मध्यप्रदेश के सबसे बड़े हिंदी अखबार की रिपोर्ट है कि इंदौर में दूषित पानी पीने से 20 लोगों की मौत हुई है, जिनमें से सरकार की ओर से 18 परिवारों को दो-दो लाख रुपए का मुआवजा दिया गया है, जबकि सरकार ने अदालत में कहा है कि चार मौतें हुई हैं। अधिकारी छह मौतों की बात कर रहे हैं। कौन सा आंकड़ा सही है? कितने लोग असल में मरे? घटना इंदौर की है जो वर्षों से देश के सबसे स्वच्छ शहर का अवार्ड जीत रहा है और घटना इंदौर के भागीरथपुरा की है, जहां के पार्षद को सर्वश्रेष्ठ पार्षद का पुरस्कार मिला है।
सो क्या तो स्वच्छता का प्रमाणपत्र और क्या सर्वश्रेष्ठ पार्षद का प्रमाणपत्र, जब पीने के पानी में सीवेज का पानी मिल जाए और सैकड़ों लोग बीमार हो हो जाएं, दर्जनों की मौत हो जाए! ऊपर से फिर आंकड़ों में हेराफेरी और अलग अलग तरह का झूठ। अब भी कोई डेढ़ दर्जन लोग अस्पतालों के इंटेसिव केयर यूनिट में भर्ती हैं, जिनमें से दो या तीन की हालत गंभीर बताई जा रही है। मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि ‘हम आंकड़ों में नहीं जा रहे हैं।‘
पीने के पानी में सीवेज का पानी मिल जाए यह घटना सिर्फ इंदौर की नहीं है। इंदौर में लोगों के मरने का सिलसिला जारी था तभी देश के उस राज्य में यह घटना हुई, जिसका मॉडल दिखा कर पूरे देश में वोट मांगा गया था। गुजरात की राजधानी गांधीनगर में पीने के पानी की सप्लाई में सीवेज का पानी मिक्स हो गया और 104 बच्चे बीमार हो गए। तीन दिन पहले साल भर की एक बच्ची की मौत हुई। टायफायड के लक्षण के कारण अनेक बच्चों का इलाज हो रहा है और वयस्क भी दूषित पानी से बीमार हुए हैं। तीसरा राज्य ओडिशा है, जहां खोरदा के पीएम श्री नवोदय विद्यालय में दो सौ बच्चे बीमार हो गए और जांच में पता चला कि 50 से ज्यादा बच्चों को पीलिया यानी ज़ॉन्डिस की बीमारी हो गई है। दहशत फैली तो सैकड़ों बच्चे स्कूल छोड़ कर चले गए। उधर कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू के लिंगराजपुरम में दूषित पानी से लोगों के बीमार होने की खबर आई। वहां भी पीने के पानी की सप्लाई में सीवेज का पानी मिला था।
एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले तीन हफ्ते में अकेले इंदौर में दूषित पानी पीने से करीब 14 सौ लोग बीमार हुए हैं। पूरे देश में यह संख्या हजारों में है। लेकिन हर जगह आंकड़ों की हेराफेरी चल रही है। कहीं बीमारों की संख्या स्वीकार नहीं की जा रही है, कहीं मरने वालों का आंकड़ा छिपाया जा रहा है, कहीं बीमारी को हलका करके बताने का प्रयास हो रहा है, कहीं दूषित पानी की बजाय मिलावटी या दूषित खाने पर दोष डाला जा रहा है तो कहीं इस पर परदा डालने की कोशिश हो रही है कि पीने के पानी की सप्लाई में सीवेज का पानी मिल गया था। सोचें, राजधानी दिल्ली में पीने के पानी में हेवी मेटल्स की मात्रा निर्धारित सीमा से ज्यादा है। जल बोर्ड की सप्लाई के बाद भी बिना वाटर प्यूरीफायर लगाए लोगों का काम नहीं चलता है। इसके बावजूद डॉक्टर बता रहे हैं कि ज्यादातर बीमारियां पानी की खराब क्वालिटी के कारण हो रही हैं। जलजनित रोग महामारी का रूप लेते जा रहे हैं।
सवाल है कि आजादी के 75 साल बाद भी सरकार पीने के पानी की व्यवस्था क्यों नहीं कर सकी? लेकिन उससे ज्यादा सवाल पिछले करीब 12 साल के दावों का है। नरेंद्र मोदी ने जिस बात का सबसे ज्यादा ढिंढोरा पीटा वह राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान का था। गांधी का चश्मा लगा कर उसका प्रचार किया गया। देवालय की जगह शौचालय को प्राथमिकता देने की बात कही गई। स्मार्ट सिटी बनाने के दावे किए गए और उसके लिए हजारों करोड़ रुपए का आवंटन हुआ। सोचें, इन योजनाओं का क्या हासिल है? कितने शहर स्मार्ट हो गए? इंदौर, गांधीनगर और बेंगलुरू भी स्मार्ट सिटी हैं लेकिन लोग दूषित पानी पीकर बीमार हो रहे हैं या मर रहे हैं! देश को अचानक एक दिन खुले में शौच से मुक्त कर दिया गया जबकि लाखों लोग राजधानी दिल्ली में खुले में शौच के लिए जाते हैं! स्मार्ट सिटी, स्वच्छता अभियान और शौचालय बनाने के अभियान पर हजारों करोड़ रुपए खर्च हुए फिर भी स्मार्ट सिटी में ही पीने के पानी की सप्लाई में सीवेज का पानी मिक्स हो रहा है।
मोदी सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक योजना से हर घर नल से जल पहुंचाने की है। इस पर राज्यों के साथ साझेदारी में काम हो रहा है और केंद्र सरकार हजारों करोड़ रुपए के फंड राज्यों को दे रही है। पर इसके इस्तेमाल में गड़बड़ी की सूचनाएं लगभग पूरे देश से आ रही हैं। इस योजना को इसलिए शुरू किया गया था ताकि लोग चापाकल, कुआं, तालाब या दूसरे स्रोत से पानी न इस्तेमाल करें क्योंकि उससे बीमारियां होती हैं। लेकिन देश का शायद ही कोई शहर होगा, जहां नल से गंदा पानी आने की शिकायत नहीं आती हो। पानी का रंग पीला हो जाना और उसमें से बदबू आना आम शिकायत है। ऐसा नहीं है कि हर बार सीवेज का पानी मिक्स होता है।
एक बड़ी समस्या यह है कि पानी का स्रोत ही गंदा या दूषित होता जा रहा है। उसको ठीक करने के लिए कोई उपाय नहीं हो रहा है। भूमिगत जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है और जिन राज्यों में पहले पानी 20 मीटर नीचे उपलब्ध था वहां दो सौ मीटर पर पानी आ रहा है। वह भी साफ नहीं है। नदियां प्रदूषित हो गई हैं। उनका तल ऊंचा हो गया है, जिससे पानी नदियों में टिकता नहीं है। इससे बाढ़ की समस्या अलग होती है और ग्राउंडवाटर रिचार्ज नहीं हो पाता है। पीने के पानी की समस्या सनातन या चिरंतन नहीं है। लोग पहले कुएं, बावड़ी, नदियों से पानी लेते थे। चापाकल से साफ पानी आता था। लेकिन अब हजारों की संख्या में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लग रहे हैं और फिर भी साफ पानी नहीं मिल रहा है। सरकारी पानी में कभी अमोनिया ज्यादा हो जा रहा है तो कभी क्लोरिन की मात्रा बढ़ जा रही है और लोग बीमार हो रहे हैं। कुछ दिन पहले एक राज्य ने दूसरे राज्य पर दूषित पानी भेजने का आरोप लगाया था। यह समस्या मानव निर्मित है और बहुत पुरानी नहीं है। लेकिन अब इसके समाप्त होने की कोई संभावना दूर दूर तक नहीं दिखाई दे रही है क्योंकि सरकार मान कर बैठी है कि उसने घर घर शौचालय बनवा दिए, नल से जल पहुंचाने की व्यवस्था कर दी, शहरों को स्मार्ट बना दिया और स्वच्छता अभियान सौ फीसदी सफल है।


