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मोदी क्यों नहीं अमेरिकी गूगल, मेटा, एक्स, अमेज़न जैसी कंपनियों को भारत से बाहर करते?

अपन तो कहेंगे
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मोदी क्यों नहीं अमेरिकी गूगल, मेटा, एक्स, अमेज़न जैसी कंपनियों को भारत से बाहर करते?
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नमस्कार, मैं हरिशंकर व्यास, यही समय है जब प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के मनमानेपन और घमंड को एक झटके में चूर-चूर कर सकते हैं। लेकिन मोदी में क्या ऐसा करने की हिम्मत है ये तो वक्त बताएगा। फिलहाल ट्रंप ने भारतीय आईटी कंपनियों और युवा आईटी कर्मियों के साथ जो क्रूर सुलूक किया है उसका एक ही रास्ता है जैसे को तैसा। यानी अमेरिकी गूगलअमेज़नफेसबुकव्हाट्सऐपको भारत से बाहर का रास्ता दिखाना। लेकिन अब तक ऐसा देखने को नहीं मिल रहा है। इसीलिए कॉलम अपन तो कहेंगे में इस बार मेरे विचार का शीर्षक है,मोदी क्यों नहीं अमेरिकी गूगलमेटाएक्सअमेज़न जैसी कंपनियों को भारत से बाहर करते?

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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