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चुनावी जीत ही काम, मुश्किलों का हल!

प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के लिए 2025 का साल कई तरह की मुश्किलों वाला था। कह सकते हैं कि सबसे ज्यादा मुश्किल वाला था। क्योंकि इस वर्ष मोदी का विश्वगुरू होने का तिलिस्म टूटा।  भारत को सबसे ज्यादा सुरक्षित बना देने या पाकिस्तान को घुटनों पर ला देने की धारणा भी टूटी। आर्थिक अस्थिरता के कारण विकास का नैरेटिव भी प्रभावित हुआ। लेकिन भाजपा और नरेंद्र मोदी, अमित शाह के लिए इन तमाम मुश्किलों का हल चुनावी जीत में है। उनको लगता है कि अगर चुनाव जीत गए तो सारी मुश्किलों से लोगों का ध्यान हट जाएगा। तभी 2025 में हुए दोनों चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने ऐड़ी चोटी का जोर लगाया। सवाल है क्या दिल्ली और बिहार की जीत ने मुश्किलें आसान हुई?

हो सकता है कि भाजपा के नेता और मोदी, शाह ऐसा सोचते हों लेकिन कश्मीर के पहलगाम में जो घाव लगा वह चुनावी जीत से नहीं भरने वाला है। अनुच्छेद 370 हटाने के बाद जम्मू कश्मीर में सब कुछ ठीक हो जाने की जो धारणा बनाई गई थी वह बुरी तरह से प्रभावित हुई है। पर्यटकों की संख्या घटी है तो आंख मूंद कर मोदी की बात पर विश्वास करने वालों का आत्मविश्वास भी घटा है। उससे भी ज्यादा नुकसान ऑपरेशन सिंदूर के बाद हुआ है। भारत सरकार ने सेना के अधिकारियों को आगे करके, उनकी रील्स बनवा कर, उनसे प्रेस कॉन्फ्रेंस करा कर देश के लोगों को भरोसा दिलाने का प्रयास किया। मतलब ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान की कमर तोड़ दी है। लेकिन इसके समानांतर दूसरा नैरेटिव भी चला, जिसका जवाब नहीं दिया जा सका। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सौ बार कहा कि उन्होंने टैरिफ की धमकी देकर और व्यापार रोकने की धमकी देकर भारत और पाकिस्तान को युद्ध रोकने के लिए तैयार किया।

दस मई को जिस अंदाज में सीजफायर हुआ और उसकी जैसे ही पहले ट्रंप ने घोषणा की तो भाजपा के अपने समर्थक भी भड़के। उनका कहना था कि जब भारत की सेना जीत रही थी तो फिर अचानक युद्ध क्यों रोक दिया गया? इस सवाल का जो जवाब दिया गया वह बहुत लचर था। ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और वहां के सेना प्रमुख को अपने यहां बुला कर जो सम्मान दिया उससे भी पाकिस्तान का कद बढ़ा। इसके उलट मोदी की ट्रंप से फोन पर बात होती रही। परंतु दोनों अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नहीं मिले। जी 7 में मोदी के पहुंचने से पहले ट्रंप चले गए तो आसियान मे ट्रंप आए तो मोदी नहीं गए। भारत ने नैरेटिव बनाने के लिए अपने सांसदों और राजनयिकों की टीम दुनिया भर में भेजी लेकिन उससे क्या हासिल हुआ, उसका कुछ पता नहीं है। साल का अंत आते आते राजधानी दिल्ली में लाल किले के सामने एक कार विस्फोट हुआ, जिसमें कई लोग मारे गए। यह आतंकवादी कार्रवाई थी। कार विस्फोट के बाद दिल्ली से फरीदाबाद, लखनऊ, हैदराबाद और देश के दूसरे हिस्सों में बड़े आतंकी नेटवर्क का खुलासा हुआ। वह देश की खुफिया एजेंसियों की प्रत्यक्ष विफलता थी।

जुलाई में राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत के ऊपर 50 फीसदी टैरिफ लगाया। 25 फीसदी टैरिफ भारत के उत्पादों पर कारोबारी लिहाज से तो 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ इसलिए लगाया क्योंकि भारत कच्चा तेल रूस से खरीद रहा है। यह जुर्माना है, जो अमेरिका ने लगाया है। सोचें, क्या विश्वगुरू के ऊपर कोई जुर्माना लगा सकता है! लेकिन जुर्माना लगा और अभी तक लगा हुआ है। हैरानी की बात है कि रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीद कर कमाई निजी कंपनियों रिलायंस और नायरा एनर्जा ने की है। मगर कीमत पूरा देश चुका रहा है। ध्यान रहे रिलायंस और नायरा एनर्जी या भारत की सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों के सस्ता तेल खरीदने का कोई लाभ भारत के लोगों को नहीं मिला क्योंकि पेट्रोल और डीजल की कीमतें पहले जैसी ऊंची बनी रहीं। सो, पहलगाम, ऑपरेशन सिंदूर और ट्रंप के लगाए टैरिफ ने भारत के विश्वगुरू होने की धारणा को बुरी तरह से प्रभावित किया। भारत के लोग रील बना कर अमेरिका को कहते रहें कि तू क्या है लेकिन उसने सामरिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर भारत को अलग थलग किया। ट्रंप ने भारत के विश्वगुरू होने की इमेज को वीजा नियमों से भी डैमेज किया। उन्होंने वीजा लगभग बंद कर दिया। अवैध रूप से अमेरिका में रह रहे भारतीयों को तो निकाला ही वैध रूप से अमेरिका जाने वालों की संख्या भी बहुत सीमित कर दी। वीजा फीस बढ़ाई सो अलग।

अमेरिकी टैरिफ का असर यह हुआ कि दुनिया के संस्थागत निवेशक लगातार भारत से पैसा निकालते रहे। इसका शेयर बाजार पर प्रभाव पड़ा। शेयर बाजार पूरे साल 82 से 85 हजार के बीच झूलता रहा। एक रिपोर्ट के मुताबिक 90 फीसदी से ज्यादा शेयरों में गिरावट रही। इसका मतलब है कि खुदरा निवेशकों को बड़ा नुकसान हुआ। उधर रुपए की कीमत लगातार गिरती गई। इसकी वजह से भारत का आयात बिल बढ़ रहा है और पढ़ने, घूमने के लिए विदेश जाने वालों का खर्च बढ़ रहा है। मनमोहन सिंह के समय रुपए की कीमत को प्रधानमंत्री की उम्र से जोड़ कर आलोचना करने वाले नरेंद्र मोदी की सरकार के आर्थिक जानकार रुपए की कीमत गिरने को अब अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा बताने में लगे हैं। साल खत्म होने से पहले यह खबर भी आई कि भारत का पासपोर्ट विश्व रैंकिंग में पांच स्थान और गिर गया है। पहले भारतीय पासपोर्ट दुनिया में 80वें स्थान पर था और अब गिर कर 85वें स्थान पर पहुंच गया है। माना जा रहा है कि अफ्रीका और एशिया के कुछ देशों ने अपनी स्थिति बेहतर की है, जिससे भारत का स्थान नीचे गया है।

इन सारी समस्याओं का समाधान क्या है?  चुनाव जीतना। वे चुनाव जीत कर सबका मुंह बंद करना।  मीडिया और सोशल मीडिया में बिहार की जीत को इसी रूप में प्रस्तुत किया गया, जैसे सब ठीक है और देश की जनता का पूरा भरोसा भाजपा और सरकार के ऊपर बना हुआ है। अब इसके बाद पश्चिम बंगाल, असम से लेकर तमिलनाडु और केरल तक चुनाव जीतने के प्रयास होंगे। प्रचार के घोड़े खुल गए हैं। प्रधानमंत्री के दौरे और हजारों करोड़ रुपए की योजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन शुरू हो गया है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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