Indigo Crisis

  • इंडिगो प्रकरणः नियामक की सुस्ती घातक

    नागर विमानन मंत्रालय और डीजीसीए दोनों अक्सर डेटा दिखाते हैं कि हर साल सैकड़ों इनफोर्समेंट एक्शन लिए जाते हैं, जिसमें चेतावनी, सस्पेंशन, कैंसिलेशन और आर्थिक दंड शामिल हैं। लेकिन कागज़ी कार्रवाई और वास्तविक नज़ीर के बीच एक बड़ा एग्ज़िक्यूशन गैप है। हाल के वर्षों में 500–600 से अधिक एन्फ़ोर्समेंट एक्शन हर साल दर्ज हुए, पर इनमें बड़ी एयरलाइंस के टॉप मैनेजमेंट पर सीधे प्रहार करने वाले केस बहुत कम हैं। साल 2025 नागरिक उड्डयन की दृष्टि से सबसे बुरा साल बीता। एयर इंडिया का दर्दनाक हादसा हो या इंडिगो का एफ़डीटीएल संकट, दोनों ने ही भारत का नाम दुनिया के...

  • प्रबंध के घमंड की वजह से इंडिगो संकट !

    सवाल है जब डीजीसीए ने सभी ऑपरेटरों को नए नियमों का अनुपालन करने के लिए पर्याप्त समय दिया था, तो इंडिगो ने उन्हें नजरअंदाज करने व लापरवाही का रवैया क्यों अपनाया? इंडिगो का नए एफडीटीएल नियमों को नजरअंदाज करने का तरीका भी जेट एयरवेज की याद दिलाता है, जो इसी तरह के घमंड के चलते अपनी सुविधा के लिए नियमों को अनदेखा करती रही। एक दोहरावदार पैटर्न उजादगर होता हैं: वे एयरलाइंस जो अल्पकालिक लागत बचत को पायलटों और यात्रियों की सुरक्षा तथा नियामकीय अनुपालन आवश्यकताओं से ऊपर रखती हैं, वे एक ब्रेकिंग पॉइंट पर पहुंचकर अचानक ढह जाती हैं।...

  • इंडिगो संकटः मनमानी, निकम्मेपन की मिसाल

    भारत में अब किसी भी घटनाक्रम की, चाहे वह एक बड़े संकट के रूप में क्यों न प्रकट हुआ है, तर्कसंगत या तथ्यात्मक व्याख्या नहीं होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि देश राजनीतिक रूप से इतना विभाजित इतिहास में कभी नहीं रहा है। पूरा देश मोदी समर्थन या मोदी विरोध में बंटा हुआ है। तभी हर घटनाक्रम की व्याख्या इसी बाइनरी में होती है। मोदी विरोधी हर घटनाक्रम को एक निर्धारित दिशा में ले जाने का प्रयास करते हैं। उनकी सारी व्याख्या एक ऐसे आइडियोलॉजिकल कंस्ट्रक्ट पर आधारित होती है, जो राहुल गांधी या कांग्रेस के इकोसिस्टम द्वारा रची गई...