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ओह भारत! झूठ छुपता नहीं!

इसी जनवरी की बात है! दावोस के विश्व आर्थिक मंच (WEF) में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा, यूरेशिया ग्रुप के अध्यक्ष इयान ब्रेमर (माइक्रोसॉफ्ट के अध्यक्ष ब्रैड स्मिथ और सऊदी अरब के निवेश मंत्री खालिद अल-फालिह भी मौजूद थे।) ने “AI Power Play” की पैनल चर्चा में भारत को “टियर-2 एआई पावर” बताया। मतलब भारत एआई क्रांति के वैश्विक अगुआ देशों का पिछलग्गू, दूसरी कतार का देश है। यह सुनकर पैनल में विश्वगुरू देश की विश्वगुरूता का कंधों पर भार लिए हुए आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव उछल पड़े। विश्वगुरू भारत को “सेकंड-टियर एआई पावर” कहे तो कैसे चुप रह सकते थे। उन्होंने तुरत अमेरिकी विश्वविद्यालय की रिपोर्ट के हवाले कहा, हम दुनिया में तीसरे हैं। फिर जीपीयू की संख्या गिनाई, स्किलिंग कार्यक्रम गिनाए, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर गिनाया। और भारत में बजी तालियां। विश्वगुरू के इकोसिस्टम, सोशल मीडिया में वैसे ही नगाड़े, तालियां बजीं जैसे पिछले 12 वर्षों से बजती आ रही हैं।

मगर एक महीने बाद वैश्विक मीडिया, चीन की मीडिया के आगे क्या साक्ष्य था? दुनिया ने क्या जाना? दिल्ली में आयोजित, दुनिया के आगे साक्षात दिखे एआई शिखर सम्मेलन पर कैसा मजाक, मखौल और टिप्पणियां लिखी गईं?

ध्यान रहे मैने पिछले सप्ताह इसी कॉलम में लिखा था, भारत एआई का भी बाज़ार बना! इसकी शुरूआत थी- इस सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दिल्ली से हल्ला होगा कि भारत उनकी कमान में AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता–नकली बुद्धि) का विश्व गुरु बना। देखो, दुनिया आई है और वह भारत से ज्ञान ले रही है! सवाल है इस नकली बात का असल क्या है?….)

बहरहाल अब भारत के शिखर सम्मेलन पर वैश्विक पत्रिका ‘द इकॉनोमिस्ट’ की ताजा रिपोर्ट है। इसके शीर्षक, शुरूआत के इन शब्दों पर गौर करें- कृत्रिम रूप से फुलाई गई उम्मीदें- भारत की एआई योजनाओं की कमियां- वैश्विक शिखर सम्मेलन की मेज़बानी के बावजूद, उन्नत मॉडल विकसित करने की दौड़ में भारत एक दर्शक भर है!….

इस रिपोर्ट ने भी दावोस के मंच पर हुई चर्चा का हवाला दिया। लिखा- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की प्रमुख ने भारत को एआई क्षेत्र में दूसरे दर्जे की शक्ति जैसा बताया। कुछ सीट दूर बैठे भारत के आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव असहज हो उठे। उन्होंने तुरंत पलटवार करते हुए चिप से लेकर ऐप तक भारतीय क्षमता का हवाला दिया।.. इस सप्ताह दिल्ली में भी इसी तरह की बातें (मतलब हवाबाजी) हुई। दुनिया भर के नेता और एआई उद्योग के दिग्गज एकत्र हुए। ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया और फ्रांस के बाद भारत वार्षिक एआई शिखर सम्मेलन की मेज़बानी करने वाला पहला विकासशील देश बना है। पर सम्मेलन बड़े व्यापार मेले जैसा दिखने लगा। …भारत इस मंच का उपयोग स्वयं को अमेरिका और चीन के साथ उभरती एआई महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत करने के लिए कर रहा है।…कई मायनों में यह कल्पना-लोक जैसा है।….

पर हां, रिपोर्ट में भारत के बाजार बने होने के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। जैसे देश में 90 करोड़ भारतीय इंटरनेट उपयोगकर्ता है। ये लोग औसतन प्रतिदिन सात घंटे ऑनलाइन रहते हैं। सोचें, एक भारतीय सात घंटे फोन-ऑनलाइन-अमेरिकी उत्पादन गूगल, सोशल मीडिया से यदि चिपका रहता है टाइमपास करता है तो भारत की भीड़ की असल उत्पादकता क्या है? भारत की भीड़ विदेशी ऐप, दिमाग, माल, विदेशी नेटवर्किंग और झूठ, कृत्रिमता में ही अपने को खपाता रहता है।

तभी वैश्विक एआई कंपनियों के लिए भारत वह विशाल बाज़ार है, जहां से वे हर तरह का डेटा, हर तरह की कमाई में जुटी हैं। मतलब पूरी नस्ल, पूरी आबादी नई गुलामी में बंध रही है। इसलिए दिल्ली का एआई समिट दुनिया को बतला गया कि  बाजार और भीड़ बिकने के लिए बेकरार है, जुगाड़ू है। 140 करोड़ लोगों का देश एआई से एक नकली कुत्ता भी नहीं बना सकता तो भी उसे असलियत का भान नहीं। सो बस बेचो।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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