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काम के लिए नेताओं में होड़

यह बहुत दिलचस्प है कि दक्षिण भारत के पांचों राज्यों में कुछ समय पहले तक अलग अलग पार्टियों की सरकारें थे। अभी तो तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकार बन गई है। फिर भी पांच राज्यों में तीन पार्टियों की सरकार है। कुछ दिन पहले कर्नाटक में भाजपा, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस, तेलंगाना में बीएसआर, तमिलनाडु में डीएमके और केरल में वाम मोर्चा की सरकार थी। लेकिन पांचों पार्टियों की सरकारें राज्य के हित में काम करती थीं। अब भी कांग्रेस के अलावा एक राज्य में विजय की टीवीके आई है और एक राज्य में चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी की सरकार है। इन सरकारों के बीच आपसे में एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रहती है। दक्षिण भारत के राज्यों के हितों की रक्षा के लिए ये राज्य हमेशा एक रहते हैं। इनके बीच कई चीजों को लेकर विवाद भी है, जिसमें पानी एक जरूरी चीज है। इसके बावजूद इनमें अच्छा करने की होड़ है। सब एक दूसरे से बेहतर करना चाहते हैं।

इसे एक मिसाल से समझा जा सकता है। चंद्रबाबू नायडू ने 1999 से 2004 के बीच आंध्र प्रदेश को आईटी कैपिटल बनाने का अभियान शुरू किया था। हालांकि 2004 में वे चुनाव हार गए थे और फिर 2014 में सत्ता में लौटे थे। लेकिन नायडू ने हैदराबाद के पास एक ट्विन शहर बनाया, जहां दुनिया की सारी बड़ी आईटी और फिनटेक कंपनियों के दफ्तर बने। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के बीच इस बात की होड़ चलती रही कि भारत का सिलिकन वैली कौन बनेगा। ऐसा नहीं है कि भारत में आईटी के क्षेत्र में बड़े इनोवेशन हो रहे थे। लेकिन आईटी और आईटी आधारित सेवाओं की कंपनियों को फलने फूलने के लिए दोनों राज्यों ने भरपूर अवसर दिया। तभी बेंगलुरू और हैदराबाद व साइबराबाद भारत के आईटी विकास के इंजन बने।

अगर दूसरी मिसाल देखें तो चंद्रबाबू नाय़डू जब 2014 में वापस सत्ता में लौटे तो उन्होंने अमरावती को राजधानी के तौर पर विकसित करने का फैसला किया क्योंकि हैदराबाद तेलंगाना की राजधानी रहने वाली थी। उन्होंने आधुनिक सुविधाओं से लैस एक शानदार शहर बसाना शुरू किया। 2019 में जब वाईएसआर कांग्रेस सत्ता में आई तो जगन मोहन रेड्डी ने राजधानी के तौर पर पांच शहर विकसित करने का फैसला किया। इस पर काफी विवाद भी हुआ। अब फिर चंद्रबाबू नायडू सत्ता में हैं और वे राजधानी के तौर पर तो एक ही शहर बना रहे हैं। लेकिन उस अमरावती के अंदर नौ थीम सिटी उप शहर के रूप में बन रहे हैं तो 27 टाउनशिप बसाए जा रहे हैं। आंध्र प्रदेश में अमरावती हो या विजयवाड़ा हो या विशाखापत्तनम सारे शहरों का विकास हो रहा है। इनके अलावा भी नए शहर बन रहे हैं। नया शहर बसाने की ऐसी होड़ है कि तेलंगाना अब एक और नया शहर बसा रहा है। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने अपने कामकाज का इतिहास बनाने के लिए नया शहर बसाने का काम शुरू करा दिया है।

इस शहर के लिए मेट्रो की प्लानिंग है तो रेल और सड़क की सारी व्यवस्था पहले की जा रही है। विश्व स्तर का बुनियादी ढांचा बनेगा और इसके बन कर तैयार होने से पहले ही दुनिया की सारी कंपनियों ने यहां जगह ले ली है और वे अपना ढांचा विकसित कर रहे हैं। य़ह बेंगलुरू, हैदराबाद या साइबराबाद से बेहतर शहर होगा, ऐसा दावा किया जा रहा है। हैदराबाद से एक घंटे की ड्राइव की दूरी पर बन रहे इस शहर को भारत फ्यूचर सिटी कहा जा रहा है। फोर्थ सिटी भी कुछ लोग कह रहे हैं। इस शहर में एआई से लेकर सेमीकंडक्टर, ईवी व्हीकल, डेटा सेंटर आदि का वैश्विक हब बन रहा है। ट्रंप मीडिया एंड टेक्नोलॉजी सहित दुनिया की अनेक बड़े कंपनियों ने इस शहर में एक लाख करोड़ रुपए के निवेश का प्रस्ताव रखा है।

तमिलनाडु में कैसे हुंडई जैसी बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी से लेकर दूसरी तमाम कंपनियों ने अपना बेस बनाया वह भी एक मिसाल है। चेन्नई से निकलने के बाद सौ से दो सौ किलोमीटर के दायरे में उद्योगों का जाल बिछा है। औद्योगिक विकास के अलावा इन राज्यों ने एक सॉफ्ट पावर वाली छवि दुनिया भर में बनाई है। पिछले दिनों फिल्म स्टार विजय, जो अब मुख्यमंत्री बन गए हें, मलेशिया गए थे अपनी फिल्म का गाना रिलीज करने तो उनके कार्यक्रम में एक लाख लोग जुटे थे। सिंगापुर और मलेशिया में रजनीकांत की जैसी फैन फॉलोइंग है वह गजब है।

तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मलयाली फिल्म निर्देशकों, कलाकारों ने नए मानक बनाए हैं। उनकी फिल्में हिंदी सहित देश भर की भाषाओं में डब होकर रिलीज हो रही हैं और न सिर्फ पैसे कमा रही हैं, बल्कि तारीफ भी बटोर रही हैं। यह स्थिति सिर्फ फिल्म या टेलीविजन धारावाहिकों की नहीं है, बल्कि लेखन और कला के दूसरे स्वरूपों में भी है। अब भी हिंदी पट्टी के मुकाबले में इन राज्यों में ज्यादा साहित्य पढ़ा जाता है और साहित्यकारों व कलाकारों का ज्यादा सम्मान होता है। वे अपनी संस्कृति, अपनी भाषा और अपनी परंपराओं पर गर्व करते हैं और उसके संरक्षण के लिए काम करते हैं।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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