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अपनी गलतियों को साजिश बना दिया

दुनिया भर के देशों के बीच शह मात का खेल चलता है। अपने फायदे के लिए सब किसी न किसी किस्म की साजिश में शामिल होते हैं। लेकिन साथ ही वे वैश्विक अलायंस भी बनाते हैं और अपने को आर्थिक व सामरिक तौर पर तैयार भी करते हैं। भारत की नरेंद्र मोदी सरकार के साथ समस्या यह है कि उसे वैश्विक साजिशों की या तो परवाह नहीं है या उसने मान लिया है कि उनका मुकाबला नहीं किया जा सकता है। इसलिए उसने अपने राजनीतिक फायदे के लिए वैश्विक साजिशों का बहुत सरलीकरण कर दिया है। उसके लिए भारत के खिलाफ साजिश का मतलब होता है विपक्ष का विरोध, प्रदर्शन या विपक्ष का सरकार से सवाल पूछना। चाहे किसानों का आंदोलन हो या पहलवानों का आंदोलन हो या नौजवानों का आंदोलन हो, सरकार का इकोसिस्टम उसे वैश्विक साजिश बताता है।

हकीकत यह है कि इस तरह के तमाम आंदोलन या सरकार विरोधी प्रदर्शन या तो सरकार के नीतिगत फैसलों की वजह से हुए हैं या सरकार की विफलताओं की वजह से हुए हैं। कॉकरोच जनता पार्टी का जून और जुलाई में जंतर मंतर पर प्रदर्शन नीट यूजी के पेपर लीक की वजह से हुआ था। क्या नीट का पेपर किसी विदेशी साजिश के तहत लीक हुआ था या सरकार के अपने निकम्मेपन की वजह से हुआ था? 2024 और 2026 यानी तीन साल में दो बार नीट के पेपर लीक हुए और परीक्षा में गड़बड़ी हुई। जब इसके विरोध में युवा और छात्र सड़कों पर उतरे तो कहा गया कि विदेशी साजिश है। ऐसे ही तीन कृषि कानून नरेंद्र मोदी की सरकार ने बनाए थे। बहुमत नहीं होने पर राज्यसभा से विपक्ष को मार्शल के जरिए बाहर निकाल कर यह बिल पास कराया गया था। लेकिन जब किसान इसके विरोध में उतरे तो उनको खालिस्तानी, आतंकवादी बताया गया और आंदोलन को विदेशी साजिश करार दिया गया।

सोचें, भारत में विपक्ष को दबाने या खत्म करने का प्रयास किसने शुरू किया? कांग्रेस मुक्त भारत का नारा मोदी ने दिया। मोदी सरकार ने कांग्रेस और दूसरे विपक्षी नेताओं के पीछे केंद्रीय जांच एजेंसियों को लगाया। भाजपा ने सीबीआई, ईडी की कार्रवाई के बाद कथित भ्रष्ट नेताओं को अपनी पार्टी में लिया। इन सबका मकसद विपक्ष को कमजोर करना था। लेकिन जब दुनिया वी डेम जैसी संस्थाएं डेमोक्रेसी की रेटिंग में भारत को बहुत नीचे दिखाती हैं तो कहा जाता है कि विदेशी साजिश हो रही है।

ऐसे ही मोदी सरकार ने मीडिया को व्यवस्थित तरीके से पालतू बनाना शुरू किया। साम, दाम, दंड और भेद का इस्तेमाल करके प्रेस को दबाया गया या अपना बनाया गया। प्रतिबद्ध प्रेस बनाया। सरकार समर्थक कॉरपोरेट ने मीडिया समूहों का अधिग्रहण किया और बहुत प्रत्यक्ष रूप से सरकार की मदद उनको मिली। इससे जनता का भरोसा मीडिया पर से उठ गया। लेकिन जब दुनिया की संस्थाएं प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत को बहुत नीचे स्थान देती हैं तो कहा जाता है कि विदेशी साजिश हो रही है।

संस्थागत तौर पर देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूह को अलग थलग किया गया। करीब 15 फीसदी आबादी वाले मुसलमानों का भाजपा में एक भी सांसद नहीं है और न एक भी मंत्री है। भाजपा के नेता, सांसद और यहां तक कि मंत्री खुलेआम धर्म के आधार पर भड़काऊ भाषण देते हैं और अल्पसंख्यकों को देश छोड़ने की बात करते हैं। सार्वजनिक कार्यक्रमों में देश का गद्दार बता कर गोली मारने की बात होती है। लेकिन जब अमेरिकी संसद की एजेंसी से लेकर दूसरी संस्थाएं भारत को धार्मिक स्वतंत्रता के इंडेक्स में बहुत नीचे रखती हैं तो कहा जाता है कि भारत के खिलाफ साजिश हो रही है।

भारत प्रति व्यक्ति आय के मामले में बांग्लादेश से पीछे है। प्रति व्यक्ति डॉक्टर, नर्स व बेड की उपलब्धता, शिशु मृत्यु दर, कुपोषण, शिक्षा आदि के मामले में भी दुनिया के छोटे छोटे देशों से पीछे है। प्रदूषण के मामले में दुनिया के सबसे ज्यादा औद्योगिक हो चुके देशों से भी बहुत आगे है। 25 करोड़ लोगों को गरीबी से निकालने का दावा किया जाता है और 80 करोड़ लोगों को पांच किलो अनाज देने के लिए अपनी पीठ थपथपाई जाती है। और इन सबके आधार पर जब दुनिया की संस्थाएं मानव विकास के सूचकांक बनाती हैं और भारत को सबसे नीचे रखती हैं तो कहा जाता है कि विदेशी एजेंसियां साजिश के तहत ऐसा कर रही हैं।

सो, चाहे राजनीतिक दलों के नेताओं को परेशान करने का मामला हो, मीडिया को पालतू बनाने का मामला हो, धार्मिक स्वतंत्रता को बाधित करने का मामला हो या आर्थिक व सामाजिक विकास का मामला हो, इन सबकी जमीनी हकीकत या वैश्विक रिपोर्ट के आधार पर जब विपक्ष सवाल उठाता है उसका एक ही जवाब सरकार के पास होता है कि सब विदेशी साजिश है। सरकार ऐसा दिखाती है, जैसे यह भारत की वास्तविकता न हो।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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