पांच राज्यों के चुनाव के बीच भाजपा ने जो नैरेटिव बनाया है वह पूरी तरह से उत्तर या पश्चिम भारत पर केंद्रित है। परिसीमन का मामला भी उत्तर और पश्चिमी भारत में सीटें बढ़ाने से जुड़ा है तो महिला आरक्षण का मामला भी हिंदी पट्टी और पश्चिम के राज्यों राजस्थान व गुजरात से जुड़ा है। विंध्य के पार एकमात्र राज्य, जहां भाजपा बहुत मजबूत हुई है वह महाराष्ट्र है और वह भी पश्चिम भारत में है। उत्तर और पश्चिम भारत का नैरेटिव बनाने का कारण यह है कि दक्षिण या पूर्वी भारत में भाजपा को मजबूत प्रादेशकि क्षत्रपों से लड़ना है और वह लड़ाई हमेशा उसके लिए मुश्किल होती है। दूसरे दक्षिण के दो राज्यों कर्नाटक और केरल में कांग्रेस भी बहुत मजबूत है। उत्तर भारत में भी क्षत्रप हैं लेकिन वे विशुद्ध रूप से जातिवाद की राजनीति वाले हैं। उत्तर और पश्चिम भारत में भाजपा ने संगठन के स्तर पर और वैचारिक स्तर पर भी अपना मजबूत आधार बना लिया है। परिसीमन और महिला आरक्षण से उसका यह आधार मजबूत होगा और आगे की चुनावी राह उसके लिए आसान होगी।
तभी उसने 2029 के लोकसभा चुनाव और अगले तीन साल में होने वाले राज्यों के चुनावों से पहले परिसीमन और महिला आरक्षण का दांव खेला। ध्यान रहे लोकसभा चुनाव से पहले 12 राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और उनमें आठ बड़े राज्य उत्तर, पश्चिम या मध्य भारत की हिंदी पट्टी के हैं। अगले साल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और गुजरात के चुनाव हैं तो उसके अगले साल यानी 2028 में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव हैं। इनके अलावा गोवा, मणिपुर, कर्नाटक आदि के भी चुनाव हैं। यह तय है कि इन राज्यों में अगले चुनाव तक परिसीमन नहीं हो पाएगा। लेकिन जनगणना के तुरंत बाद वह काम शुरू हो जाएगा और 2029 के लोकसभा चुनाव तक उसे लागू करने की कोशिश होगी।
सरकार ने परिसीमन का जो प्रयास किया वह जब भी लागू होगा तब भाजपा के असर वाले उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत के राज्यों की तस्वीर पूरी तरह से बदलेगी। केंद्र की सरकार बनाने में दक्षिण के राज्यों की भूमिका लगभग पूरी तरह से समाप्त हो जाएगी। अभी यह स्थिति है कि दक्षिण के राज्य सरकार बनाने में भूमिका निभाते रहे हैं। सीटों की संख्या कम होने के बावजूद उनकी भूमिका होती है। लेकिन परिसीमन के तहत अगर प्रो राटा बेसिस पर यानी उत्तर भारत के राज्यों के समान अनुपात में वहां भी सीटें बढ़ जाती हैं तब भी अंतर इतना बड़ा हो जाएगा कि केंद्र की सरकार बनाने में दक्षिण के राज्यों की भूमिका पूरी तरह से समाप्त होगी। इसका देश पर ओवरऑल क्या असर होगा वह देखने वाली बात होगी।
भाजपा के नेता बहुत मासूम बन कर सवाल उठाते हैं कि जब समान अनुपात में सभी राज्यों की सीटें बढ़ेंगी तो दक्षिण की भूमिका कैसे कम होगी? इसे समझना बहुत मुश्किल नहीं है। मिसाल के तौर पर तमिलनाडु में अभी 39 सीटें हैं और उत्तर प्रदेश की 80 सीटें हैं। दोनों के बीच 41 सीट का अंतर है। अगर 50 फीसदी की बढ़ोतरी की जाती है तो तमिलनाडु की सीटें 59 हो जाएंगी और उत्तर प्रदेश की सीट 120 हो जाएगी। इस तरह दोनों के बीच अंतर 61 सीटों का हो जाएगा, जो पहले 41 सीट का था। इसी तरह केरल और उत्तर प्रदेश के बीच 60 सीट का अंतर है। अगर दोनों की सीटें 50 फीसदी बढ़ाई जाती हैं तो यह अंतर बढ़ कर 90 सीटों का हो जाएगा। क्या यह इतना मुश्किल गणित है, जो लोगों को समझ में नहीं आता है?
अगर परिसीमन के लिए जनसंख्या को आधार बनाया जाएगा तब तो दक्षिण के राज्य अभी जितनी संख्या पर हैं उतने पर ही रह जाएंगे या उससे नीचे चले जाएंगे। लेकिन अगर हर राज्य में समान अनुपात में सीटें बढ़ाने के फॉर्मूले पर काम होता है तब उनकी संख्या तो 50 फीसदी बढ़ेगी लेकिन तब भी दक्षिण के राज्यों की भूमिका समाप्त होने वाली है। अभी 543 की लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा 273 का होता है। दक्षिण भारत के पांच राज्यों में सीटों की कुल संख्या 129 हैं। देश के बाकी हिस्से में 414 सीटें हैं, जिनमें से 67 सीटें पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के आठ राज्यों की है। 273 की संख्या पूरी करने में इनकी एक भूमिका होती है। अगर कांग्रेस या सहयोगी या समान विचारधारा वाली पार्टियों ने कुछ राज्यों में भी अच्छा प्रदर्शन कर दिया तो दक्षिण भारत के सहयोग से उनकी सरकार बन जाती है। 2004 और 2009 दोनों में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार बुनियादी रूप से एकीकृत आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की सीटों के सहारे बनी थी।
लेकिन अगर सरकार के हिसाब से सभी राज्यों में 50 फीसदी सीटें बढ़ जाती हैं तो पूरा समीकरण बदलेगा। फिर आंकड़े ऐसे हो जाएंगे कि दक्षिण भारत के राज्यों की भूमिका समाप्त हो जाएगी। 50 फीसदी सीटें बढ़ने पर दक्षिण के पांच राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या 129 से बढ़ कर 194 हो जाएगी। बाकी देश में सीटों की संख्या 621 होगी। इसमें पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के आठ राज्यों की एक सौ सीटें हैं। अगर उसे भी हटा दें तो सीटों की संख्या 521 होगी। यह बहुमत के लिए जरूरी संख्या से बहुत ज्यादा है। अगर 50 फीसदी सीटें बढ़ती हैं तो लोकसभा की कुल संख्या 816 सीटों की होगी, जिसमें बहुमत का आंकड़ा 409 का होगा। लेकिन जैसा कि सरकार कह रही है अगर कुल सीटों की संख्या 850 होती है तो बहुमत का आंकड़ा 426 का होगा। 850 के सदन में पूरे दक्षिण भारत और पूर्वी भारत में बंगाल व पूर्वोत्तर के राज्यों को छोड़ कर बाकी राज्यों की संख्या 550 लोकसभा सीटों की होगी। ऐसी स्थिति में भाजपा अपने असर वाले उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत के एक दर्जन राज्यों से ही बहुमत हासिल कर सकती है।
ध्यान रहे भाजपा ने 543 के सदन में अपने नैरेटिव के दम पर चार सौ सीट हासिल करने का लक्ष्य तय किया था। वह 240 पर रुक गई यह अलग बात है। लेकिन 2019 के चुनाव में 543 में से 303 जीतने के बाद उसको भरोसा बना था कि वह चार सौ सीट जीत सकती है। अगर लोकसभा 850 सदस्यों की हो जाएगी तो क्या उसके लिए चार सौ सीट का लक्ष्य अपेक्षाकृत छोटा नहीं हो जाएगा? तभी भाजपा को पता है कि वह क्या कर रही है और क्यों कर रही है। दक्षिण भारत के राज्यों को भी पता है कि परिसीमन के नाम पर क्या किया जा रहा है। परिसीमन के जरिए लोकसभा को उत्तर भारत केंद्रित बनाने से पहले भाजपा ने इन राज्यों में अपना नैरेटिव भी स्थापित किया है। हिंदुत्व का जो मॉडल आरएसएस और भाजपा का है उसकी आधारभूमि ये ही राज्य हैं, जहां आबादी बहुत बड़ी है, शिक्षा का स्तर न्यूनतम है और आर्थिक गतिविधियां भी अपेक्षाकृत कम हैं। सो, नैरेटिव स्थापित किया जा चुका है और अब संख्या बढ़ा कर सत्ता स्थायी करने का प्रयास चल रहा है। पता नहीं इसमें कितनी कामयाबी मिलेगी लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि भाजपा और मोदी व शाह को 24 घंटे इसी में खपे रहना है कि कैसे सत्ता स्थायी हो।


