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व्यवस्था बिगड़ती जाएगी

और भीड़ भेड़ बकरियों वाली हैसियत की है तो उसके साथ ट्रीटमेंट भी वैसा ही है। दो उदाहरण हैं। मध्य प्रदेश में देश के सबसे स्वच्छ शहर का कई बरसों से अवार्ड जीत रहे इंदौर में दूषित पानी पीने से एक दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हुई। साल का अंत और नए साल की शुरुआत इसी खबर से हुई है। पता नहीं चल पा रहा है कि पीने के पानी की सप्लाई में जहरीला पानी कहां से मिक्स हुआ। लेकिन खबर है कि दो महीने से लोग पानी के दूषित होने की शिकायत कर रहे थे। पानी से बदबू आ रही थी और लोगों की तबियत बिगड़ रही थी। अब खबर है कि पानी में एसिड और बैक्टीरिया की भारी मात्रा मिली है। लेकिन तय मानें कि इसके लिए किसी को जिम्मेदार नहीं माना जाएगा। एकाध लोगों के तबादले होंगे और एकाध लोग निलंबित उसके बाद सब रफा दफा हो जाएगा।

दूसरी खबर है कि राजधानी दिल्ली की, जहां पिछले ढाई महीने से हवा जहरीली बनी हुई है। वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई चार सौ के आसपास है। दिल्ली सरकार के पर्यावरण मंत्री का दावा है कि पिछले आठ साल में सबसे कम कम पीएम 2.5 पिछले साल यानी 2025 में रहा। उनके हिसाब से एक क्यूबिक मीटर में पीएम 2.5 की मात्रा एक सौ के करीब है। सोचें, भारत सरकार का मानक प्रति क्यूबिक मीटर पीएम 2.5 की मात्रा 60 रखने का है और विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानक 12 का है। लेकिन एक सौ होने को उपलब्धि के तौर पर पेश किया जा रहा है। यह पूरे साल का औसत आंकड़ा है। पिछले ढाई महीने का औसत आंकड़ा तीन सौ से ऊपर का है।

यह सिर्फ दिल्ली की बात नहीं है देश के हर हिस्से में हवा और पानी के प्रदूषण की यही स्थिति है। दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में सात से आठ हमेशा भारत के होते हैं। सूची जितनी लंबी होती जाती है, भारत के शहरों की संख्या उतनी बढ़ती जाती है। ऐसा नहीं है कि भारत के उन शहरों में प्रदूषण है, जहां उद्योग लगे हैं। बिहार के ऐसे शहर, जहां दूर दूर तक कोई फैक्टरी नहीं है वहां भी एक्यूआई चार सौ से ऊपर है और इसका कारण सिर्फ इतना है कि चारों तरफ धूल मिट्टी फैली है और निर्माण कार्यों से होने वाला प्रदूषण धूल की चादर की तरह फैला हुआ है। किसी भी शहर में नगर निगम को सफाई से कोई लेना देना नहीं है। राजधानी दिल्ली में सैकड़ों टन कूड़ा रोज निकलता है, जिसका बड़ा हिस्सा सड़कों पर बिखरा रहता है। हर साल सर्दियों में कभी पटाखों पर तो कभी किसानों की पराली पर प्रदूषण का दोष मढ़ दिया जाता है। लेकिन अभी न तो पटाखे चल रहे हैं और न पराली जलाई जा रही है फिर भी एक्यूआई चार सौ के करीब है।

ये दो प्रतिनिधि घटनाएं हैं, जो बताती हैं कि भारत में प्रकृति कम आपदा पैदा कर रही है और व्यवस्था ज्यादा आपदा पैदा कर रही है।

जहरीला पानी व्यवस्था से उपजी आपदा है तो दिल्ली का प्रदूषण भी व्यवस्था की वजह से है। गाड़ियों के अंधाधुंध रजिस्ट्रेशन हो रहे हैं। सड़क पर चलने की जगह नहीं है और न किसी के पास गाड़ी खड़ी करने की जगह है। लेकिन गाड़ियां निकल रही हैं और उनके धुएं से देश की हवा प्रदूषित हो रही है। सब्सिडी के बाद भी ईवी गाड़ियों की संख्या नहीं बढ़ रही है लेकिन जीएसटी में कटौती हुई तो पेट्रोल और डीजल गाड़ियों की बेतहाशा बिक्री हुई। देश के अलग अलग हिस्सों में हर साल बारिश के साथ भूस्खलन और हिमस्खलन की घटनाएं हो रही हैं तो यह भी प्रकृति से ज्यादा मानवीय आपदा है। उत्तराखंड में टिहरी में पानी रोकने से बादल फटने की घटनाएं बढ़ी हैं तो पहाड़ों में अंधाधुंध निर्माण और जंगलों की कटाई ने पहाड़ों को कमजोर किया है। दशकों से नदियों की सफाई नहीं होने से सभी नदियों में गाद जमी है, जिसकी वजह से नदियों में बारिश का पानी नहीं रूकता है और बाढ़ आती है।

भारत की भीड़ किस तरह से कुव्यवस्था की गुलाम है इसका सबूत पिछले दिनों मिला, जब इंडिगो का संकट खड़ा हुआ। एक निजी कंपनी ने सरकार के आदेश का पालन नहीं करने का फैसला किया। उसने जरूरी संख्या में पायलट नहीं भरती किए और जब ड्यूटी के नए नियम लागू हुए तो उसने उड़ानें रद्द करनी शुरू की। उसने एक दिन में एक एक हजार उड़ानें रद्द की। पैसे और रसूख वाले लोग हवाईअड्डों पर भेड़ बकरियों की तरह घूम रहे थे। हजारों लोगों परिवार के साथ कई कई दिन तक हवाईअड्डों पर फंसे रहे तो हजारों लोगों के बैगेज कई दिनों तक नहीं मिले। नागरिक असहाय तो सरकार भी असहाय। सरकार ने कहा कि उड़ानों में 10 फीसदी कटौती करो तो अब खबर आई है कि कंपनी ने किसी बिजी रूट में उड़ानों में कटौती नहीं की है। उसने ऐसे रूट्स में कटौती कर दी, जिसमें यात्री कम होते थे और विमानन कंपनी को घाटा होता था। सोचें, उसने आपदा को कमाई का अवसर बना लिया।

वैसे तो यह संकट एक विमानन कंपनी का था लेकिन पूरी सर्दी सभी विमानन कंपनियों के उड़ानों में देरी हुई क्योंकि भारत के पास कोहरे में विमान लैंड कराने या टेकऑफ कराने की पर्याप्त तकनीक और प्रशिक्षित पायलट नहीं हैं। कोहरे की वजह से ट्रेनें लेट चल रही हैं तो उड़ानों में भी देरी हो रही है। एक्सप्रेस वे पर कोहरे के कारण दुर्घटना हो रही है। गाड़ियां भिड़ रही हैं और उनमें आग लगने से लोगों की मौत हो रही है। कुल मिला कर देश में सामान्य नागरिक सुविधाएं नहीं हैं और लोगों को अपनी जान और सामान की रक्षा स्वंय करनी है। नागरिकों को अपने आप को व्यवस्था से बचाना है। व्यवस्था उन्हें मारने की पूरी कोशिश करेगी।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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