इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर 28 फरवरी को हमला किया उससे दो दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजराइल के दौरे पर गए थे, जहां उन्होंने इजराइल की संसद में भाषण दिया और बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार ने उनको सबसे बड़ा सम्मान दिया। लेकिन क्या नेतन्याहू ने मोदी को इस बात की जानकारी दी थी कि दो दिन के बाद उनका देश ईरान पर हमला करने जा रहा है और भारत को इसके लिए तैयारी करनी चाहिए? ऐसा लग रहा है कि इजराइल ने मोदी को ऐसी कोई जानकारी नहीं दी तभी हमले के तुरंत बाद भारत में अफरातफरी मची। चारों तक एलपीजी के लिए हाहाकार मच गया।
इतना ही नहीं सीएनजी और पेट्रोल, डीजल के लिए भी कई जगह कतारें लगने लगीं। यह बात जापान की प्रधानमंत्री से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बातचीत से भी सामने आई। जापान की प्रधानमंत्री शाने तकाइची ने राष्ट्रपति ट्रंप से कहा कि उन्होंने सहयोगियों को इस हमले की पहले से जानकारी नहीं दी तो ट्रंप ने दूसरे विश्वयुद्ध में जापान की ओर से पर्ल हार्बर पर किए गए हमले की ओर इशारा करते हुए कहा कि जापान से ज्यादा सरप्राइज कौन दे सकता है! इससे जाहिर है कि अमेरिका और इजराइल ने किसी सहयोगी या मित्र देश को इसकी जानकारी नहीं दी थी।
बहरहाल, भारत में कच्चे तेल का संकट तत्काल नहीं पैदा हो रहा है क्योंकि उसके भंडारण की व्यवस्था है। मोटे तौर पर दो महीने की जरुरत का तेल स्टोर में रहता है। लेकिन वह स्ट्रेटेजिक महत्व का तेल होता है। फिर भी तेल का संकट निकट भविष्य में होता नहीं दिख रहा है क्योंकि अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने की छूट दे दी है और खुद अमेरिका ने भारत को ज्यादा तेल बेचना शुरू कर दिया है। सो, भारत की तेल खरीद में विविधता आई है, जिससे तेल का संकट शायद नहीं होगा। मगर महंगाई बढ़ेगी, इसमें संदेह नहीं है। पूरी दुनिया में कच्चे तेल की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा हो गई है। लेकिन इंडियन बास्केट की बात करें तो कच्चे तेल की कीमत 140 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा हो गई है। इसका असर भारत में आने वाले दिनों में तेल की कीमतों पर दिखेगा।
इससे बड़ा संकट प्राकृतिक गैस का होगा। असल में भारत में प्राकृतिक गैस के स्टोरेज की सुविधा नहीं है। भारत में प्राकृतिक गैस स्टोरेज क्षमता मोटे तौर पर तीन हफ्ते की है। 21 से 22 दिन के लिए जरूरी गैस भारत के पास स्टोर में रहती है। इसमें भारत के करीब एक दर्जन टर्मिनल की क्षमता भी शामिल है और साथ ही ट्रांजिट वाला गैस भी शामिल है। यानी जो रास्ते में होता है उसे भी इसमें शामिल माना जाता है। सबको शामिल करके कुल भंडारण क्षमता 19 लाख टन बताई जाती है। ध्यान रहे भारत में रसोई गैस का एक दिन का खर्च 80 हजार टन का है। इसके लिए सिर्फ दो स्टोरेज हैं। एक मेंगलुरू में और दूसरा विशाखापत्तनम में।
इन दोनों की क्षमता एक लाख 40 हजार टन की है। यानी दो दिन से भी कम का भंडारण है। इस लिहाज से भारत में गैस स्टोरेज को जस्ट इन टाइम सिस्टम के तौर पर देखा जाता है। इसका मतलब है कि अगर आपूर्ति लगातार चलती रही तभी भारत में सब कुछ सामान्य रूप से चलेगा। आपूर्ति शृंखला प्रभावित होगी तो भारत में भी गैस की आपूर्ति प्रभावित होगी। तभी भारत में पेट्रोल और डीजल को लेकर ज्यादा आपाधापी नहीं मची लेकिन एलपीजी सिलेंडर की समस्या बढ़ गई। सरकार ने भी कई दिन तक कॉमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई बंद की। अब ऐसा लग रहा है कि एलपीजी के साथ साथ सीएनजी को लेकर भी समस्या खड़ी होगी। कई राज्यों से ऐसी खबर आ रही है कि लोग सीएनजी के लिए घंटों लाइन में लग रहे हैं।
दूसरी तरफ पश्चिम एशिया में जंग और बढ़ गई है। इजराइल ने ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमला किया तो ईरान ने कतर की सबसे बड़ी गैस फैसिलिटी पर हमला किया। उसने रास लफान रिफाइनरी को निशाना बनाया। ध्यान रहे कतर दुनिया में सबसे ज्यादा प्राकृतिक गैस की आपूर्ति करता है। ईरान की ओर से कतर के साथ साथ सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के ऊर्जा ठिकानों पर हमला करने से तेल और प्राकृतिक गैस का उत्पादन प्रभावित हुआ है। होरमुज की खाड़ी बंद होने से पहले ही आपूर्ति शृंखला प्रभावित है। अब उत्पादन भी कम हुआ है और सप्लाई चेन टूटी है।
कतर एनर्जी के सीईओ ने कहा है कि कतर की गैस आपूर्ति अगले पांच साल तक सामान्य से 17 फीसदी कम रहेगी। भारत अब अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से गैस खरीद रहा है और अपने देश में भी उत्पादन में 28 फीसदी तक की बढ़ोतरी की गई है। ध्यान रहे भारत अपने जरुरत की 60 फीसदी गैस आयात करता है और 40 फीसदी खुद तैयार करता है। अगर इसमें 28 फीसदी बढ़ोतरी होगी तब भी भारत के घरेलू उत्पादन 50 फीसदी पहुंचेगा। इसका मतलब है कि 50 फीसदी गैस के लिए भारत को दूसरे देशों पर निर्भर रहना होगा। गैस की किल्लत से प्लास्टिक, उर्वरक जैसी और भी कई चीजों का उत्पादन प्रभावित होना है।


