भी टूल इस बार काम नहीं आया। तमाम कोशिश के बावजूद सरकार, भाजपा और समर्पित मीडिया मिल कर इस आंदोलन को देशद्रोहियों का या भारत विरोधियों का या अमेरिका, चीन, पाकिस्तान प्रायोजित नहीं बता पाए। क्योंकि छात्रों और युवाओं के आक्रोश की वजहें इतनी ठोस थीं कि वे इस आंदोलन को सरकार विरोधी आंदोलन भी नहीं बता सके। इससे पहले हर आंदोलन में सरकार का अपना एक पक्ष होता था। जैसे किसान आंदोलन के समय भी सरकार का पक्ष था कि जो तीन केंद्रीय कानून बनाए गए हैं वो किसानों के भले के लिए हैं, उनके हित में हैं और देश के हित में भी हैं। लेकिन यह बात वे पेपर लीक के बारे में तो नहीं कह सकते थे कि पेपर लीक छात्रों और देश के हित में है। किसान आंदोलन के समय कहा जा रहा था कि सरकार किसानों के हित में कानून ले आई है लेकिन आढ़तिए या दूसरे हित समूह मिल कर किसानों को गुमराह कर रहे हैं। लेकिन ऐसी कोई बात छात्रों और युवाओं के आंदोलन में नहीं कही जा सकती थी। इसलिए पहले दिन से सरकार बैकफुट पर थी।
भाजपा, केंद्र सरकार के इकोसिस्टम और मीडिया ने किसानों के आंदोलन को खालिस्तान से जोड़ दिया था, आंदोलनकारियों को खालिस्तानी और आतंकवादी कहा जा रहा था, उनके आंदोलन में विदेशी हाथ बताया जा रहा था, अंतरराष्ट्रीय सिंगर रिहाना से लेकर युवा आंदोलनकारी ग्रेटा थनबर्ग और दिशा रवि को भारत विरोधी टूलकिट का हिस्सा बताया जा रहा था। उससे पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के खिलाफ हुए प्रदर्शनों और विरोध को सरकार ने घुसपैठियों को बचाने की कवायद बता दिया था। सरकार ने अपने इकोसिस्टम के जरिए यह बात स्थापित कर दी थी कि बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची में हैं और मुस्लिम तुष्टिकरण व वोट बैंक की राजनीति के चक्कर में कांग्रेस व दूसरी विपक्षी पार्टियां एसआईआर का विरोध कर रही हैं।
इसी तरह नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के खिलाफ शाहीन बाग से लेकर देश के दूसरे हिस्से में हुए आंदोलन को भी मुस्लिम तुष्टिकरण और पाकिस्तान, बांग्लादेश प्रायोजित आंदोलन बताया गया। रोहित वेमुला से लेकर जेएनयू तक में हुए प्रदर्शन से लेकर सीएए और कृषि कानूनों के खिलाफ हुए आंदोलन को सरकार ने बड़ी आसानी से टुकड़े टुकड़े गैंग का आंदोलन साबित कर दिया था। सरकार और भाजपा ने इन मामलों में जनमानस आंदोलनकारियों के खिलाफ बनाने में कामयाबी हासिल कर ली थी।
लेकिन पेपर लीक मामले में सरकार ऐसा नहीं कर पाई। इसका एक कारण तो यह था कि आंदोलनकारियों की एक ही अस्मिता थी वह थी ‘जेन जी’ की। हर जाति, धर्म, वर्ग और राज्य के युवा इसमें शामिल हुए। दूसरा कारण यह था कि प्रदर्शनकारियों के पास पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी का ठोस कारण था। तीसरा कारण यह था कि शुरुआत में तमाम राजनीतिक दल और पेशेवर प्रदर्शनकारी इससे दूर थे। चौथा कारण यह था कि आंदोलन योजनाबद्ध या प्रायोजित नहीं था।
इसलिए सरकार की ओर से इसकी साख बिगाड़ने की कोशिश हुई भी तो कामयाबी नहीं मिली। कई नेताओं ने बेशर्मी के साथ इसे विदेशी साजिश बताने का प्रयास किया। कहा गया कि अभिजीत दीपके अमेरिका से आए हैं और वे सीआईए के एजेंटे हैं। यह भी कहा गया कि बड़ी साजिश के तहत 20 जुलाई की घटना हुई और उसका मकसद संसद पर हमला करना था ताकि नेपाल और बांग्लादेश जैसी स्थिति बनाई जा सके।
लेकिन ऐसा कोई भी प्रयास कामयाब नहीं हुआ। छात्रों ने कोई उकसावे वाली कार्रवाई नहीं की। छिटपुट पत्थरबाजी और सुरक्षाकर्मियों से धक्कामुक्की के अलावा कोई ऐसी घटना नहीं हुई, जिसे किसी बड़ी साजिश के साथ जोड़ा जा सके। जब सारे दांव फेल हुए तब आनन फानन में प्रधानमंत्री का वीडियो संदेश जारी हुआ, नया बिल लाने की घोषणा हुई, सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल समाप्त कराई गई, शिक्षा विभाग के अधिकारी बदले गए और कॉकरोच जनता पार्टी के साथ बातचीत शुरू हुई। बिना किसी राजनीतिक प्रशिक्षण के छात्र व युवा आंदोलन के लिए उतरे थे और उन्होंने मोदी सरकार को मजबूर किया कि वह उनकी शर्तें मान कर बातचीत करे।
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