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नवदुर्गाओं में प्रथम स्वरूप — माता शैलपुत्री

सनातन धर्म

माता शैलपुत्री का स्वरूप केवल एक देवी की छवि नहीं है, बल्कि यह अडिग संकल्प, धैर्य और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है। नवरात्र के पहले दिन उनकी पूजा से साधक अपनी साधना की शुरुआत मूलाधार चक्र से करता है। उनके अस्तित्व की जड़ें उनके पिछले जन्म से जुड़ी हैं।

19 मार्च-नवरात्र प्रथम दिवस

वासन्तीय और शारदीय नवरात्र में माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इन्हें नवदुर्गा कहा जाता है और नवरात्र के हर दिन एक-एक रूप की आराधना होती है। पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा का विधान है। पौराणिक मान्यता के अनुसार वे पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं, इसलिए उन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल धारण किए, बैल पर सवार माता शैलपुत्री शक्ति, स्थिरता, शांति और नई शुरुआत का प्रतीक मानी जाती हैं। उनका स्वरूप सरल और प्रभावशाली है, जिसमें गहरे आध्यात्मिक संकेत छिपे हैं। वे वृषभ पर विराजमान हैं, जो धर्म और अनुशासन का प्रतीक है। यह बताता है कि शक्ति को संतुलित और मर्यादित होना चाहिए। उनके दाहिने हाथ का त्रिशूल तीन गुणों—सत्व, रज, तम—और तीन प्रकार के कष्टों—दैविक, दैहिक और भौतिक—पर नियंत्रण का संकेत है। बाएं हाथ का कमल यह सिखाता है कि जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी पवित्रता और शांति बनाए रखनी चाहिए। उन्हें चमेली का फूल प्रिय माना जाता है।

नवरात्र के पहले दिन, चैत्र और आश्विन माह की शुक्ल प्रतिपदा को, कलश स्थापना के बाद माता शैलपुत्री का विशेष पूजन किया जाता है। उनका प्रार्थना मंत्र है—

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।

मान्यता है कि पहले दिन सफेद कपड़े में चावल और मिश्री बांधकर “ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः” का जप करने से घर में सुख और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।

माता शैलपुत्री का स्वरूप केवल एक देवी की छवि नहीं है, बल्कि यह अडिग संकल्प, धैर्य और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है। नवरात्र के पहले दिन उनकी पूजा से साधक अपनी साधना की शुरुआत मूलाधार चक्र से करता है। उनके अस्तित्व की जड़ें उनके पिछले जन्म से जुड़ी हैं। पौराणिक कथा के अनुसार वे पहले जन्म में राजा दक्ष की पुत्री सती थीं और उनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। एक बार राजा दक्ष ने एक बड़ा यज्ञ किया, जिसमें उन्होंने सभी देवताओं को बुलाया, लेकिन शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया। सती बिना बुलाए वहां पहुंचीं, जहां उनके पिता ने शिव का अपमान किया। यह अपमान सहन न कर पाने के कारण सती ने योगाग्नि से अपना शरीर त्याग दिया और संकल्प लिया कि वे अगले जन्म में भी शिव को ही पति रूप में प्राप्त करेंगी।

इसके बाद उन्होंने हिमालय और माता मैना के घर जन्म लिया और शैलपुत्री कहलायीं। उन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तप किया। उनकी भक्ति और दृढ़ संकल्प से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें पुनः पत्नी रूप में स्वीकार किया। इस प्रकार शैलपुत्री का स्वरूप धैर्य, विश्वास और संकल्प की शक्ति का प्रतीक बन गया। हिमालय की पुत्री होने के कारण वे पार्वती और हैमवती भी कहलाती हैं। यह कथा सिखाती है कि यदि मनुष्य का संकल्प पर्वत की तरह अडिग हो, तो वह कठिन से कठिन लक्ष्य प्राप्त कर सकता है। शैलपुत्री वह आधार हैं, जहां से साधक की आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है।

योग में माता शैलपुत्री का संबंध मूलाधार चक्र से माना जाता है, जो शरीर का आधार और ऊर्जा का केंद्र है। यह चक्र रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में स्थित होता है और चेतना का आधार है। उनकी साधना से यह चक्र जागृत होता है, जिससे जीवन में स्थिरता, साहस और आत्मविश्वास बढ़ता है। मन शांत होता है, एकाग्रता बढ़ती है और भय कम होता है। यह साधना पाचन तंत्र और हड्डियों की मजबूती के लिए भी लाभकारी मानी जाती है। कुण्डलिनी जागरण की यात्रा का पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम यही है। जैसे हिमालय धरती का आधार है, वैसे ही शैलपुत्री साधक के भीतर आध्यात्मिक आधार मजबूत करती हैं।

केन उपनिषद के एक प्रसंग में देवताओं के अहंकार को तोड़ने के लिए यक्ष प्रकट होते हैं। जब इंद्र उस परम शक्ति को नहीं पहचान पाते, तब स्वर्णमयी आभा वाली देवी हैमवती प्रकट होकर उन्हें बताती हैं कि सारी शक्ति परम ब्रह्म की है। इससे स्पष्ट होता है कि शैलपुत्री ब्रह्मज्ञान की दात्री हैं। मान्यता है कि निष्काम भाव से उनकी पूजा करने से चंद्र दोष दूर होता है, क्योंकि उनके मस्तक पर अर्द्धचंद्र सुशोभित है। इससे दांपत्य जीवन में स्थिरता आती है और मन की इच्छा शक्ति बढ़ती है। एक कथा के अनुसार जब चंद्रमा को दक्ष के श्राप से क्षय रोग हुआ, तब शिव ने उसे अपने मस्तक पर स्थान दिया। शैलपुत्री शिव की शक्ति हैं, इसलिए वे भी चंद्र को धारण कर संसार को शीतलता देती हैं।

दुर्गा सप्तशती के अनुसार माता शैलपुत्री का संबंध औषधि जगत में हरड़ से माना गया है। आयुर्वेद में हरड़ को जीवन देने वाली और रोगों पर विजय दिलाने वाली कहा गया है। यह मुख्य रूप से हिमालय क्षेत्र में पाई जाती है, जैसे शैलपुत्री हिमालय की पुत्री हैं। हरड़ शरीर के दोषों को दूर कर उसे स्वस्थ रखती है। इसके सात प्रकार बताए गए हैं—विजया, रोहिणी, पूतना, अमृता, अभया, जीवंती और चेतकी—जो जीवन के अलग-अलग पक्षों को संतुलित करते हैं। यह वात, पित्त और कफ तीनों दोषों को संतुलित करती है। शैलपुत्री का संबंध चंद्रमा से है, जो मन का कारक है, और हरड़ शरीर को शुद्ध कर मन को शांत रखने में मदद करती है। नवरात्र के पहले दिन माता को गाय का घी अर्पित किया जाता है, और आयुर्वेद में हरड़ को घी के साथ लेना लाभकारी माना गया है।

वाराणसी के जलालपुरा क्षेत्र में स्थित माता शैलपुत्री का प्राचीन मंदिर उनके पहले स्वरूप का प्रमुख स्थान माना जाता है। काशी में नवदुर्गा के नौ प्राचीन मंदिर हैं। मान्यता है कि हिमालय से शिव से मिलने आते समय माता शैलपुत्री यहां रुकी थीं और यहीं उन्होंने तप किया था। इस मंदिर में माता की प्रतिमा पत्थर की है, जो बहुत प्राचीन और शांत स्वरूप में है। भक्त यहां चमेली का तेल और सिंदूर चढ़ाते हैं। इस मंदिर के दर्शन से आरोग्य और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

By अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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