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गैस नहीं तो कोयला है, नाले से गैस है!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक कहा है कि भारत में गैस का या तेल का कोई संकट नहीं है। उन्होंने अपने मंत्रियों और अन्य नेताओं से कहा कि वे जनता के बीच जाएं और उनको बताएं कि तेल और गैस का संकट नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पूरे आत्मविश्वास के साथ बताएं कि कोई संकट नहीं है। चार मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी गुरुवार को साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके भी यही कहा कि तेल और गैस का कोई संकट नहीं है। अब असली बात क्या है? असली बात तेल या गैस का संकट नहीं है, बल्कि असली बात आत्मविश्वास है। देश तेल या गैस से नहीं आत्मविश्वास से चलता है। अगर आत्मविश्वास है कि तेल और गैस का कोई संकट नहीं है तो इसका मतलब है कि कोई संकट नहीं है।

देश के जो लोग गैस एजेंसियों के सामने कतार लगा कर खड़े हैं, धक्के खा रहे हैं, गैस की बुकिंग नहीं कर पा रहे हैं, जो होटल और रेस्तरां बंद हो रहे हैं, कैंटीन्स बंद की जा रही हैं, हवाई किराया बढ़ाया जा रहा है, अयोध्या की राम रसोई बंद हुई है, सुप्रीम कोर्ट और कांग्रेस मुख्यालय की कैंटीन में कैटरिंग का काम सीमित किया गया है, आईआरसीटीसी के बारे में कहा जा रहा है कि वह कैटरिंग में कटौती करने वाला है, यह सब असल में एक साजिश है, जो सरकार को बदनाम करने वाले लोगों ने रची है। यह भी कह सकते हैं कि अमेरिका वाले जॉर्ज सोरोस या उस तरह का कोई टूलकिट लगा है, जिसको भारत के विश्वगुरू बनने से चिढ़ है और वह इकोसिस्टम सरकार और देश को बदनाम करने के लिए इस तरह के काम करा रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा भी कि कुछ लोगों का काम पैनिक फैलाना होता है। वहीं लोग गैस संकट को लेकर पैनिक फैला रहे हैं।

अन्यथा, जब विश्वगुरू भारत के प्रधानमंत्री ने कह दिया कि तेल और गैस का संकट नहीं है तो लोगों को मान लेना चाहिए कि संकट नहीं है। जो नहीं मान रहे हैं वे देश विरोधी इकोसिस्टम के लोग हैं। ऐसे ही लोगों ने नोटबंदी के समय कतार में लग कर और कोरोना के समय ऑक्सीजन की कमी बता कर जान दी थी और देश की छवि बिगाड़ी थी और अब गैस एजेंसियों के सामने कतार लगा कर सरकार की छवि बिगाड़ रहे हैं। उनको पता ही नहीं है कि सरकार के पास इतने गैस के सिलेंडर भरे हुए हैं कि राह चलते लोगों को पकड़ पकड़ कर सिलेंडर दिया जा रहा है। कुछ देशद्रोही किस्म के लोग ही इस बात का मुद्दा बना रहे हैं कि सरकार ने शहरों में गैस की बुकिंग का समय 20 दिन से बढ़ा कर 25 दिन कर दिया और गांवों में 45 दिन से पहले बुकिंग नहीं करने का नियम बनाया है। यह तो सरकार ने लोगों की सुविधा के लिए किया गया है। इसी तरह घरेलू रसोई गैस के सिलेंडर की कीमत में 60 रुपए और कॉमर्शियल सिलेंडर में 115 रुपए की जो बढ़ोतरी की गई है वह तो इसलिए की गई है ताकि लोग देश के विकास में ज्यादा योगदान कर सकें।

इसलिए लोगों की अपने कानों और अपनी आंखों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। उनको वह देखना और सुनना चाहिए, जो सरकार कह रही है। प्रधानमंत्री कह रहे हैं। देश के विदेश मंत्री और पेट्रोलियम मंत्री कह रहे हैं। सब एक ही बात कह रहे हैं कि कोई संकट नहीं है। तेल के भंडार लबालब भरे हुए हैं और जिस देश में हर दूसरा व्यक्ति डॉक्टर के यहां जाकर कहता हो कि डॉक्टर साहेब गैस बन रही है, उस देश में गैस की कमी भला कैसे हो सकती है! बाकी इसके बावजूद अगर किसी को गैस की किल्लत महसूस हो रही है तो सरकार ने कोयला को विकल्प के तौर पर आजमाने के लिए कह दिया है। कोयले की तो कमी देश में है नहीं। अगर उसकी भी कमी मिले तो लकड़ी का चुल्हा आजमाया जा सकता है। लोगों को यह भी तो समझना चाहिए कि आत्मनिर्भर भारत में वे कब तक सरकार और दूसरे देशों पर निर्भर रहेंगे। अपनी लकड़ी काटें, अपना कोयला निकालें और काम चलाएं। नाले से गैस निकालें और आत्मनिर्भर बनें।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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