कुछ-कुछ 2025 जैसा ही 2026 में संभव। ऊपर से भौकाल मचाते आंकड़े वही जमीनी असलियत में खोखला। विश्व बाजार में पिछले साल भारत का रुपया लुढ़का वही आर्थिकी तथा बाजार की रौनक चीनी कारखानों के उत्पादों पर आश्रित। वैश्विक वास्तविकताओं में यह हमेशा सुना गया है कि जो विकसित है या विकसित होता हुआ है तो उसकी करेंसी उसी अनुपात में मंहगी, मूल्यवान होती है। वहां के नागरिकों के पासपोर्ट का मान बढ़ता है। पर मोदी राज के हवाबाज ढोलों का कमाल है जो रुपया, निर्यात लुढके, बेरोजगारी बढ़ी मगर फिर भी ब्रिटेन, जापान, जर्मनी सभी को भारत पछाड़ता हुआ। आगे बस चीन और अमेरिका का नंबर आना है। भारत के पासपोर्ट का जहां सवाल है तो विश्वगुरू बन गए पर अपना पासपोर्ट अफ्रीकी देशों के पासपोर्ट से भी कमजोर, लुढ़कता हुआ।
सच्चाई है कि भारत की आबादी दुनिया की कुल आबादी का साढे 17 प्रतिशत है जबकि बेचारे ब्रिटेन, जापान, जर्मनी की कुल आबादी सिर्फ तीन प्रतिशत है। भारत 140 करोड़ लोगों की भीड लिए हुए है वही ब्रिटेन, जर्मनी, जापान तीनों देशों की कुल आबादी 24 करोड है। मतलब भारत के मध्यवर्ग की अनुमानित संख्या से भी कम।
लेकिन 2026 की ताजा शुरूआत जापान को पछाड देने के ढोल से हुई। यह शोर लगातार बढ़ना है। जबकि विकसित ब्रिटेन, जापान, जर्मनी बनाम भारत का बुनियादी फर्क है जो वे देश आत्मनिर्भर आर्थिकी के गौरव में सांस लेते हैं वही भारत की आर्थिकी चीन आश्रित है। भारत किसी भी मामले में अब आत्मनिर्भर नहीं है। 2014 के बाद से भारत का विकास या तो बाजार के रूप में है या व्यापारिक लेन-देन, कृषि, सेवा और खैरात-रेवड़ियों की आर्थिकी से फलता-फूलता हुआ है।
ऐसा ही सुरक्षा, सामरिक, भू राजनीति में है। 2025 के ऑपरेशन सिंदूर में भारत के पक्ष में खुलकर बोलने वाला कौन देश था? ईमानदारी से केवल इजराइल। रूस ने तटस्थता रखी। डोनाल्ड ट्रंप ने मौके का फायदा उठाया तथा बाद में पाकिस्तान पर शहाथ रखा। चीन ने पाकिस्तान को हर संभव मदद दी। दक्षिण एशिया, आसियान देशों में भी भारत अलग-थलग था।
वह स्थिति 2026 में और बढेगी। 2026 में ट्रंप प्रशासन के साथ टैरिफ करार भले हो जाए लेकिन पाकिस्तान के लिए उसके खुले दरवाजे बंद नहीं होने हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश को लेकर अमेरिका, पश्चिमी देश, यूरोपीय संघ, जापान, ऑस्ट्रेलिया सभी तटस्थ रहने हैं। भारत की चिंताओं में कोई साझेदार नहीं होगा। तभी नोट रखें दिसंबर 2026 में भारत की आर्थिकी अधिक पराश्रित होगी तो भूराजनीति व सामरिक मामलों में भी भारत ज्यादा अलग-थलग होगा।


