आधुनिक समय में ‘देशज’ हिंदू राजनीति के तीन प्रयोगधर्मी (विचारक?) हुए- गांधी, सावरकर और लोहिया। इन तीनों ने वे सूत्र, वे प्रयोग दिए, जिससे हिंदुओं को भक्ति की तीन नई मूर्तियाँ मिलीं। 1947 के बाद गांधी के नेहरू ने अपने प्रयोग किए। नेहरूवादी पैदा हुए। वही सावरकर के भक्तों ने हवा में लाठी घुमाते हुए भय, भक्ति, भूख की भीड़ बनाना शुरू किया। एक तरफ नेहरूवादी, दूसरी तरफ हिंदुवादी (धर्मनिरपेक्ष बनाम सांप्रदायिक)।
और फिर इन दो धुरियों के बीच अचानक लड़ाकू तेवर के साथ डॉ. राममनोहर लोहिया उभरे। उनके जमीनी सूत्रों-नारों ने समाज में ऐसी हलचल बनाई, जिसके आगे गांधीवादी निरुत्तर थे तो हिंदुवादी भी मात्र हवा में लाठी भांजते थे। लोहिया के ही जुमलों ने वह मंडल-कमंडल बनाया कि समाज छिन्न-भिन्न हुआ। बुद्धि, विवेक सब छोड़ लोग पहचान (जाति, उपजाति, खाप) की भीड़ में कनवर्ट होने लगे।
और अंत परिणाम? लोहियावादी भी वैसे ही बेमतलब है जैसे नेहरूवादी, गांधीवादी, मार्क्सवादी, माओवादी आदि भक्त समूहों का विसर्जन है। सवाल है तब 140 करोड़ लोगों का मालिक कौन? सावरकर के वे हिंदुवादी जो लाठी भांजने, हांकने की सौ वर्षों से ट्रेनिंग लेते-लेते डफरों के विश्वगुरू हैं।
निश्चित ही इस ट्रेनिंग का प्रतीकमान चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। वे प्रधानमंत्री मोदी, जिन्होंने फरवरी 2026 में नई दिल्ली के भारत मंडपम से दुनिया को आह्वान किया कि स्वागत है आप द्वारा बनाई कृत्रिम बुद्धिमत्ता (सौ प्रतिशत अमेरिका या उनकी कंपनियों की मौलिक बुद्धि से निर्मित उत्पाद) का। भारत इसमें अपना भाग्य मानता है (India sees fortune in AI)।
और इस कॉलम को लिखते हुए खबर है कि अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने के लिए भारत को 30 दिन की छूट दी। और अमेरिका की अनुमति प्राप्त हुई नहीं कि भक्त भीड़ का सोशल मीडिया ‘अमेरिका से अनुमति’ की वाह करते हुए है।
मैं तभी ऐसी घड़ी में लोहिया और लोहिया के लोगों की स्मृति में नीतीश कुमार पर सोच रहा हूं। किस मनोदशा के पर्याय हैं नीतीश कुमार? इसलिए क्योंकि लोहिया की देशज राजनीति, जुमलों (या क्रांति) की प्रयोगशाला रहा है बिहार। लोहिया के मंडल चेहरे हों या भगवा चेहरे (सावरकर की सेंट्रल हॉल में तस्वीर के निर्णय के साझेदार जॉर्ज फर्नांडिस से हुकुमदेव नारायण यादव तक), सभी की यानी तमाम तरह के समाजवादियों की कर्मभूमि बिहार रही है। बिहार में कांग्रेस का शासन मुश्किल से चालीस वर्ष रहा। बाकी समय बिहार आइडिया ऑफ लोहिया की प्रयोगशाला रहा।
कर्पूरी ठाकुर 1967 में मुख्यमंत्री बने थे। मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडिस से लेकर मंडल रिपोर्ट लिखने वाले बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल यहीं चुनाव जीतते रहे हैं। तभी सवाल है कि मंडल रिपोर्ट को लागू कराने की अधिसूचना जारी करवाने वाले शरद यादव, रामविलास पासवान हों या बिहार में 35 वर्षों से उसे लागू कराते लालू यादव, राबड़ी देवी तथा नीतीश कुमार के चेहरों से बिहार कैसा रचा है? ध्यान रहे नीतीश राज ही कोई बीस साल पुराना है।
और लोहियावाद की इतनी लंबी देशज राजनीति के आइडिया की कुल बिहार प्राप्ति, उत्पादकता क्या है? एक वाक्य में जवाब है, खंडहर और मजदूर! तभी नीतीश कुमार की रिटायरी के साथ अब दिखलाई दे रहा है कि बिहार हर तरह से लाठीधारी डफर जमात का सुरक्षित गढ़ हो गया है।
जबकि इस भूमि से, लोहियावादी विरासत की क्या उम्मीद होनी चाहिए थी? लोग कैसे तैयार होने थे? स्वाभिमानी, स्वदेशी, लड़ाकू-खुराफाती। मगर लोहियावादी बिहार में अब वह आबोहवा है, वह खंडहर है जो पिछले तीस वर्षों से जॉर्ज फर्नांडिस से लेकर नीतीश कुमार के मुंह से कभी भी कहने को भी, स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार (याद करें कभी जॉर्ज फर्नांडिस ने देसाई सरकार में कोका-कोला, आईबीएम कंपनियों को भारत से खदेड़ा था) के जुमले नहीं सुने गए!
उलटे हुआ क्या? पुराने नामी रहे विश्वविद्यालय भी चौपट हुए। नालंदा की नकल और जुगाड़ जैसी शिक्षा व्यवस्था बनी। सो, बुद्धि चौपट और स्वाभिमानी आबादी का भक्ति तथा मजदूर भीड़ में कनवर्ट होना।
इसलिए सोचें, नीतीश कुमार और लोहियावादी चेहरों पर तो गांधी, सावरकर, लोहिया के भारत के ऐसे हस्र पर भी!


