कभी वैश्विक आर्थिकी में ‘बनाना (केला) रिपब्लिक’ जुमला था। मतलब ऐसे देश जिनकी गुजर केले या कॉफी जैसे कृषि उत्पाद के निर्यात से होती थी। पर वैसे देश (दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका के) अब बेहतर हुए हैं तो यह जुमला आउटडेटेड है। इसकी जगह दुनिया का, खासकर ट्रंप, यूरोपीय संघ, चीन-खाड़ी, ऑस्ट्रेलिया सभी देशों का ध्यान अपने भारत पर, याकि मोदीजी के “पकौड़ा-चाय-ठेला मॉडल” पर केंद्रित है।
ट्रंप की जिद है कि 145 करोड़ लोगों के राशन, पकौड़े, बेसन, तेल की सप्लाई अमेरिका करेगा। पहले भारत हमसे चना-सोया-मक्का-गेहूं खरीदे। तब हम तेल देंगे, गैस भी देंगे। ऐसा ही लक्ष्य यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन का भी है। रूप अलग है पर सब भारत को वह पकौड़ा, भुजिया, नमकीन बाजार मानते हैं जिसके साथ फ्रांस की वाइन बिक सकती है तो ब्रिटेन की व्हिस्की की खपत भी संभव है!
इस विश्व दृष्टि को मोदीजी ने बहुत पहले अडानी-अंबानियों की संगत में समझ लिया था। तभी उनके बारह वर्षों में रिकार्ड तोड़ पकौडे-समोसे-मेमोज के ठेले रोजगार विकसित हुए। वही शराब के ठेके भी बेइंतहा खुल। भारत में लोकजीवन मानों बेचने की क्रिया में कन्वर्ट है। जब बेचना, एक-दूसरे को टोपी पहनाना ही राष्ट्रीय उद्यमिता है और उसके राष्ट्रीय गौरव क्योंकि अडानी-अंबानी हैं तो भला वैश्विक व्यापारी क्यों पीछे रहें! दुनिया भारत में बेचने को तुली हुई है तो भारत भी पीछे नहीं। वह भी अपने को बेचने में तुला हुआ है। कभी रूस के आगे, कभी चीन के आगे तो कभी अमेरिका के आगे, आज ताजा खबर थी ईरान के आगे घिघिया रहे है।
प्रधानमंत्री मोदी ने बारह साल पहले वादा किया था कि मैं चाय वाला, चाय पर चर्चा करके, वोट ले रहा रहा हूं तो मेरी गारंटी है मैं विश्व नेताओं को चाय पिलाकर भारत को विश्व गुरु बनाऊंगा। तभी प्रधानमंत्री पद की शपथ के पहले ही दिन उन्होंने पड़ोसी देशों के राष्ट्रप्रमुखों को बुलाया, हैदराबाद भवन में चाय पिलाई। फिर बराक ओबामा को भी बुलाया, उनसे तू-तड़ाके की दोस्ती दिखलाते हुए चाय पिलाई, पकौड़ा खिलाया। गले पड़ने की कूटनीति का नया कीर्तिमान बना। इतना ही नहीं, फिर एक दिन प्रधानमंत्री अचानक लाहौर गए और नवाज शरीफ के साथ चाय-पकौड़ा डिप्लोमेसी की।
सो विश्व कूटनीति, विश्व गुरु, विश्व आर्थिकी के मोदी जब ऐसे मसीहा है तो स्वभाविक जो भारत के भक्त लोग उनके पीछे झूमते-नाचते हुए। सभी तरफ अच्छे दिन। शेयर बाजार, रोजगार बाजार, आईटी बाजार में धूम। नतीजतन जिधर देखो उधर “पकौड़ा-चाय-ठेला मॉडल”! मतलब रोजाना की मेहनत, मजदूरी से हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा आए अंदाज में तुरत कमाई। सो लोगों ने ठेले लगाए, कर्ज लिया या सट्टा केला और स्वरोजगार!
इससे श्रम बाजार की शक्ल बदली। काम कम और बेगारी अधिक की पहचान। तभी भारत के इंजीनियर हों या बढ़ई, सभी को लेकर वैश्विक कंपनियों, संगठित कारखानों, कंपनियों की अब यह प्रमुख समस्या है कि सभी तरह के मजदूर हुनर, काबिलियत, लगन, मेहनत में कोरे!


