नागर विमानन मंत्रालय और डीजीसीए दोनों अक्सर डेटा दिखाते हैं कि हर साल सैकड़ों इनफोर्समेंट एक्शन लिए जाते हैं, जिसमें चेतावनी, सस्पेंशन, कैंसिलेशन और आर्थिक दंड शामिल हैं। लेकिन कागज़ी कार्रवाई और वास्तविक नज़ीर के बीच एक बड़ा एग्ज़िक्यूशन गैप है। हाल के वर्षों में 500–600 से अधिक एन्फ़ोर्समेंट एक्शन हर साल दर्ज हुए, पर इनमें बड़ी एयरलाइंस के टॉप मैनेजमेंट पर सीधे प्रहार करने वाले केस बहुत कम हैं।
साल 2025 नागरिक उड्डयन की दृष्टि से सबसे बुरा साल बीता। एयर इंडिया का दर्दनाक हादसा हो या इंडिगो का एफ़डीटीएल संकट, दोनों ने ही भारत का नाम दुनिया के सिविल एविएशन सेक्टर में बदनाम किया है। वहीं सरकार और नियामक (डीजीसीए व नागर विमानन मंत्रालय) की देरी, आधे-अधूरे कदम और चेतावनियों तक सिमटी कार्रवाई ने हालिया एफ़डीटीएल प्रकरण के बाद इंडिगो को बेवजह समय, स्पेस और नैरेटिव – तीनों में फ़ायदा पहुँचाया है।
सरकार का यही ढीलापन पिछले मामलों में भी दिखा, जिसने निजी एयरलाइंस को यह संदेश दिया कि यदि आपके ‘संपर्क’ सही हैं तो बड़े अपराधों पर भी अंततः ‘नोटिस और चेतावनी’ से काम चल सकता है। उल्लेखनीय है कि भारत सरकार के नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा नए एफ़डीटीएल नियमों की प्रभावी तारीख काफ़ी पहले से तय और सार्वजनिक थी, फिर भी न तो इंडिगो ने पर्याप्त पायलट और स्टाफिंग तैयार की और न ही डीजीसीए ने समय से सख़्त अनुपालन की मॉनिटरिंग की। परिणाम यह हुआ कि नवंबर–दिसंबर में हजारों फ्लाइट्स प्रभावित हुईं, पर नियामक की शुरुआती भूमिका दिखावटी ऑडिट, ‘विशेष निरीक्षण’ और ऑपरेशनल रियायतों तक सीमित रही, न कि कठोर दंडात्मक कार्रवाई तक।
इस देरी ने इंडिगो को दो स्पष्ट लाभ दिए, संकट के दौरान पब्लिक आक्रोश ठंडा पड़ने तक कोई बड़ी पेनल्टी या उड़ान-सीमिती नहीं लगी, जिससे कंपनी को रिकवरी का वक़्त मिला। डीजीसीए द्वारा ‘रिकवरी रोडमैप’, ‘विशेष ऑडिट’ और भविष्य की निगरानी जैसी भाषा ने यह संकेत दिया कि मामला बातचीत और सुधार योजनाओं से सुलझ जाएगा, न कि लाइसेंस या स्लॉट पर त्वरित प्रहार से।
एफ़डीटीएल नियमों के मसौदे के समय से ही विशेषज्ञों और पायलट प्रतिनिधियों ने आगाह किया था कि अगर एयरलाइंस ने समय पर भर्ती व रोस्टर सुधार नहीं किए, तो पायलट थकान और ऑपरेशनल कोलैप्स का जोखिम बढ़ेगा। डीजीसीए की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ नियम बनाना नहीं, बल्कि समयबद्ध ट्रांज़िशन सुनिश्चित करना भी थी, खासकर उस एयरलाइन पर जो घरेलू बाज़ार की सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखती है और जिसके फेल होने से पूरा सिस्टम झटके में ्लायंस की रियलिस्टिक क्षमता पर कठोर स्ट्रेस टेस्ट नहीं किया। नवंबर से ही बढ़ती देरी, कैंसिलेशन और ‘फ्रैक्चर्ड रोस्टर’ की शिकायतों के बावजूद समय रहते दंडात्मक हस्तक्षेप नहीं हुआ। चेतावनियाँ और अपीलें ज़्यादा दिखीं, प्रतिबंध कम।
ऐसा नहीं है कि ये पहली बार हुआ। नोटिस, चेतावनी, ‘कड़ी निगरानी में लिया गया है’ जैसे वाक्य, दोषी प्रबंधन पर त्वरित नज़ीर-स्थापित करने वाला प्रहार नहीं। जब सिस्टम बार-बार इसी पैटर्न पर चलता है, तो यह एक ख़तरनाक मिसाल बन जाता है। यानी नियम तोड़ो, संकट खड़ा करो, फिर बातचीत और लॉबिंग से मामला नरम करवा लो। वहीं दूसरी ओर दिलचस्प और चिंताजनक तथ्य यह है कि डीजीसीए व मंत्रालय छोटी या अपेक्षाकृत सीमित प्रभाव वाले उल्लंघनों पर तुरंत और बड़ी सख़्ती दिखाने में पीछे नहीं रहते।
एयर इंडिया पर सिर्फ एक फ़र्स्ट ऑफ़िसर की ‘रेसेन्सी’ न होने के बावजूद फ्लाइट ऑपरेट करने के मामले में 30 लाख रुपये का जुर्माना और रोस्टरिंग अधिकारियों पर सख़्त अनुशासनात्मक कार्रवाई का आदेश दिया गया। एयर इंडिया व्हीलचेयर सेवा में चूक और लो-विज़िबिलिटी ट्रेनिंग की कमी जैसे मामलों में भी 30–30 लाख के जुर्माने झेल चुकी है, साथ ही पायलट सस्पेंशन और अन्य कार्रवाइयाँ भी हुई। बोइंग के विमान पर बिना अनुमति विशिष्ट बाहरी लिवरी पेंट करने जैसे अपेक्षाकृत ‘टेक्निकल’ उल्लंघन पर भी एयर इंडिया पर 30 लाख का दंड लगाया गया। इतना ही नहीं संसद में इसे सख़्त एन्फ़ोर्समेंट का उदाहरण बता कर पेश भी किया गया।
वहीं इसके उलट, इंडिगो के एफ़डीटीएल संकट जैसा गंभीर मामला, जिसमें पूरे नेटवर्क में हज़ारों यात्रियों की यात्रा, समय, स्वास्थ्य और आर्थिक हित प्रभावित हुए, अब तक मुख्यतः ऑडिट, चेतावनी, भविष्य में कड़ी कार्रवाई की ्लान’ तक सीमित दिखता है, न कि तत्काल और उच्च-स्तरीय दंड तक।
नागर विमानन मंत्रालय और डीजीसीए दोनों अक्सर डेटा दिखाते हैं कि हर साल सैकड़ों इनफोर्समेंट एक्शन लिए जाते हैं, जिसमें चेतावनी, सस्पेंशन, कैंसिलेशन और आर्थिक दंड शामिल हैं। लेकिन कागज़ी कार्रवाई और वास्तविक नज़ीर के बीच एक बड़ा एग्ज़िक्यूशन गैप है।
हाल के वर्षों में 500–600 से अधिक एन्फ़ोर्समेंट एक्शन हर साल दर्ज हुए, पर इनमें बड़ी एयरलाइंस के टॉप मैनेजमेंट पर सीधे प्रहार करने वाले केस बहुत कम हैं; ज़्यादातर चेतावनी, मामूली जुर्माना या मिड–लेवल अफ़सरों पर जिम्मेदारी तक सिमटे दिखते हैं। डीजीसीए ने कई मौक़ों पर एयरलाइंस को भविष्य में ‘किसी भी उल्लंघन पर सख़्त कार्रवाई’ की चेतावनी दी, लाइसेंस निलंबन तक की धमकी दी, पर बड़े संकटों के बाद वास्तविक लाइसेंस–स्तर की कार्रवाई विरले ही देखी गई। इंडिगो संकट में भी, मंत्री स्तर पर “ऐसी मिसाल बनाएँगे कि कोई दोबारा हिम्मत न करे” जैसे बयान दिए गए, पर ज़मीनी स्तर पर जो दिखा, वह था – शो कॉज़ नोटिस, समीक्षा बैठकें, सिस्टम सुधार और आगे की निगरानी। इस अंतर ने संदेश साफ़ कर दिया: कड़े शब्द, नरम दंड।
यदि भारतीय एविएशन में नियम सिर्फ़ पायलट की नींद और क़ानून की किताब में लिखे घंटों तक सीमित नहीं, बल्कि यात्री के अधिकार, सार्वजनिक सुरक्षा और बाज़ार अनुशासन से जुड़े हैं, तो फिर चुनिंदा सख़्ती से आगे जाना ही होगा।डीजीसीए और नागरिक उड्डयन मंत्रालय को बड़े ‘ऑपरेशनल फ़ियास्को’, जैसे एफ़डीटीएल संकट, व्यापक क्रू थकान ्यूलिंग हेरफेर – पर सीधे टॉप मैनेजमेंट और बोर्ड स्तर तक दंडात्मक कार्रवाई करनी चाहिए, जिसमें भारी आर्थिक जुर्माना, स्लॉट कटौती और नए रूट अनुमोदनों पर अस्थायी रोक शामिल हो।
चेतावनी और नोटिस को केवल प्रारंभिक कारवाही ही बनाया जाए। एक बार सिस्टमिक गलती सिद्ध हो जाए, तो ‘ग्रेजुएटेड पेनल्टी’ के तहत स्वचालित और समयबद्ध दंड लागू हो – ताकि न तो राजनीतिक इच्छा पर निर्भरता रहे और न ही लॉबिंग के लिए मौक़ा बचे। मंत्रालय को भी अपने भीतर जवाबदेही तय करनी होगी। जब एक साल पहले से ज्ञात नियम लागू होते समय ध्वस्त हो जाते हैं, तो सिर्फ़ एयरलाइन नहीं, उस नियम-निर्माण और निगरानी ढांचे पर भी कार्रवाई हो।
इंडिगो संकट और एफ़डीटीएल विवाद ने दिखा दिया कि नियामक और सरकार की सुस्ती सिर्फ़ एक निजी एयरलाइन की मदद नहीं करती, वह पूरी इंडस्ट्री को गलत संकेत देती है, कि बड़ा खिलाड़ी बन जाओ, फिर बड़े अपराध भी “मैनेज’ हो सकते हैं। अगर यह पैटर्न नहीं टूटा, तो अगली दुर्घटना या संकट के समय केवल पायलट, क्रू और यात्रियों को दोषी ठहराना न केवल अन्याय होगा, बल्कि सच से भी भागना होगा।


