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करने को अब है क्या?

नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार में बहुत समानताएं हैं? सत्ता की केंद्र या राज्य की कुर्सी पर बैठने के अनुभव की कसौटी पर सोचें तो नीतीश कुमार 1990 से भारत के मंत्रालयों, मुख्यमंत्री के पदों के 35 वर्षों का सत्ताभोगी रिकार्ड बनाए हुए हैं। नरेंद्र मोदी उनसे पीछे हैं। वे मात्र 25 वर्षों से देश और गुजरात के सत्ताभोगी हैं। पर कैसा कमाल कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद के अपने जश्न को नीतीश कुमार के सर्टिफिकेट से मनाया। इंडियन एक्सप्रेस में नीतीश कुमार के नाम से उनकी वाहवाही का लेख छपा। लेख में नरेंद्र मोदी के शासन और उनकी राजनीति की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई। जबकि दुनिया जानती है कि नीतीश कुमार का बुढ़ापा डिमेंशिया लिए है। उन्हें लोगों की शक्ल और उनके नामों तक का भान नहीं रहता। न यह सुध कि बिहार के मुख्यमंत्री का पद बड़ा है या राज्यसभा का सांसद होना?

सोचें, ऐसी दशा के नीतीश कुमार के ऐसे उपयोग पर? पर नीतीश कुमार आज के ‘न्यू इंडिया’ के वे चेहरे हैं जो उस बिहार के प्रतिनिधि हैं जिसे हिंदीभाषी उत्तर भारत में राजनीति, क्रांति, परिवर्तनों का उर्वर इलाका माना जाता है। बुद्धं शरणं गच्छामि से लेकर चंपारण, जेपी की संपूर्ण क्रांति, लालू की सामाजिक क्रांति का वह गंगा दोआब, जिसमें सबने सब कुछ किया लेकिन हुआ कुछ भी नहीं।

मैंने अपनी पत्रकारिता तब शुरू की थी जब इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ नारे के संकल्प का अनुशासन पर्व था। नोट करें कि स्वतंत्र भारत के इतिहास के दो-तीन ही शाश्वत संकल्प हैं। रोटी-कपड़ा-मकान, सड़क-बिजली-पानी और गरीबी हटाओ! ये तीनों नारे उत्तर भारत (गंगोत्री से गंगासागर का इलाका) की जहां सच्चाई हैं, वहीं राजनीति का आधार भी।

और आज इन प्रदेशों की किसी भी राजधानी में चले जाएं। वहां के जानकार स्थानीय पत्रकार, नेता, अफसरों से बात करें और पूछें कि सरकार क्या कर रही है तो सब तरफ एक सा जवाब मिलेगा, सरकार के पास है क्या करने को? कभी भारत में मुख्यमंत्री भी काम करते थे और प्रधानमंत्री भी। मोहनलाल सुखाड़िया और भैरो सिंह शेखावत के समय की याद में मैंने इनके द्वारा माही बांध, मेजा बांध, अंत्योदय योजना का असल काम होते देखा-सुना, तो वहीं शांता कुमार की हिमाचल के पहाड़ों में घर-घर पानी पहुंचाने की ख्याति भी सुनी। आज पूछें कि मुख्यमंत्री क्या कर रहे हैं? तो सब तरफ एक सा यह उत्तर होगा, भाग्य से बने हैं, भाग्य का मौका चूक नहीं रहे हैं, धंधा कर रहे हैं जबकि प्रदेश कर्ज में डूबा हुआ है। काम विशेष का तनिक भी संकल्प नहीं है। लाभार्थियों को तीन सौ, पांच सौ, हजार रुपए पहुंचाना और कर्मचारियों की समय पर तनख्वाह देना ले दे कर प्राथमिक काम है।

सब कर्ज में हैं, आश्रित हैं और सभी मंदिरों, गलियारों, पुलों, एक्सप्रेसवे या हरी झंडी बताने, उद्घाटन, भाषण, हेलीकॉप्टर से दिन-रात वैसे ही भागते हुए हैं, जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भागते हैं। सो, नरेंद्र मोदी का भारत केवल और केवल मन की बात कहने, भाषण देने, अपने आपको दिखाने की उस शासन पद्धति में कन्वर्ट है जिसमें करना नहीं है, केवल दिखाना है। मूर्ति बनकर दर्शन देना है। आज के ‘न्यू इंडिया’ में जनता जहा दर्शनार्थी है वही सत्तावान मंदिर की मूर्ति। सो, करने को है क्या? दर्शन करो, आरती उतारो, प्रसाद पाओ और अपने आपको विश्वगुरु मानो! फिर भले फुटबॉल को किक लगाने का माद्दा भी न हो!

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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