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गपशप

चुनाव मतलब लोगों को मूर्ख बनाना!

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भारत में अब सारे चुनाव आम लोगों को मूर्ख बनाने, उनको बरगलाने, निजी लाभ का लालच देने, उनकी आंखों पर पट्टी बांधने या उनकी आंखों में धूल झोंकने का उपक्रम और मौका है। पार्टियों के घोषणापत्र में भले कुछ भारी-भरकम बातें लिखी जाती हों लेकिन प्रचार में सिर्फ लोक लुभावन घोषणाएं होती हैं, जिन्हें गारंटी का नाम दिया जा रहा है। कहीं मोदी की गारंटी है तो कहीं कांग्रेस और राहुल की गारंटी है। उस गारंटी में यह है कि सरकार बनी तो हर वयस्क महिला को एक हजार से लेकर ढाई हजार रुपए तक महीना दिया जाएगा, स्कूल जाने वाले बच्चों को पांच सौ से लेकर तीन हजार रुपए तक दिए जाएंगे, महिलाओं को मुफ्त में बस यात्रा की सुविधा दी जाएगी, हर व्यक्ति को मुफ्त में पांच किलो अनाज मिलेगा, कहीं मुफ्त में घर देने की गारंटी है तो कहीं मुफ्त में शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा देने की गारंटी है, कहीं स्कूटी, लैपटॉप और स्मार्ट फोन मुफ्त देने की बात है तो कहीं रसोई गैस सिलेंडर सस्ता करने का वादा है तो कहीं बिजली, पानी मुफ्त में देने की बात है। कहीं जाति गणना करा कर आरक्षण की सीमा बढ़ाने का वादा है तो कहीं अयोध्या में राममंदिर का मुफ्त दर्शन कराने की गारंटी है। कोई रैयतू बंधु है तो किसानों को सम्मान निधि दे रहा है। कोई पिछड़ा राज लाने की बात कर रहा है तो कोई हिंदू राष्ट्र बनाने का ऐलान कर रहा है।

अब सवाल है कि कोई इस बात की गारंटी क्यों नहीं दे रहा है कि वह लोगों को इतना सक्षम बनाएगा कि वह खुद अयोध्या जाकर राममंदिर के दर्शन करे या पैसे देकर बस में सफर कर सके या अनाज खरीद कर अपना पेट भर सके?

हां, कोई भी पार्टी नागरिकों को सक्षम बनाने, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने, धनवान और बुद्धिमान बनाने की गारंटी नहीं दे रही है। पार्टियां बिना किसी प्लान के ऐलान कर रही हैं कि सरकार बनी तो इतने लाख लोगों को नौकरी देंगे। लेकिन साथ में यह बताना जरूरी नहीं समझती हैं कि वह नौकरी कहां होगी? क्या सरकारी नौकरियों में बढ़ोतरी की जा रही है या उद्योग-धंधे स्थापित किए जाएंगे, जिनमें नौकरियां मिलेंगी? दूरगामी विकास की कोई योजना किसी पार्टी के प्रचार में सुनाई नहीं देती है। देश की ढांचागत गड़बड़ियों को दूर करने के बारे में बात नहीं होती है। किसानों को सम्मान निधि दी जाएगी लेकिन कृषि की लागत कम हो, उनका मुनाफा बढ़े और उन्हें सिंचाई के लिए मॉनसून पर न निर्भर रहना पड़े इसकी घोषणा नहीं होती है। महिलाओं को आरक्षण देने का कानून बना देंगे और उनके लिए मुफ्त बस पास भी बनवा देंगे लेकिन राजनीति में उन्हें बराबर की भूमिका नहीं देंगे। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में औसतन 10 फीसदी महिला उम्मीदवार मैदान में हैं।

दुनिया के किसी लोकतंत्र में ऐसी हिप्पोक्रेसी देखने को नहीं मिलेगी कि नेता कहेंगे कुछ और करेंगे कुछ और। सबका ध्यान सिर्फ इस बात पर होता है कि चुनाव कैसे जीता जाए। सारी बुद्धि इसमें लगानी है कि क्या कहने से या क्या मुफ्त में देने से जनता वोट देगी। चुनाव जीत गए फिर तो जो मन में हो वह करेंगे। जनता भी वोट देने के बाद सब कुछ भूल कर अपने रोजमर्रा के संघर्षों में लग जाती है। जनता को याद भी नहीं रहता है कि किस पार्टी ने क्या वादा किया था। आखिर 2014 का चुनाव नरेंद्र मोदी पेट्रोल, डीजल सस्ता करने, डॉलर सस्ता करने, काला धन वापस लाने, महिलाओं का सम्मान बहाल करने, महंगाई रोकने और भ्रष्टाचार रोकने के नाम पर लड़े थे। लेकिन नौ वर्षों में इसका बिल्कुल उलटा हुआ है। पेट्रोल, डीजल के दाम दोगुने हो गए और डॉलर की कीमत भी डेढ़ गुनी हो गई। न काला धन वापस आया और न महंगाई घटी। लेकिन लोग उसे भूल गए और पांच किलो अनाज के लाभार्थी बन कर वोट देने लगे।

 

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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