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सीएम ऐसा हो जो गति से काम करें

दक्षिण भारत के पांचों राज्यों में अलग अलग विचारधारा वाली पार्टियां मजबूत हैं। ये पार्टियां लगातार सत्ता में भी रही हैं। भारतीय जनता पार्टी ने भी कम से एक राज्य का कोड क्रैक किया और कर्नाटक में सरकार बनाई। हालांकि कांग्रेस का आधार उससे ज्यादा मजबूत रहा। अब तो कांग्रेस की तीन राज्यों में सरकार बन गई। लेकिन कांग्रेस ने भी नेता चुनने में इस बात का ध्यान रखा कि काम करने वाला मुख्यमंत्री हो। ऐसा मुख्यमंत्री, जो नतीजे दे सकता हो और इन राज्यों में विकास की जो गति चलती है उस गति से काम कर सके। सोचें, भाजपा दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को मुख्यमंत्री बना देती है, इस बात की बहुत चर्चा होती है लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस ने जनता दल ये आए सिद्धारमैया को दूसरी बार सीएम बनाया है, इसकी चर्चा कम होती है। सिद्धारमैया ने पांच साल का एक कार्यकाल पूरा किया और दूसरे कार्यकाल का ढाई साल बीत चुका है।

पिछले दो दशक से ज्यादा समय से कर्नाटक की सत्ता कांग्रेस और भाजपा के बीच रोटेट हो रही है। बीच में जनता दल एस को भी मौका मिला लेकिन वह कांग्रेस के समर्थन से। लेकिन कामकाज की गति और दिशा में कोई अंतर नहीं आया। कर्नाटक उसी रफ्तार से विकास करता रहा। जनता दल से आए सिद्धारमैया ने अपनी समाजवादी विचारधारा की वजह से विकास को अवरूद्ध नहीं किया। वे चुनाव जिताने वाले समीकरण के प्रतिनिधि हैं लेकिन साथ ही विकास की गति कायम रखने वाले नेता भी हैं।

यही स्थिति तेलंगाना में है। नया राज्य कांग्रेस ने बनवाया था लेकिन राज्य बनने के 10 साल के बाद कांग्रेस को सत्ता मिली तो उसने राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से आए रेवंत रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाया। कहने की जरुरत नहीं है कि रेवंत रेड्डी ने आंध्र प्रदेश व तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों चंद्रबाबू नायडू, वाईएसआर रेड्डी, के चंद्रशेखर राव आदि की परंपरा में ही काम किया है। वे तेलंगाना में एक और नया शहर जोड़ ही रहे हैं। ऐसा नहीं है कि वे बसे बसाए शहरों के आसपास झुग्गियों की भीड़ बढ़ा रहे हैं या उन शहरों को नष्ट कर रहे हैं।

ऐसे ही केरल में वीएस अच्युतानंदन रहे हों या ओमन चांडी या पिनराई विजयन रहे हों या अब मुख्यमंत्री बने वीडी सतीशन हों। पहले तीन नेता बारी बारी से 30 साल से ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहे और विचारधारा या राजनीति का मतभेद चाहे जैसा रहा हो तीनों ने राज्य का विकास किया। उत्तर भारत के डबल इंजन सरकारों के मुकाबले कई गुना बेहतर काम इन राज्यों में हुआ, जहां सिंगल इंजन की सरकार थी।

तमिलनाडु में तो डीएमके और अन्ना डीएमके ने बारी बारी 60 साल तक राज किया लेकिन तमिलनाडु और वहां के लोगों के विकास से किसी ने समझौता नहीं किया। इन सभी दक्षिणी राज्यों में भी नेता भाषा और क्षेत्रीय भावना का इस्तेमाल राजनीति के लिए करते हैं। लेकिन चुनाव नतीजों के बाद वे इसे ठंडे बस्ते में रख देते हैं। उत्तर प्रदेश या गोबरपट्टी के दूसरे राज्यों की तरह सालों भर या चुनाव बाद भी पांच साल तक धर्म और जाति का मुद्दा नहीं गरमाए रखते हैं। वे पांच साल काम करते हैं। इसके उलट उत्तर भारत में काम की संस्कृति ही समाप्त हो गई है।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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