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न सफेद झक्क, न काली कट्ट

मोदी

एक प्रधानमंत्री जी मानते हैं कि उन की निर्णयात्मक क्षमता अभूतपूर्व है, अद्भुत है और सटीक है। सो, वे बिना किसी से सालह-मशवरा करे निर्णय लेते हैं और सब पर थोप देते हैं। उन्हें इस से कोई लेनादेना ही नहीं है कि उन का फ़ैसला कितना अर्थवान है और कौन क्या सोचेगा? इसलिए इसी में बेहतरी है कि जो बताया जा रहा है, उसे चुपचाप मान लीजिए। नहीं भी मानेंगे तो कर क्या लेंगे?

क्या भारत विश्वगुरु बन गया है? क्या भारत महाशक्ति बन गया है? क्या भारत दुनिया की चौथी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है? क्या भारत में अमृत काल आ गया है? क्या भारत लोक कल्याण के मार्ग पर प्रशस्त है? क्या भारत कर्तव्य पथ पर चल रहा है? क्या भारत का सत्ता सिंहासन सेवा तीर्थ बन गया है? क्या भारत में अच्छे दिन आ गए हैं?

दिलजले तो इन सारे सवालों के जवाब ‘ना’में ही देंगे। लेकिन जिन्हें दिलबर दिल से प्यारे हैं, वे इन तमाम सवालों पर ‘हांजी-हांजी’ का हल्ला मचाएंगे। तो मुसीबत यह है कि आप-हम क्या करें? ‘हांजी-हांजी’ करें या ‘नाजी-नाजी’ करें? इधर कुआं, उधर खाई। हां जी कहें तो असत्यभाषी होने के पाप का भागी बनें और ना जी कहें तो देशद्रोही होने का कलंक माथे पर लगवाएं। सो, जाएं तो कहां जाएं?

इसलिए मुझे लग रहा है कि भारत विश्वगुरु बन भी गया है और नहीं भी बना है। भारत महाशक्ति बन भी गया है और नहीं भी बना है। भारत दुनिया की चौथी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बन भी गया है और नहीं भी बना है। भारत में अमृत काल आ भी गया है और नहीं भी आया है। भारत लोक कल्याण के मार्ग पर प्रशस्त भी है और उस से भटका हुआ भी है। भारत कर्तव्य पथ पर चल भी रहा है और नहीं भी चल रहा है। भारत का सत्ता सिंहासन ‘सेवा तीरथ्’ बन भी गया है और नहीं भी बन पाया है। हमारे अच्छे दिन आ भी गए हैं और अभी दूर-दूर तक दिखाई नहीं भी दे रहे हैं।

अब आप कहेंगे कि यह क्या बात हुई? हो भी गया है और नहीं भी हुआ है – यह कहां की कोड़ी ढूंढ लाए? अरे, या तो हुआ है या फिर नहीं हुआ है। मगर नहीं, यह क्यों ज़रूरी है कि सब कुछ श्वेत-श्याम ही हो? काले-सफेद के अलावा कुछ और होता ही नहीं है क्या? ऐसा भी तो होता है कि कोई चीज़ न सफेद झक्क हो और न काली कट्ट। तो ऊपर उठाए गए तमाम प्रश्नों के उत्तर इसी श्रेणी में आते हैं। अगर साढ़े ग्यारह बरस में भी यह बात आप की समझ में नहीं आई है तो अब इस जीवन में तो आने वाली है नहीं।

नब्बे के दशक में भारत में एक प्रधानमंत्री हुए थे। उन के शरीर का कद उन से पहले उन की पार्टी की तरफ से बने प्रधानमंत्री से दस इंच छोटा था। लेकिन तिकड़मी राजनीति में वे अपने पूर्ववर्ती से दस क़दम आगे थे। वे ज़्यादातर मसलों पर कभी कोई निर्णय लिया ही नहीं करते थे। उन की इस अदा से उन के मंत्री परेशान रहते थे, उन के अफ़सर बिलबिलाते रहते थे, उन के सलाहकार कुनमुनाते रहते थे और पार्टी-संगठन के दिग्गज भी सनसनाते रहते थे। मगर प्रधानमंत्री जी स्थितप्रज्ञ बने मज़े में बैठे रहते थे।

और फिर एक दिन क्या हुआ कि जब सब के सब्र का बांध ढहने की कगार पर पहुंच गया तो बहुत-से लोग इकट्ठे हो कर पांच फुट दो इंच के इन कायापुरुष के घर गए और उन्हें घेर कर बैठ गए। उन के सामने ऐसे पचासों अहम मुद्दे गिनाने लगे, जो फ़ैसलों की राह जोट रहे थे। जिन पर कोई निर्णय नहीं लिए जाने की वज़ह से राजकाज पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था। सब ने प्रधानमंत्री जी से ज़ोर-ज़ोर से पूछा कि आप ने इन सब मामलों में निर्णय क्यों नहीं लिए? आप निर्णय क्यों नहीं लेते हैं? मालूम है, प्रधानमंत्री जी ने क्या जवाब दिया? उन्होंने अपने नीचे का होंठ और नीचे लटका लिया। एक हाथ दाएं गाल पर रख कर चिंतक की मुद्रा में बैठ गए। और, फिर अपनी आवाज़ को अधिकतम संभव गंभीरता प्रदान करते हुए बोले, ‘‘किसी मसले पर निर्णय नहीं लेना भी एक क़िस्म का निर्णय ही हुआ करता है।‘ और, उठ कर चल दिए। किसी की समझ में नहीं आया कि हंसें कि रोएं।

इस प्रसंग के 22 बरस बाद अब अगर आज आप की समझ में यह नहीं आ रहा है कि हंसें कि रोएं तो कोई क्या करे? तब हंसने-रोने का असमंजस इसलिए था कि एक प्रधानमंत्री जी मानते थे कि निर्णय नहीं लेना भी एक निर्णय है। आज यह ऊहापोह इसलिए है कि एक प्रधानमंत्री जी मानते हैं कि उन की निर्णयात्मक क्षमता अभूतपूर्व है, अद्भुत है और सटीक है। सो, वे बिना किसी से सालह-मशवरा करे निर्णय लेते हैं और सब पर थोप देते हैं। उन्हें इस से कोई लेनादेना ही नहीं है कि उन का फ़ैसला कितना अर्थवान है और कौन क्या सोचेगा? वे मानते हैं कि सोचना किसी और का काम है ही नहीं। सिर्फ़ वे ही सोचेंगे, वे ही निर्णय लेंगे और बाक़ी सब का काम है दोनों हाथ सामने बांध कर, सिर झुका कर, उन निर्णयों को स्वीकार करना।

सो, निर्णय हुआ है कि भारत विश्वगुरु बन चुका है, भारत महाशक्ति है, भारत दुनिया की चौथी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था है, भारत में अमृत काल है, भारत लोक कल्याण के मार्ग पर प्रशस्त है, भारत कर्तव्य पथ पर चल रहा है, भारत का सत्ता सिंहासन ‘सेवा तीर्थ’है और भारत में अच्छे दिन कभी के आ चुके हैं। आप के पास यह विकल्प नहीं है कि इन निर्णयों को न मानें। ये निर्णय आप को इसलिए मानने ही हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम अब सेवा तीर्थ कर दिया गया है, प्रधानमंत्री जी के घर की सड़क को अब लोक कल्याण मार्ग का नाम दे दिया गया है और राजपथ को अब कर्तव्य पथ कहा जाने लगा है।

जो यह सवाल उठाएंगे कि अगर भारत विश्वगुरु बन गया है तो दुनिया के देश उस की चरण वंदना करने के बजाय उस पर उंगलियां उठाते क्यों दीखते हैं – वे सब राष्ट्रविरोधी हैं। जो यह सवाल उठाएंगे कि अगर भारत महाशक्ति बन गया है तो अमेरिका के मनमौजी राष्ट्रपति को हमारे प्रधानमंत्री का मज़ाक उड़ाने पर माक़ूल जवाब क्यों नहीं दिया जा रहा है – वे सब मनोव्यथाग्रसित हैं। जो यह सवाल उठाएंगे कि अगर भारत दुनिया की चौथी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है तो तीन-चौथाई आबादी को मुफ़्त राशन क्यों देना पड़ रहा है – वे सब विध्नसंतोषी हैं। जिन्हें अमृत काल दिखाई नहीं दे रहा है, उन सब के भीतर ज़हर भरा हुआ है। जिन्हें अच्छे दिनों का अहसास नहीं हो रहा है, उन सब की संवेदी प्रणाली सुन्न हो चुकी है।

साढ़े ग्यारह साल में कौन-सा दिन ऐसा गया है, जब आप ने आरोपों के पत्थर नहीं बरसाए? जब किसानों ने सड़कें ठप्प नहीं कर दीं? जब परदेसी धरती पर देश को बदनाम करने का काम नहीं हुआ? जब प्रधानमंत्री जी को बुरी-बुरी गालियां नहीं दी गईं? जब संसद में व्यवधान खड़े नहीं किए गए? जब ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे नहीं लगाए गए? और-तो-और, जब ऑपरेशन सिंदूर तक पर सवालों की बौछार नहीं हुई? तो जब इस सब से कोई बाल बांका नहीं हुआ, जब इस सब के बावजूद एक-के-बाद-एक प्रदेश हिंदुत्वमय होते जा रहे हैं और जब इस सब के बावजूद मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण का पवित्र रथ अबाध गति से आगे बढ़ रहा है तो आगे ही क्या हो जाएगा? इसलिए इसी में बेहतरी है कि जो बताया जा रहा है, उसे चुपचाप मान लीजिए। नहीं भी मानेंगे तो कर क्या लेंगे?

By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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