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मोदी राज से ही तो कॉकरोच!

भारत बारह साल पहले मनुष्य की इंसानी गरिमा बनाने वाली सरकारों में सांस लेता था! 2014 से सब बदलना शुरू हुआ। प्रधानमंत्री मोदी का 125-130 करोड़ लोगों को मुफ्तखोर, लाभार्थी, भुखमरा, परजीवी और आश्रित आबादी बनाने का महाअभियान शुरू हुआ। एक रात उनका ऐलान था, लोग अपनी कमाई अपने घर, अपनी जेब में नहीं रखेंगे। और नोटबंदी। लोग बैंकों के आगे कतार में खड़े हुए। तब से अनपढ़, गरीब लोग भी जनधन के बैंक खातों, डिजिटल लेनदेन, पेटीएम आदि के भोक्ता कॉकरोच हैं, जिनका नाम लाभार्थी भी है। सोचें और अनुमान लगाएं, आज 145 करोड़ लोगों में कितने लाभार्थी, परजीविता की जिंदगी जीते हुए हैं। सरकार लोगों के खातों में पांच सौ, हजार, दो हजार रुपए का धर्मादा दे रही है। सो, एक तरफ गौशालाएं आबाद हुईं, वहीं कम से कम 110 करोड़ लोगों की भीड़ की परजीवी जिंदगी जीती नई किस्म का जन्मांतरण हुआ। और अब दुनिया में भारत का कॉकरोच फिनॉमिना हल्ला! ताजा ही खबरें हैं कि वैश्विक पर्यटन में थाईलैंड, वियतनाम जैसे देशों में भी यह लगा हुआ है कि नो स्मोकिंग, नो इंडियन। अचानक किसी एयरपोर्ट, किसी जगह ऐसा भंगड़ा, ऐसी उछलकूद के वीडियो बनते हैं जैसे अमीरी से फूले कॉकरोच ही भारत की पहचान हों। मानो यह होड़ कि वे नई प्रजाति के जीव हैं! देखो, देखो हमारा नाच-गाना!

दुनिया नाक-भौं सिकोड़ने लगी है। जैसे फर्जी और जाली डिग्रियों के सहारे युवा परजीवी कॉकरोच एक्टिविस्ट उधम मचाते हैं, नाक में दम करते हैं, वैसा ही मामला अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का है। दुनिया फर्जी-फालतू डिग्री के विश्वगुरु और विकसित भारत के हल्ले से थक चुकी है। उसने ऐसे भारत की कल्पना नहीं की थी। आखिर 2014 से पहले भारत में लोग काम के थे। आईटी के धंधे से डॉलर कमा रहे थे। दुनिया के देशों में काम कर भारत के मजदूर डॉलर भेज रहे थे। भारत से अमेरिका जैसे कुछ देशों को मुनाफे वाला निर्यात भी था। तब कोई पाकिस्तान का नामलेवा नहीं था। अब भारत का नामलेवा नहीं है।

कॉकरोच की परजीविता का क्या अर्थ है? लिखा हुआ है कि न काम का, न काज का, दुश्मन अनाज का। अर्थात वह जीव जो कोई उपयोगी काम-धंधा नहीं करता, लेकिन मुफ्त की रोटियां तोड़ता है। यदि यह कसौटी है तो बारह वर्षों में मोदी सरकार ने अपना, देश का, लोगों का ऐसा ही तो रूपांतरण किया है। भारत की आबादी फिलहाल 145 करोड़ अनुमानित है। इस भीड़ में 30 वर्ष से नीचे की उम्र के लोगों की संख्या आधी है। सोचें, कोई 70-72 करोड़ लोग। इस आबादी में से हर साल 50 लाख डिग्रीधारी स्नातक बनते हैं। इनमें कितनों के नसीब में नियमित वेतन की नौकरी है? पर जैसे कॉकरोच मरता नहीं, वैसे परजीवी आबादी भी नहीं मरती। और यही मोदी सरकार और संघ परिवार की पूंजी भी है। क्योंकि इसमें से असंख्य नौजवान सुबह से शाम तक के अंधविश्वासों के टोने-टोटके की जीवनचर्या में ढल गए हैं। जिधर देखो, उधर मंदिरों में भीड़ है।

क्या यह मामूली उपलब्धि है? बारह साल पहले का भारत अलग था। तब भारत का नौजवान मेहनत में विश्वास रखता था। उसका पढ़ाई में, परीक्षाओं में विश्वास था। विदेश में पढ़ाई, नौकरी से लेकर देश में आईटी, इंजीनियर, डॉक्टर, मैनेजमेंट से सरकारी नौकरियों, सेना में नौकरी के जोश में लबालब भरा हुआ था। तभी 21वीं सदी का भारत आरंभ दुनिया की निगाह में उभरती अर्थव्यवस्था, उभरते समाज, सम्मान का था। अमेरिका, चीन, रूस सहित तमाम देश भारत का लिहाज, भारत का सम्मान करते थे।

और आज क्या है? भारत में मनुष्य का पर्याय कॉकरोच है। भारत में कॉकरोच राजनीति है। और विडंबना यह कि मोदी सरकार कॉकरोचों को भी कुचलने के लिए कमर कस रही है! शायद आने वाले दिन इसी के हंगामे के हों!

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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