पिछले करीब 12 साल में भारत की राजनीति में जो घटनाक्रम हुए हैं उनमें सबसे बड़ा घटनाक्रम डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को एक राजनेता से ऊपर उठा कर ईश्वर का दर्जा दे दिए जाने का है, जिनकी कोई आलोचना नहीं कर सकता है। अंबेडकर की आलोचना ईशनिंदा से भी बड़ा अपराध बन गई है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी ने यह काम किया। बाद में राहुल गांधी और दूसरे नेता भी इस अभियान में शामिल हुए। केजरीवाल ने गांधी की तस्वीर हटा कर सरकारी कार्यालयों में अंबेडकर की तस्वीर लगवाई थी। मोदी का दावा है कि उन्होंने लंदन से लेकर देश के हर हिस्से में अंबेडकर की स्मृति में कई निर्माण कराए हैं।
बहरहाल, अब कांशीराम को नया अंबेडकर बनाने का अभियान शुरू हो गया है क्योंकि अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव है और कांशीराम की बनाई पार्टी बसपा की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। पार्टियों को दलित वोट टूटने की संभावना दिख रही है। इसलिए सारी पार्टियां मान्यवार कांशीराम की याद में कार्यक्रमों के आयोजन कर रही हैं।
राहुल गांधी 13 मार्च को लखनऊ पहुंचे और कांशीराम की जयंती पर संविधान सम्मान सम्मेलन में हिस्सा लिया। उन्होंने यह भी कहा कि नेहरू जी होते तो कांशीराम मुख्यमंत्री बनते। उसके बाद उन्होंने कांशीराम के लिए भारत रत्न की मांग की। ध्यान रहे कांग्रेस ने दलित राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया है। समाजवादी पार्टी भी कांशीराम की याद में कार्यक्रम आयोजित कर रही है तो भाजपा भी उनकी स्मृति में कार्यक्रम करेगी। बसपा तो खैर उनकी बनाई पार्टी ही है। बसपा प्रमुख मायावती ने 15 मार्च को आयोजित कार्यक्रम में राहुल पर निशाना साधा और याद दिलाया कि उनकी 10 साल सरकार थी तो क्यों नहीं कांशीराम को भारत रत्न दे दिया? तब कांग्रेस की सरकार ने सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न सम्मान से नवाजा था।
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