ईरान के सरेंडर या नेतन्याहू-ट्रंप के खुमैनी के आगे सरेंडर जैसी अनहोनी हो तो बात अलग है, अन्यथा आने वाले महीनों में प्रधानमंत्री मोदी के बारह साल पुराने “पकौड़ा-चाय-ठेला मॉडल” के बाजे बजने वाले हैं। उन्हे पकौडा म़ॉडल की जगह गुजराती फाफड़े के संगठित उत्पादन का राष्ट्रीय मिशन बनाना होगा। मतलब फाफड़ा राष्ट्रीय स्नैक घोषित हो। करोड़ों लोंगों की ठेले-रेहड़ी-खोमचे-गुमटियों-दुकानों की जगह भारतीय “उद्यमिता” के प्रतिमान अंबानी-अडानी की फाफड़ा फैक्ट्रीयां बनवाएं। ताकि गैस सिलेंडरों, गंदगी जैसे सकंटों से पिंड छूटे। राष्ट्रीय “उद्यमिता” की पैकेजिंग, ब्रांडिंग के फाफड़ों को भारत खाने लगे। कई फायदे है। ठेलों, गुमटियों की उस भीड़ से भारत मुक्त होगा, जो गैस के सिलेंडर की कमी में सीधे मोदी सरकार को कोसते हैं!
सवाल है देश की 160-170 करोड (2047 की अनुमानित आबादी) की आबादी के वे नब्बे प्रतिशत लोग तब क्या करेंगे जो आज के जैसे ही राशन-सबसिडी-खैरात पर जीवन जीते होंगे? जवाब के लिए दिमाग खपाने की जरूरत नहीं है। आखिर जब 2014 से 2026 में नोटबंदी, कोविड, जीएसटी और अब तेल-ईंधन के संकट से कुछ नहीं हुआ तो तब भी कुछ नहीं होगा। उलटे 2047 में संघ परिवार तब अपने को ब्रह्मांड गुरु बताने लगेगा।
मोदीजी ने भारत को कई तरह से गुरू बनाया है। “पकौड़ा-चाय-ठेला मॉडल” एक उदाहरण है तो मनरेगा से लेकर किसान को सम्मान राशि, महिलाओं को लाडली बहना राशि बांटने से ले कर नौजवानों को नौकरी पत्र थमाने के समारोह भला दुनिया में कहा होते है। भारत में होते है तो यह उनकी गुरूता है या नहीं?
सो यह भी गुरूता होगी कि “पकौड़ा-चाय-ठेला मॉडल” में खंपने के बजाय लोग घर-घर फाफड़ा बेचें।
सो यह व्यंग्य, मजाक नहीं है बल्कि मोदीजी के अच्छे दिनों का आखिरी मुकाम, मतलब विकसित भारत का असल विजन है!
बहरहाल, आगे सच्चाई का समय है। “पकौड़ा-चाय-ठेला मॉडल” के भी बुरे दिन है। ईश्वर न करे जो भारत की तेल-गैस सप्लाई पूरी खत्म हो। मगर हां, किल्लत होना, प्रति बैरल सवा सौ या डेढ़ सौ या दो सौ डॉलर कच्चे तेल की रेट तय है। इसका हर सिनेरियो “पकौड़ा-चाय-ठेला मॉडल” के पकौड़ा तलने वाले, ठेले-खोमचों से लेकर ड्राइवर, ई-रिक्शा, डिलीवरी बॉय से लेकर गांव-देहात-कस्बों के हर उस घर को रुलाएगा, जो गैस सिलेंडर से लेकर बिजली, बैटरी की महंगाई से जूझेगा।
ध्यान रहे मोदीजी का यह भी कीर्तिमान है जो बारह सालों में रुपया प्रति एक डॉलर साठ रुपए की रेट से अब 92 रुपये प्रति डालर है। यह जल्द सौ रुपये प्रति डॉलर पहुंचे तो आश्चर्य नहीं होगा। एक, खाडी में काम कर रहे भारतीय मजदूर वहा से पहले जितने डालर अपने विदेशी मुद्रा कोष में नहीं भेजने वाले। दो, वैश्विक सीन, एआई के भारी खतरे से आईटी कंपनियों की डॉलर कमाई भी घटनी है। तीन, लुढ़कते शेयर बाजार से अलग रुपया कमजोर होता हुआ है। इस सबका परिणाम वैश्विक तेल मंहगा और खरीदने वाला भारतीय रूपया बहुत कमजोर! 2014 में भारत 60 रू की वैल्यू का डालर देकर तेल खरीदता था अब 95 रू के डालर से 140 करोड़ लोगों के “पकौड़ा-चाय-ठेला मॉडल” की जरूरत की गैस, तेल खरीदना है। सोचे, तब ठेले का पकौड़ा, चाय कितनी महंगी होगी! सुरसा की तरह महंगाई बढ़ेगी!
पता है पकौड़ा के रोजगार (अनौपचारिक क्षेत्र) पर देश की श्रमशक्ति का कितना हिस्सा जिंदा है? लगभग 90–92 प्रतिशत लोग! महानगरों-शहरों, सड़क किनारे के ठेले-रेहड़ी-खोंमचों से सीधे 4 करोड़ लोगों की जिंदगी है। अनुमानों-अध्ययनों के अनुसार इन परिवारों को महीने में औसतन सात से बारह हजार रुपये की कमाई होती है। ऐसे अनौपचारिक क्षेत्र का भारत की कुल इकॉनोमी में 45 प्रतिशत हिस्सा है। अर्थात मोदीजी के चाय-पकौड़े के मंत्र से जनित विकसित भारत की जितनी हवाबाजी हैं, उसके कोर आंकड़े यानी चार ट्रिलियन की इकॉनोमी में 45 प्रतिशत तो सीधे “पकौड़ा-चाय-ठेला मॉडल” के योगदान से है।
इसी आबादी की कुल 140–145 करोड़ लोगों की तस्वीर में लगभग 125 करोड़ लोगों का पहिया सरकार की बांटी जा रही सबसिडी, चाय-पकौड़े के ठेलों या गिग वर्करों, घर-घर पकौड़ा पहुंचाते डिलीवरी लड़के-लड़कियों की है। बैटरी चालित स्कूटी, ई-रिक्शा आदि से चलते परिवार भी इसी का हिस्सा है। सो इन तमाम समस्याओं से निजात का क्या तरीका? गुजराती स्वाद, उद्यमिता का “फाफड़ा मॉडल”!


