पश्चिम बंगाल के मालदा में जो विवाद हुआ और न्यायिक अधिकारियों को जिस तरह सें बंधक बनाया गया वह मामूली घटना नहीं है। पूरी न्यायिक बिरादरी में इसको लेकर चिंता है। इस घटनाक्रम के बाद आमतौर पर यह माना गया कि किसी न किसी पार्टी ने इसको भड़काया है और इसके पीछे राजनीति है। हो सकता है कि ऐसा हो लेकिन यह भी संभव है कि यह अपने आप हुआ घटनाक्रम हो। ध्यान रहे न्यायिक अधिकारियों की जांच के बाद भी लाखों लोगों के नाम कट रहे हैं और यह धारणा बनी है कि अगर मतदाता सूची से नाम कट गया तो नागरिकता खतरे में आएगी। इसलिए स्वंयस्फूर्त तरीके से भी लोगों का गुस्सा भड़का हो सकता है।
अब सवाल है कि इसका फायदा किसको होगा? पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोट लगभग पूरी तरह से ममता बनर्जी के समर्थन में एकजुट है। इसमें विभाजन उन्हीं सीटों पर होगा, जहां 60 फीसदी या उससे ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं और उनको यह चिंता नहीं होगी कि उनका वोट बंटा तो भाजपा जीत सकती है। यानी पहले और दूसरे स्थान के लिए मुस्लिम उम्मीदवारों के बीच मुकाबला होगा वहीं पर मुस्लिम वोट बंटेगा। मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया, बीरभूम, उत्तरी दिनाजपुर आदि में ऐसी कई सीटें हैं। उन सीटों पर ओवैसी, हुमायूं कबीर, नौशाद सिद्दीकी, कांग्रेस और लेफ्ट पांचों को उम्मीद है। माल्दा जैसी घटना इन पांच समूहों को फायदा पहुंचा सकती है। तभी ममता बनर्जी नहीं चाहती हैं कि ऐसी घटनाएं हों, जिनसे कट्टरपंथी ताकतों को मजबूती मिले।


