nayaindia five state assembly election date 2023 ऐसा चुनावी मैनेजमेंट, इतना अंतर-विरोध!
गपशप

ऐसा चुनावी मैनेजमेंट, इतना अंतर-विरोध!

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क्या संभव है नरेंद्र मोदी का जादू मध्य प्रदेश में चले लेकिन राजस्थान में न चले? मध्य प्रदेश में भाजपा रिकॉर्ड तोड़ 140-162 सीटें पाए वही राजस्थान में वह कांग्रेस से पीछे 80-100 के बीच अटके? और दोनों प्रदेशों में क्या उस इंडिया टुडे-एक्सिस को विश्वसनीय माना जाना चाहिए जिसने पश्चिम बंगाल में भाजपा को जीताते हुए उसकी सीट संख्या 134-160 बताई थी!

सोचें,मौजूदा चुनाव के दोनों हिंदी प्रदेशों पर? चुनाव नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ा गया! बावजूद इसके एक जगह हवा तो दूसरी जगह सूखा? हालांकि मेरा मानना रहा है कि राजस्थान में नरेंद्र मोदी का जादू सर्वीधिक था और है। यदि कोई यह शक करे कि ईवीएम मशीन के खेला को जस्टिफाई करने का मैनेजमेंट है या फिर रियलिटी है तो अपना मानना है दोनों बातें फालतू हैं। मध्य प्रदेश में ईवीएम से आंधी बने और राजस्थान में नहीं, इसकी भला क्या तुक? ऐसे ही मप्र में शिवराज सिंह चलते रहें और राजस्थान में अशोक गहलोत को बनाए रखें, यह भी बेतुकी बात। फिर छतीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस रहे लेकिन बीच के मध्य प्रदेश में मोदी की आंधी? सो कुल मिलाकर एक्जिट पोल का घालमेल सही में अंतर-विरोधों और तुक्कों का पिटारा है।

इस सत्य को कोई नकार नहीं सकता है कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने तीनों विधानसभा चुनावों में प्रतिष्ठा दांव पर लगा कर मेहनत की। शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे और रमन सिंह को दरकिनार रख के भाजपा ने चुनाव लड़ा। मतलब हिमाचल, उत्तराखंड, कर्नाटक में नरेंद्र मोदी ने अपना चेहरा आगे कर जैसे चुनाव लड़ा था, वैसे ही उन्होंने ये चुनाव लड़े। इसलिए या तो कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश जैसे नतीजे होंगे या मध्य प्रदेश और राजस्थान में बिना शिवराज और वसुंधरा के कमल खिलेगा। यदि भाजपा छतीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना सब जगह  हारती है या जैसे तैसे राजस्थान में जीतती है तो कर्नाटक के क्रम में अर्थ होगा कि उत्तर भारत के राज्यों के प्रादेशिक चुनावों में भी मोदी का जादू अब खत्म। वे लोकसभा के चुनाव में भले उत्तर भारत में अपने चेहरे पर थोक वोट पड़वा लें लेकिन प्रदेशों में भाजपा के जिताऊ चेहरे नहीं हैं।

चुनाव से कांग्रेस में जान लौटेगी। यदि लावारिस संगठन के बावजूद कांग्रेस का तेलंगाना में तूफान आता दिख रहा है तो यह बड़ी अनहोनी है। मोदी-शाह ने कर्नाटक में जो मेहनत की वैसी ही तेलंगाना में भी की है। नरेंद्र मोदी तीन दिन लगातार तेलंगाना में रहे। बावजूद इसके सत्तारूढ़ बीआरएस पार्टी की एंटी इनकम्बेंसी का भाजपा लाभ नहीं उठा पाई। सो, क्या मानें कि दक्षिण में नरेंद्र मोदी की मेहनत से चुनावी फायदा होना ही नहीं है?

मैं एक्जिट पोल की घिचपिच को फिजूल मानता हूं। साफ बहुमत वाले नतीजे आएंगे लेकिन हवा और आंधी वाले भी नहीं। इन चुनावों में न सांप्रदायिक धुव्रीकरण से भाजपा का खेला बना है और न शिवराज सिंह चौहान या वसुंधरा राजे याकि पुराने नेता बेमतलब प्रमाणित होने हैं। इनकी जरूरत और प्रासंगिकता पर कम ही सही लेकिन ठप्पा लगेगा।

उस नाते विधानसभा चुनाव 2023 अखिल भारतीय राजनीति का टर्निंग प्वाइंट है। पूर्वोत्तर के मिजोरम, उत्तर-पश्चिम के राजस्थान, मध्य के छतीसगढ़ व मध्य प्रदेश तथा दक्षिण के तेलंगाना के नतीजों का पूरे भारत पर असर होना है। राजस्थान को फील करते हुए मेरा मानना है कि मोदी-शाह ने ओबीसी और पिछड़ों का हल्ला बना कर अपने लिए कांटे बोए हैं। इसे कांग्रेस को भी समझना चाहिए। ओबीसी और पिछड़ों में अब परस्पर गलाघोंट कॉम्पीटिशन निर्णायक है बनिस्पत फॉरवर्ड बनाम बैकवर्ड के। मतलब मीणा को टिकट दिया तो गुर्जर बिदकेगा। गुर्जर को दिया तो जाट और मीणा बिदकेंगे। राजपूत को टिकट दिया तो उसके खिलाफ जाट गोलबंद होंगे। दलित को ओबीसी जातियां बरदाश्त नहीं तो आरक्षित एससी-एसटी सीट में अलग बसपा और चंद्रशेखर आजाद की पार्टी परस्पर लड़ते हुए! भाजपा के कथित दिग्गज, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को अपनी विधानसभा सीट में दलित और ब्राह्मण वोटों को जैसे हैंडल करना पड़ा वह प्रमाण है कि हिंदू वोट और हिंदू सर्व समाज के छाते के नीचे जमीनी राजनीति बुरी तरह तार-तार हो गई है। समाज लगातार बिखरता और एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या व खुन्नस में ढल रहा है!

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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