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हम बांझ हो रहे हैं!

अपन तो कहेंगे
अपन तो कहेंगे
हम बांझ हो रहे हैं!
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नमस्कार, मैं हरिशंकर व्यास, आखिर हम हिंदू कर क्या रहे हैं..क्या हम आने वाले खतरे को जानबूझ कर नजरअंदाज नहीं कर रहे हैं…हिंदुओं का लिंगानुपात बिगड़ता जा  रहा है..अब लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है..रचनात्मकता और मेहनत की बयाज नकल ने हमें नाकाबिल तो बनाया ही है और अब सोशल मीडिया, एआई, डेटिंग ऐप्स के मकड़ या कहे तो मायाजाल ने युवाओं को कल्पना लोक में पहुंचा दिया है और अब हम उसी में और उसके इशारे पर ही जीना चाहते हैं…इसलिए अप तो कहेंगे में इस बार मेरे विचार का शीर्षक है..हम बांझ हो रहे हैं!

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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