राहुल गांधी वैसे तो मुकदमों के आदी हो गए हैं। देश का शायद ही कोई राज्य होगा, जहां उनके खिलाफ मुकदमा नहीं हुआ है। इसलिए दिल्ली पुलिस ने जो नया मुकदमा दर्ज किया है वह कायदे से उनके लिए ज्यादा चिंता की बात नहीं होनी चाहिए। लेकिन सरकार को उम्मीद है कि वह इस मुकदमे के जरिए दबाव बढ़ाएगी। वह दबाव राहुल के साथ साथ कुछ दूसरे लोगों पर भी हो सकता है। यह मुकदमा लोकसभा में पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की किताब लेकर जाने का है। दिल्ली पुलिस इस बात की जांच करेगी कि यह किताब राहुल गांधी को कहां से मिली। ध्यान रहे भारत में इस किताब के टेक्स्ट को रक्षा मंत्रालय की ओर से मंजूरी नहीं दी गई है। इसके बावजूद किताब का टेक्स्ट पीडीएफ फॉर्मेट में ऑनलाइन उपलब्ध है और किताब का कवर भी उपलब्ध है। असल में अंग्रेजी के सबसे बड़े प्रकाशक पेंग्विन रैंडम हाउस ने किताब छापने की पूरी तैयारी कर ली थी। इसका कवर बन गया था और कई लोगों का दावा है कि किताब छप भी गई थी लेकिन रक्षा मंत्रालय ने इसकी मंजूरी रोक दी।
अब सवाल है कि जब किताब छपी नहीं है तो राहुल गांधी कहां से उसकी प्रति लेकर संसद में पहुंचे थे? उन्होंने कहा था कि वे यह किताब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देंगे। हालांकि उन्होंने यह भी दावा किया कि शायद प्रधानमंत्री सदन में नहीं आएंगे। और सचमुच चार फरवरी को प्रधानमंत्री लोकसभा नहीं पहुंचे, जहां शाम में पांच बजे उनको राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई आधी अधूरी चर्चा का जवाब देना था। स्पीकर ने कहा कि उन्होंने कुछ अप्रत्याशित घटित होने की चिंता में प्रधानमंत्री को रोक दिया था। बाद में प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में जवाब दिया। विपक्ष अब भी इस बात पर अड़ा है कि राहुल गांधी को बोलने दिया जाए तभी लोकसभा में बजट पर चर्चा शुरू होगी। माना जा रहा है दिल्ली पुलिस का मुकदमा यह दबाव बनवाने के लिए है कि राहुल गांधी और विपक्षी पार्टियां बजट पर चर्चा शुरू होने दें। लेकिन मंगलवार को उलटा असर देखने को मिला। विपक्षी पार्टियां पहले से ज्यादा आक्रामक हो गईं।
बहरहाल, दिल्ली पुलिस जब इस बात की जांच करेगी कि राहुल गांधी को किताब कहां से मिली तो उसके साथ कई चीजों की जांच होगी। जैसे इस बात की भी जांच होगी कि किताब कैसे छपी, किसने छापी और कहां छापी? राहुल गांधी को किताब कहां से मिली? कहा जा रहा है कि किताब विदेश में छपी है। तो सवाल होगा कि विदेश से किसने किताब लाकर उनको दी? पेंग्विन से भी पूछताछ होगी। पेंग्विन ने कह दिया है कि उसने न तो किताब छापी है और न उसका कोई अंश लीक किया है। सो, इस बात की भी जांच होगी कि जिस पत्रिका ने किताब का अंश छापा उसको कहां से यह मिला?
इसकी जांच की आंच पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे तक भी पहुंचेगी क्योंकि अगर प्रकाशक ने नहीं लीक की तो दूसरा स्रोत लेखक का ही होगा। सरकार के संसदीय प्रबंधक उम्मीद कर रहे हैं कि इससे वे कांग्रेस और विपक्ष पर दबाव बना पाएंगे। दूसरी ओर राहुल गांधी की टीम का कहना है कि यह विवाद, जितना बढ़ेगा उतना सरकार को नुकसान होगा। लोगों के मन में सवाल उठेगा कि आखिर सरकार क्यों एक पूर्व सेना प्रमुख की किताब की बातें बाहर आने से रोकना चाहती है। सेना का मामला भावनात्मक जुड़ाव वाला होता है। लोगों को यकीन हो गया कि पूर्व सेना प्रमुख कुछ ऐसा बताना चाहते हैं, जो सरकार छिपाना चाहती है तो उसका उलटा असर होगा। सेना को लेकर सरकार, जो भी नैरेटिव बनाती है वह खराब होगा। इसलिए मुकदमा दोधारी तलवार है। सरकार को उलटा भी पड़ सकता है।


