डीएमके सुप्रीमो एमके स्टालिन इन दिनों लंदन में हैं। तमिलनाडु विधानसभा का चुनाव हार कर सत्ता से बाहर होने के बाद एक तरह से उन्होंने पार्टी की कमान अपने बेटे उदयनिधि स्टालिन को सौंप दी है। उदयनिधि ही रोजमर्रा के कामकाज संभाल रहे हैं। लेकिन बड़े नीतिगत फैसलों में स्टालिन का निर्देश जरूरी है। तभी स्टालिन ने लंदन से अपनी पार्टी के सांसदों और अन्य नेताओं को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए संबोधित किया। संसद के मानसून सत्र और उसमें आने वाले संविधान संशोधन विधेयकों के बारे में उन्होंने अपनी पार्टी के सांसदों को समझाया है। बताया जा रहा है कि उन्होंने अपने सांसदों से कहा है कि सीधे सीधे किसी बिल का न तो समर्थन करना है और न विरोध करना है। यह कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए बड़ा संदेश है। उन्होंने कांग्रेस को बता दिया है कि विपक्ष अगर किसी सरकारी विधेयक का विरोध कर रहा है तो उसे उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि डीएमके भी हर बिल का विरोध करेगा। गौरतलब है कि संसद में डीएमके सांसदों के अलग बैठने की व्यवस्था कर दी गई है।
स्टालिन के इस स्टैंड से सबसे बड़ा झटका परिसीमन बिल को रोकने के विपक्ष के प्रयासों को लगेगा। बताया जा रहा है कि स्टालिन की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान इस बिल का मुद्दा आया। पिछली बार यानी अप्रैल में विशेष सत्र में जब यह बिल आया था तब स्टालिन ने काले कपड़े पहन कर बिल की कॉपी जलाई थी। उनके सांसदों ने लोकसभा में इसका सबसे मुखर विरोध किया था। अब स्थिति बदल गई है। स्टालिन की पार्टी डीएमके के संगठन सचिव आरएस भारती ने दो टूक अंदाज में कहा है कि अगर सरकार परिसमीन बिल के मामले में डीएमके की ओर से दिए गए सुझावों को स्वीकार करती है तो उसका विरोध करने का कोई कारण नहीं है। इसका अर्थ है कि डीएमके उस विधेयक का समर्थन करने को तैयार है। ध्यान रहे इससे पहले शऱद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने भी इसी तरह कहा कि अगर सरकार सभी राज्यों में 50 फीसदी सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव लाती है तो उनकी पार्टी इसका समर्थन करने पर विचार कर सकती है। सो, तय मानें की विपक्ष के 30 और लोकसभा सांसद इस बिल पर सरकार के साथ होने जा रहे हैं।
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