परिवारों में सोचा जाए डिजिटल डिटॉक्स
हर समय नोटिफिकेशन्स, लाइक्स और कमेंट्स आदि की तलाश में हमारा मस्तिष्क डोपामाइन की लगातार खोज में रहता है। इससे चिंता, अवसाद, नींद की समस्या और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी आती है। ‘डिजिटल डिप्रेशन’ या ‘सोशल मीडिया एंग्जायटी’ अब आम शब्द बन गए हैं। युवा पीढ़ी में आत्म-सम्मान कम होना, दूसरों से तुलना करना और वास्तविक दुनिया से कटाव बढ़ रहा है। अब स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, ओटीटी (OTT) और इंटरनेट आदि हमारी जिंदगी का अभिन्न अंग बन चुके हैं। सुबह उठते ही पहला काम स्क्रीन चेक करना, रात सोने से पहले आखिरी काम भी स्क्रीन देखना, यह...