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देश की बिक्री का एआई मेला!

कैसे दिल्ली एआई शिखर समिट भारत बिक्री का मेला था? पहली बात दुनिया ने जाना कि 140 करोड़ लोगों का देश मात्र एक बाजार है। उसकी बड़ी-बड़ी बातें, बड़े-बड़े मंहगे विश्वविद्यालय नकल की भी अक्ल लिए हुए नही हैं। डिग्रीधारी, रट्टामार इंजीनियरों, कर्मयोगियों की भीड़ है मगर कुशल एआई शोधकर्ताओं की संख्या तीन सौ से भी कम है। दुनिया की कथित तीसरी बड़ी आर्थिकी इतनी पोली और कड़की है जो वह अनुसंधान-विकास पर जीडीपी का सिर्फ 0.7 फीसदी खर्च करती है। पूरी भीड, पूरा बाजार और कंपनियां सभी विदेशी उत्पाद, मॉडल तथा ऐप के बूते जिंदा है। दुनिया में बाकी जगह कंपनियां कम से कम एआई उपयोग की कोशिश करती हैं वही भारत की 92 प्रतिशत कंपनियां विदेशी एआई म़ॉडल अपना चुकी हैं। टी20 क्रिकेट विश्व कप में भारत-पाकिस्तान मुकाबला हुआ तो उसके 45 करोड़ दर्शकों के बीच बेचने का सर्वाधिक विज्ञापन स्लॉट चैटजीपीटी का था। मतलब चैटजीपीटी भारत से सर्वाधिक कमाई का रोडमैप बनाए हुए है।

तभी दुनिया की हर बड़ी कंपनी का टेक दिग्गज दिल्ली के मेले में दौड़ा आया। सब एकत्र हुए। और भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक कंपनियों के इन प्रमुखों के हाथ अपने साथ ऊपर उठवा कर मैसेज दिया देखो मेरे साथ भारत के खरीदारों का यह जमावड़ा। वैश्विक खरबपतियों ने मेरे से कितनी उम्मीदे पाली हुई है?

मुझे मेरा ही देखा वह समय याद हो आया जब पिछली आईटी क्रांति में माइक्रोसॉफ्ट कंपनी अपने प्रोडक्ट की सरकारी बिक्री बढ़वाने के लिए डेमो, कार्यशालाएं आयोजत करती थी। तब भारत में बेचने का वह मार्केटिंग तंत्र था, जिससे प्रोडक्ट प्रस्तुति, डिप्लोमा कोर्स, सरकारी अनुबंध-बिक्री का लंबा-चौड़ा मार्केटिंग अभियान चला था। वैसा ही अब वैश्विक अमेरिकी कंपनियां अपना जाल, अपना नेटवर्क, अपनी चेन में 140 करोड़ की भीड को बंधक बनाने का ब्लूप्रिंट लिए हुए हैं। मैं सन् 1996 से लिखता आ रहा हूं कि भारत आईटी कुली पैदा करने के अलावा अपना कुछ भी नहीं बना रहा। सोचें, भारत सरकार, प्रदेश सरकारों, जनता सब कैसे माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस प्रोडक्ट, गूगल ईमेल, सर्च इंजिन, व्हाट्सऐप पर स्थायी आश्रित हो चुके है। आगे अमेरिकी एआई पर होंगे।

नया फेज एआई क्रांति है। दिमाग भन्ना गया यह सुन कर कि गूगल के सुंदर पिचई ने भारत के प्रधानमंत्री मोदी को पट्टी पढ़ाई और विश्वगुरू मोदी ने उन्हें एक ‘कर्मयोगी’ का जुमला दिया तो गूगल ने मौका लपका। भारत उद्धार की झांकी बनाते हुए दो करोड़ सरकारी कर्माचारियों को एआई के कृत्रिम दिमाग को अपनाने की ट्रेनिंग देने का ऐलान किया। सोचें, पहली बात, भारत का सरकारी कर्मचारी यदि ‘कर्मयोगी’ होता तो भारत का नागरिक लूटता और भारत मात्र बाजार बना होता?

दूसरी बात, ये कर्मचारी पहले से ही सोशल मीडिया (वह भी तो प्रतिदिन सात घंटे ऑनलाइन का प्रतिनिधि है) से टाइमपास करते है तो दफ्तरों में मान्य चैटजीपीटी या गूगल चैट की सरकारी वैधता के बाद कर्मचारी क्या करेंगे? पूरी सरकार (मोदी के पीएमओ से लेकर पटवारी तक) इस फॉर्मूले में एआई का उपयोग करेंगे- एआई बताओं, लिखों राजस्व बढ़ाने का एक नोट, या लोगों को झूठ, भय, भूख, भक्ति में बांधने के उपाय! या लिखे डराने, धमकाने वाला नोटिस, सम्मन, एफआईआर, चार्जशीट का ऐसा मसौदा, जिसे पढ़ कर वकील के भी होश उड़ जाए! और नागरिक रिश्वत ले कर दौड़ा-दौड़ा आए! चेक करो फलां नागरिक के दिमाग का खाता, वह हजारों में रिश्वत देने में समर्थ है या लाखों-करोड़ों में! वसूली में किसकी, कैसी हैसियत है?

पता है गूगल ने प्रधानमंत्री से यह भी वायदा किया है कि कंपनी सीधे अमेरिका- भारत के जुडाव के लिए समुद्र में केबल बिछाएगी। भला क्यों? ताकि गूगल या अन्य अमेरिकी कंपनियां डायरेक्ट केबल लिंक से भारत में बेचने का अपना ट्रैफिक, भारत से लूट की कमाई की प्राप्ति का आधुनिकतम पक्का रूप बना लें।  सुंदर पिचई ने आंध्रप्रदेश के चंद्रबाबू नायडू, सरकार के माईबाप जगत सेठ अडानी को भी पटा कर यह बड़ा ऐलान, सौदा पकवा दिया है कि गूगल भारत में विशाल डेटा सेंटर बनाएगी! किसलिए यह इंफ्रास्ट्रक्चर? ताकि सरकार, अडानी, अमेरिकी कंपनी बाजार की प्रोसेसिंग मतलब नियंत्रक, रेवेन्यू ट्रांसफर आदि सभी पहलुओं में स्वदेशी इंफ्रास्ट्रक्चर से बेधड़क काम करती रहे।

अब जरा इतिहास याद करें। पता है आपको आगरा के जहांगीर दरबार में ऐसे ही एक अंग्रेज ने भारत के बाजार को बूझते हुए सूरत में अपना व्यापारी गोदाम बनाया था। फिर उस छोटी सी अनुमति से भारत की लूट का इतिहास बना। उस इतिहास और आज के समय का बेसिक फर्क मात्र यह है कि हिंदुस्तान की नस्ल-कौम के दिमाग में तब फिर भी कुछ जैविक बुद्धि बची हुई थी। तभी दयानंद सरस्वती, तिलक, लाल-बाल-पाल तब स्व, स्वराज, स्वदेश के विचार दे बैठे थे। जबकि आज 2026 में वह सब लुप्त है। आज दिमाग पूरी तरह झूठ, नकल, जुगाड और कृत्रिम विश्वगुरूता का खोखा है। तभी आगे क्या होगा, यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है!

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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